इस्लाम में हराम बताते हुए एक नामी पाकिस्तानी गायिका ने छोड़ा संगीत

अभी कुछ दिन पहले भारत के बॉलीवुड में एक ऐसा वाकया हुआ था जब एक अदाकारा ने अदाकारी को इस्लाम के मुताबिक हराम बताते हुए सदा के लिए छोड़ने का एलान कर दिया था. उस समय ये दुनिया भर में बहस का मुद्दा हो गया था, यद्दपि तरक्की के नाम पर LGBT कानून तक का समर्थन करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया इस मामले में नहीं आई थी, अब उसी मार्ग का अनुसरण पाकिस्तान में भी शुरू हो गया है और एक नामी गायिका ने संगीत से तौबा कर ली है ..

ध्यान देने योग्य है की भारत के बॉलीवुड वालों के अक्सर बयानों में सुनाई देता है की कला का कोई धर्म नही होता और कलाकार को न सिर्फ धर्म बल्कि देश की सीमओं से भी ऊपर रखा जाना चाहिए .. हालात तो यहाँ तक बना दिए जाते रहे हैं की एक तरफ दोनों देशो की सेनायें आमने सामने खड़ी होती हैं युद्ध के हालात में तो वहीँ दूसरी तरह एक साथ पाकिस्तानी कलाकारों के साथ शूटिंग चल रही होती है और इसके लिए सेकुलरिज्म के नकली सिद्धांतो का सहारा लिया जाता है..

इन्ही सब के बीच ताजा समाचार के अनुसार पाकिस्तान की चर्चित सूफी गायिका शाजिया खश्क ने शोबिज को अलविदा कहते हुए कहा है कि अब वह गाना नहीं गाएंगी। पाकिस्तानी मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, ‘लाल मेरी पत.’ और ‘दाने पे दाना.’ जैसे कई मशहूर गानों की गायिका खश्क ने कहा है कि वह अब शोबिज छोड़ रहीं हैं. उन्होंने कहा कि उन्होंने गायिकी छोड़ने का फैसला इसलिए किया क्योंकि वह अब अपनी जिंदगी पूरी तरह से इस्लामी शिक्षा के अनुरूप जीना चाहती हैं।

वह दुनिया के 45 देशों में अपने शो कर चुकी हैं। उनकी पहचान एक सूफी गायिका के साथ-साथ एक सिंधी लोक कलाकार के रूप में भी रही है। खुद शाजिया के शब्दों के अनुसार –  “मैं फैसला कर चुकी हूं। मुझे अब अपनी बाकी की जिंदगी इस्लाम की सेवा में बितानी है।” उन्होंने अब तक उनका समर्थन करने के लिए प्रशंसकों को धन्यवाद दिया और कहा कि उन्हें उम्मीद है कि उनके ताजा फैसले का भी प्रशंसक समर्थन करेंगे। उन्होंने कहा कि वह अपने फैसले को नहीं बदलेंगी और शोबिज में वापस कदम नहीं रखेंगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि सिंध से ताल्लुक रखने वाली शाजिया ने सिंधी के साथ-साथ उर्दू, पंजाबी, बलोची, सराइकी और कश्मीरी भाषाओं में भी गीत गाए।

 

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