गुरुजन से शिक्षक और शिक्षक से टीचर तक की यात्रा.. शिक्षक दिवस पर सुरेश चव्हाणके जी का सम्पादकीय


आज जब सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन की सभी संस्थाएं और व्यवस्थाएं बाज़ारवाद और दिशाहीन लक्ष्य के कारण दम तोड़ रही हैं, तब शिक्षक नाम की व्यवस्था पर आज के दिन चिंतन बेहद आवश्यक है। भारतीय जीवन दर्शन और दृष्टिकोण में शिक्षक की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है,  हमारे यहाँ सामान्य से असामान्य बनने की महान और विशाल परम्परा में गुरु को अनिवार्य माना गया है।  उसकी अपरिहार्यता एकल नहीं है, उसमें विद्यार्थी भी एक महत्वपूर्ण पात्र है। वैसे हमारे यहाँ कई प्रकार के गुरु होते हैं। दत्त महाराज जी ने तो 24 गुरु किए थे, धीरे- धीरे गुरुओं के प्रकार अलग- अलग होने लगे और शिक्षक नाम की एक आदर्श व्यवस्था शुरू हुई.. आध्यात्मिक, धर्म के मर्म को बताने और समझाने वाले  शिक्षक को गुरु कहा जाने लगा। 5 सितम्बर को मनाया जाने वाला शिक्षक दिवस शालेय शिक्षकों के लिए है, इसलिए आज हम केवल इसी पर चिंतन करते हैं।

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यह व्यवस्था क्या से क्या हो गयी है। यह जितनी बिगड़ेगी, समाज उससे दोगना बिगड़ेगा। यह व्यवस्था जितने गिरेगी, उतना समाज रसातल में जाएगा और जा भी रहा है।  आप जितने बुज़ुर्ग  व्यक्ति को मिलेंगे उसमें अपने शिक्षकों के प्रति उतना ज़्यादा आदर, मान और सम्मान दिखेगा।  दशकों बाद भी उनकी  स्मृतियों में भावनात्मक बंधन दिखेगा।उसके जीवन के बदलाव में कोई ना कोई घटना शिक्षक से जुड़ी जरूर होगी। शिक्षक द्वारा मिली सज़ा भी वह बड़े अच्छे भाव से बताएँगे,  बल्कि ज़्यादा सख्त और ज़्यादा सज़ा देने वाले शिक्षक के विद्यार्थी आज ज़्यादा यशश्वी होंगे। उस शिक्षक के चरित्र और व्यक्तित्व का आज भी प्रभाव उस बुज़ुर्ग पर साफ दिखेगा। ऐसे ही आप शहर से दूर छोटे से छोटे  गावों तक जाएँगे तो आप को इसकी अधिकता दिखेगी। इसका मतलब है कि यह स्थिति बदलते समय के साथ बदल रही है।

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पहले शिक्षक गाँव का सबसे सम्माननीय व्यक्ति होता था। उसे देखने के बाद सबसे अमीर या सबसे प्रभावी व्यक्ति भी खड़ा हो जाया करता था। गावों का बुरा से बुरा व्यक्ति भी शिक्षक को सम्मान देता था, उसे भी उसकी अगली पीढ़ी अच्छी बनने की सम्भावनाएं उसी में दिखती थीं। परंतु धीरे – धीरे शिक्षक केवल टीचर की दिशा में जाने लगे।  स्वतंत्रता के बाद सेकुलर सरकारों ने तो उसकी आत्मा ही निकाल दी। धर्म अध्यात्म की दिशा उस से बदतर हुई। सरकारी तंत्र ने उसे नौकर बना दिया. हर काम उससे लेना शुरू कर दिया। पढ़ाने के सिवा अन्य काम ज़्यादा महत्वपूर्ण होने लगे। शिक्षक से बड़ा शिक्षधिकारी मान सम्मान, वेतन और पद से बड़ा कर दिया। रही सही कसर बाज़ारवाद ने पूरी कर दी. पैसा उसके भी जीवन का महत्वपूर्ण और अपरिहार्य अंग बनता गया।  मुझे याद है, हमारे शिक्षक को कभी दूध, सब्ज़ी या फल ख़रीदने नहीं पड़ते थे। उनकी यात्राओं से लेकर अन्य तमाम चीज़ों का ध्यान समाज रखता था। आगे चल कर सरकारी नौकरी से आवश्यकता पूरी नहीं होती इसलिए उसने प्राईवेट क्लासेस शुरू कर दिए।  ज़्यादा बढ़े उसके लिए वह भी आंदोलन, हड़ताल कर के विद्यालयों के साथ- साथ रास्ता रोको से सड़क, रेल तक को बन्द करने लगा । उसके विद्यार्थियों के सामने उसे पुलिस से डंडे पड़ने लगे। पैसा ही सब कुछ बन गया तो सम्मान के साथ लाचारी भी घुस गयी। नशाखोरी का शिकार हो गए और चरित्र से ज़्यादा पैसा महत्वपूर्ण हो गया। बेरोज़गारी के कारण सस्ते में दिहाडी मज़दूर के रूप में भर्तियाँ होने लगी। शिक्षा के निजीकरण ने प्राईवेट स्कूलों की दुकाने खोल दिए। उसमें शिक्षक के दर्जे के बजाए स्कूलों की सुविधाओं के विज्ञापन आने लगे। सबसे ज्यादा फ़ीस लेने वाला स्कूल सबसे बड़ा हो गया।  अब शिक्षक केवल टीचर बन ही चुका था। उसका भी शोषण शुरू हुआ तो उसने विद्यार्थियों का शोषण शुरू कर दिया। अब दिहाडी करने वाला शिक्षक ट्यूटर के रूप में घंटो पर मिलने लगा। अब टीचर सर्विस प्रोवाइडर और विद्यार्थी ग्राहक बन चुका है, फिर इन दोनो में रिश्ता और भाव जो होता है वही होने लगा। कभी समाज और व्यक्ति के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण घटक और व्यवस्था अब दम तोड़ कर टीचर तक आ पहुँची है। वह अपने ग्राहक को सज़ा कैसे दे सकता है ? किसी दोष को निष्पक्षता से कैसे दिखा सकता है ? उसको तो उसके मूड अनुसार, बल्कि नख़रों के अनुसार चलना है। बच्चा भी जानता है, मेरे टीचर को मोटी रक़म दी जाती है तो वह भी उसे रौब दिखाता है। अब तो यही ट्यूटर उस बच्चे के नशा से लेकर कई चीज़ों का सप्लायर बन चुका है। कहाँ से चले थे और कहाँ आ गए ?

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यह सब आज मैंने विस्तार से इसलिए लिखा क्योंकि बच्चों को अतीत के स्वर्ण युग का पता चले और माता पिता को अपने अच्छे दिन याद आ जाएं। आज के शिक्षक दिवस पर हम अपनी जड़ो की तरफ़ जाने का विचार करें। यह व्यवस्था जिस सरकारी तंत्र और बाज़ार के हवाले है उस से यह माँग करें। अभी भी समय है, वापसी शुरू करते है तो 10 से 20 वर्षों में हम उस स्वर्ण काल में पुनः जा सकते है।  हम भारतीय प्रकृति की गति के दिशा को गोल मानते हैं, इसलिए पुनः बिगड़ी हुई चीज़ों से अच्छाई की तरफ़ बढ़ सकते हैं। बस किस पीढ़ी को इसकी आवश्यकता अधिक महसूस होगी, कौन सी पीढ़ी इस परिवलन के चक्र को गति दे कर पुनः वहाँ पर लाएगी।  इसलिए भी पत्रकारों ने नारद मुनि जी की तरह राजा – समाज को यह याद दिलाते रहना चाहिए।

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भारत को परम वैभव पर और व्यक्तिगत जीवन को परम यश और सुख के तरफ़ ले कर जाने के लक्ष्य के लिए यह अति आवश्यक है। आख़िर हर माता – पिता सब कुछ अपने बच्चों के लिए करते है। अगली पीढ़ी बनाना हमारा दयित्व भी है। आईये 2019 के शिक्षक दिवस पर हम यह संकल्प करें कि टीचर से शिक्षक नहीं बल्कि सीधे पुनः गुरु बनाएंगे और बच्चों को पुनः शिष्य। सामान्य से असामान्य बनने की विराट और महान परम्परा पुनः शुरू करें। परमात्मा इसके लिए हमें सदबुद्धि, विवेक और यश दे..!

आपका – सुरेश चव्हाणके

पूरा ब्लॉग पढने के लिए नीचे लिंक पर जाएँ – 

https://sureshchavhanke.in/

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