#ChaloDhar 27 नवम्बर को सुरेश चव्हाणके जी के साथ .. राजा भोज की नगरी वो धार जहां मां सरस्वती के मंदिर पर बनी है मस्जिद


हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के पक्ष में फैसला सुनाया था. इस फैसले ने हिंदुत्व के उस कलंक को धोया था, जिसके लिए सैकड़ों श्रीरामभक्तों ने अपना बलिदान दिया था. मुगल काल में प्रभुश्रीराम के मंदिर पर बाबरी मस्जिद बनवाई गई थी, जिसे 1992 में श्रीराम भक्तों ने ढहा दिया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने भी यही फैसला दे दिया था कि वो जगह भगवान राम की जन्मभूमि है तथा वहां मंदिर ही बनेगा.

ये तो रही अयोध्या की बात लेकिन देश में ऐसी एक नहीं बल्कि कई अयोध्या हैं जहाँ हिन्दू आराध्यों के मंदिरों को तोड़कर, उन्हें ध्वस्त कर या उन पर कब्जा कर मस्जिदें बना दी गईं. ऐसी ही एक मस्जिद है मध्यप्रदेश के धार स्थित भोजशाला. राजा भोज की नगरी वो भोजशाला जो मां सरस्वती का मंदिर था तथा जहाँ आज मस्जिद बनी हुई है. सुदर्शन टीवी के प्रधान संपादक श्री सुरेश चव्हाणके जी 27 नवम्बर दिन गुरूवार को राजा भोज स्मृति व्याख्यानमाला में भाग लेने के लिए धार जा रहे हैं. ये कार्यक्रम सिटी इंटरनेशनल स्कूल, HDFC बैंक के सामने, आदर्श रोड, धार. म0प्र0 में होना है.

सुरेश चव्हाणके जी ने इस कार्यक्रम में ज्यादा से ज्यादा लोगों से पहुँचने की अपील की है. श्री सुरेश चव्हाणके जी कार्यक्रम में “जनसंख्या असंतुलन से भारत का इस्लामीकरण” विषय पर व्याख्यान करेंगे. धार की भोजशाला वसंत पंचमी के नजदीक आते ही सुर्खियों में आ जाती है. उस समय भोजशाला को प्रशासन एक अभेद्य किले में तब्दील कर देता है. हिन्दू संगठन और मुस्लिम संगठन दोनों पूजा और नमाज की बात पर अड़े रहते हैं और इससे प्रशासन के लिए सौहार्दता कायम करना चुनौती बन जाता है.

भोजशाला का इतिहास क्या है ? किस तरह से धार पर आक्रमणकारियों ने कब्जा किया तथा माँ सरस्वती के मंदिर को मस्जिद में तब्दील किया, इसे हम सबको जानना जरूरी है. बता दें कि धार में परमार वंश के राजा भोज ने 1010 से 1055 ईसवीं तक 44 वर्ष शासन किया. राजा भोज ने 1034 में धार नगर में सरस्वती सदन की स्थापना की. यह एक महाविद्यालय था, जो बाद में भोजशाला के नाम से विख्यात हुआ. राजा भोज के शासन में ही यहां मां सरस्वती या वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित की गई. मां वाग्देवी की यह प्रतिमा भोजशाला के समीप खुदाई के दौरान मिली थी.

इतिहासकारों की मानें तो यह प्रतिमा 1875 में हुई खुदाई में निकली थी. 1880 में भोपावर का पॉलिटिकल एजेंट मेजर किनकेड इसे अपने साथ लंदन ले गया था. लेकिन 1305 से 1401 के बीच अलाउद्दीन खिलजी और दिलावर खां गौरी की सेनाओं से माहलकदेव और गोगादेव ने युद्ध लड़ा. 1401 से 1531 में मालवा में स्वतंत्र सल्तनत की स्थापना की. 1456 में महमूद खिलजी ने मौलाना कमालुद्दीन के मकबरे और दरगाह का निर्माण करवाया. हिन्दू समाज भोजशाला को राजा भोज कालीन इमारत बताते हुए इस हिन्दू समाज का अधिकार बताते हुए इस सरस्वती का मंदिर मानते हैं.

दूसरी तरफ मुस्लिम समाज का कहना है कि वे वर्षों से यहां नमाज पढ़ते आ रहे हैं, यह जामा मस्जिद है, जिसे भोजशाला-कमाल मौलाना मस्जिद कहते हैं. मतलब अगर किसी को नमाज पढने का अधिकार दे दिया अपनी जगह पर तो वो नमाज पढने वालों की जगह हो गई. वसंत पंचमी को हिन्दू भोजशाला के गर्भगृह में सरस्वतीजी का चित्र रखकर पूजन करते हैं. 1909 में धार रियासत द्वारा 1904 के एशिएंट मोन्यूमेंट एक्ट को लागू कर धार दरबार के गजट जिल्द में भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया. बाद में भोजशाला को पुरातत्व विभाग के अधीन कर दिया गया.

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पास इसकी देखरेख का जिम्मेदारी है, लेकिन अंग्रेजों ने अपना खेल खेल दिया था. धार स्टेट ने ही 1935 में परिसर में नमाज पढने की अनुमति दी थी. स्टेट दरबार के दीवान नाडकर ने तब भोजशाला को कमाल मौला की मस्जिद बताते हुए को शुक्रवार को जुमे की नमाज अदा करने की अनुमति वाला आदेश जारी किया था. प्रति मंगलवार और बसंत पंचमी पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिन्दुओं को चावल और पुष्प लेकर पूजा की अनुमति और शुक्रवार को मुस्लिमों को नमाज की अनुमति दी गई. सप्ताह के शेष दिन पांच दिनों में पर्यटक एक रुपए शुल्क देकर प्रवेश कर सकते हैं.

धार का इतिहास कितना गौरवषाली रहा है ये बात वहां के आर्किटेक्ट चिल्ला चिल्ला कर बता रहे हैं. राजा भोज खुद महान विद्वान थे. राजा भोज देष और दुनिया के महान विद्वानों को अपने यहां बुलाते थे. राजा भोज की इसी भोजषाला में हर तरह के ज्ञान विज्ञान के केंद्र हुआ करते थे. लेकिन हिंदुस्थान पर आक्रमणकारी राक्षसों की काली नजर पड गई. आक्रमणकारियों ने भोजशाला पर भी कब्जा करने की सोची. धार पर आक्रमणकारियों ने कई बार आक्रमण किए. लेकिन सफल नहीं हो पाए. क्योंकि धार के राजा और वहां की संस्कृतिक विरासत को खत्म करना आसाना नहीं था. ऐसे में आक्रमणकारियों ने मेलमिलाप के जरिए धार पर कब्जा करने की सोची.

इसके बाद एक साजिश के तहत राजा के पास एक सूफी को भेजा जाता है. सूफी राजा से भोजषाला में नमाज पढने का आग्रह करता है. राजा, सूफी को नमाज पढने के लिए जगह दे देते हैं. सूफी,, राजा और उसकी प्रजा की हर बात अपने आकाओं मुस्लिम आक्रमणकारियों तक पहुंचा देता है. मुस्लिम आक्रमणकारी भोजशाला पर आक्रमण कर देते हैं और भोजषाला में एक दरगाह बना देते हैं. दरगाह में नमाज अता होने लगती है और देखते ही देखते भोजशाला पर कब्जा हो जाता है.

मुस्लिमों के कब्जे के बाद धार के इतिहास को तहस नहस करने का षडयंत्र शुरू हो जाता है. धार में बने वैज्ञानिक स्मारकों को तोडने के लिए लगातार हमले होते रहे लेकिन फिर भी धार की अपनी प्रसंगिता बनी रही. ऐसे में अब हम सबके सामने ये सवाल है, क्या हमें धार को फिर से ज्ञान विज्ञान के केंद्र के तौर पर विकसित नहीं करना चाहिए. क्या हमें धार को फिर से दुनिया के सामने नहीं लाना चाहिए,, धार के उसी रूप में,, जैसे वो राजा भोज के समय था. हमें संकल्प लेना होगा कि हमें पावन भोजशाला के गौरव को वापस लाना है.


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