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भारत-पाकिस्तान दोनों के साझा और सच लिखने वाले लेखक मंटो ने कहा -मैं कहानीकार नहीं, जेबकतरा हूं….

1919 के जलियावाला बाग़ की घटना पर लिखी
उनकी कहानी
तमाशा‘, विभाजन के दर्द को दर्शाती टोबा
टेक सिंह
‘, विभाजन की विभीषिका से बर्बाद हुई एक
बाप और बेटी की कहानी
खोल दोऔर मानवीय संवेदनाओं को शून्य कर देने वाली कहानी ठंडा गोश्तलिखने वाले साहित्यकार मंटो  विवादों में घिरे रहते हैं। लोगों का कहना है कि वो विवादित जरुर है  लेकिन कालजयी भी हैं! सच लिखने की हिम्मत रखते है।

 वहीं,
मंटो का कहना है कि
मैं
बहुत कम-पढ़ा लिखा आदमी हूँ. वैसे तो मैंने दो दर्जन किताबें लिखी हैं और जिस पर आए
दिन मुकदमे चलते रहते हैं। लेकिन जब कलम मेरे हाथ में न हो
, तो मैं सिर्फ सआदत हसन होता
हूँ!”  उर्दू के इस लेखक ने बाइस लघु
कथा संग्रह
, रेडियो नाटक के पांच संग्रह, रचनाओं के तीन संग्रह और व्यक्तिगत
रेखाचित्र के दो संग्रह प्रकाशित किए है।

मंटो
अपने एक लेख में खुद को कुछ यूं बयान करते हैं कि भारत-पाकिस्तान दोनों के साझा और
विवादित लेखक मंटो अगर आज होते तो अपना जन्मदिन मना रहे होते विवादों के बारे में
अपने करीबी दोस्त साहिर लुधियानवी से एक बार कहा था
, “बदनाम ही सही लेकिन गुमनाम नहीं हूँ मैं।”

बीते
दो सालों में मंटो की कहानियों की चर्चा जितनी हुई है
, उतनी शायद ही किसी और उर्दू कहानीकार
की हुई हो और उसका कारण है उन पर और उनके साहित्य पर बन रही फ़िल्में.
मंटोस्तानरिलीज़ हुई थी जिसमें उनकी छ कहानियों
को फ़िल्माया गया था।

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