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बहुत कुछ दे गया चंद्रयान- 2 . भारत के वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम व सराहनीय कार्य पर सुरेश चव्हाणके जी का सम्पादकीय

बहुत कुछ दे गया चंद्रयान- 2

चंद्रयान-2 हिंदुस्थान के अंतरिक्ष अभियान को ही नहीं, विज्ञान और प्रौद्योगिकी संसार को भी बहुत कुछ दे गया है.. इससे जो राष्ट्रीय एकता और चेतना जगी है वो सामान्यतया निर्माण नहीं होती..

इसका वैज्ञानिक विश्लेषण तो हमारे विशिष्ट मेधावी वैज्ञानिक ही करेंगे, परंतु मैं इसका 360’ डिग्री विश्लेषण करूँ तो पाता हूँ कि हमें अपेक्षाओं से अधिक बहुत कुछ मिला है.. तकनीकि तौर पर तो वहां पहुँचने की ठानी, जहाँ विश्व का कोई भी देश जाने का साहस तो दूर, वहां जाने की सोच भी नहीं पाया है.. अभी तक के 19 चंद्र मिशन उत्तरी ध्रुव पर ही हुए हैं और आने वाले दिनों में होने वाले अन्य देशों के मिशन भी उत्तर पर ही होने वाले हैं.. हम तो दक्षिण ध्रुव में पहुँचे हैं.. यान से केवल संपर्क टूटा है, उसके साथ किसी दुर्घटना या विफलता की कोई सूचना नहीं है.. अंतिम क्षण तक वह अपेक्षाकृत कार्य कर रहा था,  केवल सम्पर्क टूटा है, सपना या संभावना नही.  सम्पर्क पुनः हो सकता है, यान के पास 1 वर्ष तक वहां रहने का ईंधन है, वह स्वयं उतरने में सक्षम है, वह स्वयं पथप्रदर्शी है.. एक बार सम्पर्क टूटने के बाद पुनः सम्पर्क के कई उदाहरण भी हैं.. उसके द्वारा चंद्र की ज़मीन पर पहुँचने के पहले आकाशीय वातावरण और पास से ली हुई जानकारी और फ़ोटो ने आधे से ज़्यादा काम कर ही दिया है..

मेरे दृष्टिकोण से इसके और भी कई प्रकार के मायने हैं.. वास्तविकता तो ये है कि यह अभियान हमें बहुत कुछ दे गया.

पूरा देश सुबह तक एक साथ एक भाव से साथ जाग रहा था, गौरव और स्वाभिमान का अनुभव कर रहा था, पल पल अपने आराध्य से प्रार्थना कर रहा था.. एक राष्ट्र के तौर पर यह अभियान देश के सारे बंधनों, बाधाओं और कई प्रकार के विरोधाभासों को तोड़ कर एक साथ खड़ा था.. इसमें सारे उम्र के, सारे आय वर्ग के, सारे राजनीतिक सोच के, सारे भाषा-प्रांत, धर्म और आस्तिक ही नहीं नास्तिक भी एक साथ थे.. किसी राष्ट्र में एक होने का यह भाव जगाने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है, पर फिर भी वो चेतना नहीं जागती जो इस एक अभियान ने जगा दी है..

हमारे देश में जो जुनून क्रिकेट, बॉलीवुड या राजनीति के प्रति होता है उससे भी ज्यादा गूढ़ माने जाने वाले विज्ञान के प्रति दिखा.. पूरा देश इसरो प्रमुख सिवन जी के साथ ही कई गुमनाम वैज्ञानिको के नाम जानने लगा..  उन वैज्ञानिकों के प्रति मान-सम्मान के साथ नायक वाला भाव भी जगा. ट्विटर पर उनके फॉलोवर्स की संख्या लाखों में बढ़ी.. शायद ही किसी देश ने विज्ञान के प्रति जन-जन में , जनता के सभी वर्गों में इतना आकर्षण निर्माण किया हो जो इस एक अभियान ने कर दिया.. मात्र एक अभियान से लाखों बच्चों ने कल वैज्ञानिक बनने का संकल्प लिया है, जो ऐसे कई अभियानों का जुनून, प्रेरणा और ऊर्जा निर्माण कर गया..

इस पूरे अभियान का यश और परिणामों का श्रेय मुख्यतः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देना चाहिए.. इसरो और वैज्ञानिक पहले भी थे, परंतु मोदी जी ने इसमें जान फूंकी.. देश का मुखिया ही जब इसमें मन-प्राण से रुचि ले, वैज्ञानिकों को सम्मान दे, कठिन समय में भी साथ दे और जो नहीं मिला उसके बजाए जो मिला उसका अभिनंदन करे तो कुछ भी असंभव नहीं रहता. इसको इस चंद्रयान- 2 अभियान ने दिखा दिया है.. इसरो प्रमुख को पिता की तरह गले लगाने वाला भाव पूर्ण वीडियो अभी तक सर्वाधिक देखा जा रहा.. वीडियो ही नहीं बल्कि उसके माध्यम से एक विश्वास और राजनैतिक नेतृत्व के प्रति भी सम्मान बढ़ गया है.. देश का मुखिया मोदी जैसा हो तो क्या नहीं हो सकता है इस का इससे बड़ा उदाहरण यही है .. देश ही नहीं विश्व के अन्य नेताओं के लिए मोदी जी ने स्वयं एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसे हर कोई अपने जीवन में आचरण करना चाहेगा.. सोचिए, देश के सारे मुख्यमंत्री और नेता यदि ऐसी ही भावना से कार्य करें तो विज्ञान कहाँ पहुँचेगा, देश कहाँ पहुँचेगा.. कभी हमारा ही हिस्सा रहे भूटान के बच्चों को इस अभियान से जोड़ कर मोदी जी ने हमारे अपनो में भी स्वाभिमान और अपनेपन को जगाया है.. हमारे अखंड भारत का सांस्कृतिक सपना पूरा होता दिख रहा है..

हिंदुस्थान के मीडिया की भी इसमें बहुत सकारात्मक भूमिका रही.. मसालेदार चटपटे समाचारों से भी ज्यादा दर्शक विज्ञान के कार्यक्रमों में मिल सकते हैं और हमारे पत्रकार उसका सजीव प्रसारण कर सकते हैं यह भी प्रमाणित हुआ,  अन्यथा थोड़ा गूगल कर के पुराने अभियानों के प्रति क्या लिखा जाता था और कैसे एंकर / रिपोर्टर उसे कवर करने जाते थे, पता चल जाएगा.. मैं आशा करता हूँ , हिंदुस्थान का मीडिया इस अच्छाई को जारी रख कर राष्ट्रीय चेतना जगाने के अभियान में निर्णायक और उपयोगी माध्यम बनेगा..

सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी रही कि चंद्र पर अभी तक किसी भी देश के किए हुए अनुसंधान ने हमारे हज़ारों वर्षों के खोज और मान्यताओ को नहीं नकारा है.. दूसरे पंथों और मान्यताओं में चंद्र के वर्णन और मान्यताएं आदि गैर वैज्ञानिक साबित हुई हैं, जैसे उनकी मान्यता पृथ्वी, अन्य ग्रहों और विज्ञान के प्रति अप्रमाणिके साबित हुई.. परंतु हमारे पूर्वज कितने प्रतिभाशाली और ज्ञानी थे यह भी साबित होना अपने अतीत के प्रति सम्मान और स्वाभिमान जगा गया है..

मै इस मिशन को कई मायनों में अपेक्षाओं से ज्यादा सफल मानता हूँ क्योंकि मुझे इसमें कल के विश्वगुरु हिंदुस्थान के निर्माण की चेतना दिख रही है.

आपका – सुरेश चव्हाणके

पूरा ब्लॉग पढने के लिए नीचे लिंक पर जाएँ –

https://sureshchavhanke.in

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