"चौरी चौरा क्रांति दिवस विशेष"- फाँसी पर झूल गए थे 19 शूरवीर जिनका नहीं दिया किसी ने भी साथ क्योंकि गांधी ने ही उन्हें घोषित कर दिया था हत्यारा.. फाँसी के बाद भी कथित अहिंसावादियों से अपमानित होता रहा क्रान्तिकारियों का परिवार - Hindi News, हिंदी समाचार, Samachar, Breaking News, Latest Khabar -

“चौरी चौरा क्रांति दिवस विशेष”- फाँसी पर झूल गए थे 19 शूरवीर जिनका नहीं दिया किसी ने भी साथ क्योंकि गांधी ने ही उन्हें घोषित कर दिया था हत्यारा.. फाँसी के बाद भी कथित अहिंसावादियों से अपमानित होता रहा क्रान्तिकारियों का परिवार


ऐसा एक नही बल्कि अनगिनत वीरों का साथ हुआ. भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद , सुभाषचंद्र बोस जैसे कुछ नाम तो गिने चुने उदाहरण हैं, चौरी चौरा के वीरों को क्या झेलना पड़ा था उसको जान कर इतिहास के पन्ने भी नम हो जाते हैं.. उस समय अहिंसा के कुछ तथाकथित पुजारियों ने ही उन्हें व उनके परिवार को इतना तिरस्कृत कर दिया था कि अंग्रेज पीछे छूट गए थे.. ऊपर से एक निर्देश क्या आया कि इन्होंने ब्रिटिश पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ ग़लत किया है, उन पर अंग्रेजो से ज्यादा वही टूट पड़े जिन्हें हिंसा बिल्कुल भी पसन्द नही थी..  अत्याचार क्या होता है ये चौरी चौरा के उन वीरों का परिवार से जाना व समझा जा सकता है जिनके परिजन को फांसी होने के बाद भी उसके परिवार को हत्यारो का घर कहा जाता रहा हो..

जिस प्रकार कभी देश मे इस तरह से अंतिम स्तर पर जा कर अहिंसा के सिद्धांत अपनाए गए थे, ठीक उसी प्रकार अब के भारत मे उसी स्तर पर जा कर धर्मनिरपेक्षता का नियम लागू किया जाता है.. फिलहाल फिर से आते हैं इतिहास पर, चौरी-चौरा उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जिले में एक गांव हैं. जो ब्रिटिश शासन काल में कपड़ों और अन्य वस्तुओं की बड़ी मंडी हुआ करता था. अंग्रेजी शासन के समय गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की थी. जिसका उद्देश्य अंग्रेजी शासन का विरोध करना था. इस आन्दोलन के दौरान देशवासी ब्रिटिश उपाधियों, सरकारी स्कूलों और अन्य वस्तुओं का त्याग कर रहे थे और वहाँ के स्थानीय बाजार में भी भयंकर विरोध हो रहा था. इस विरोध प्रदर्शन के चलते 2 फरवरी 1922 को पुलिस ने दो क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया था.

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अपने साथियों की गिरफ़्तारी का विरोध करने के लिए करीब 4 हजार आन्दोलनकरियों ने थाने के सामने ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रदर्शन और नारेबाजी की. इस प्रदर्शन को रोकने के लिए पुलिस ने हवाई फायरिंग की और जब प्रदर्शनकारी नहीं माने तो उन लोगों पर ओपन फायर किया गया. जिसके कारण तीन प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए. इसी दौरान पुलिसकर्मियों की गोलिया खत्म हो गई और प्रदर्शनकारियों को उग्र होता देख वह थाने में ही छिप गए. अपने साथी क्रांतिकारियों की मौत से आक्रोशित क्रांतिकारियों ने थाना घेरकर उसमे आग लगा दी. इस घटना में कुल 23 ब्रिटिश पुलिसकर्मियों की जलकर मौत हो गई थी.

यह घटना जब गांधी को पता चली तो वो थाने में आग लगाने वाले तमाम क्रांतिकरियो से बहुत नाराज हुए थे . उन्होंने उनके लिए कठोर शब्दों का उपयोग किया था और इतना ही नहीं , चौरी चौरा के क्रांतिकारियों को ही दोषी बताते हुए उन्होंने अपना असहयोग आंदोलन वापस ले लिया. इसी के चलते चौरी चौरा के वो बलिदानी समाज की नजर में उपेक्षित हो गये और उनको ऐसे देखा जाने लगा जैसे गांधी का कहा न मान कर उन्होंने देश का कोई बहुत बड़ा नुक्सान कर दिया हो.., गांधी के गुस्से के बाद उनके अनुयायियों ने उन वीरों को समाज मे ऐसे दिखा दिया जैसे उन्होंने सशत्र क्रांति कर के देश को आज़ाद होने से रोक दिया हो..

इसी के बाद इन वीरों का परिवार की मदद करने वाले भी नाममात्र के बचे और इनको क्रांतिकारी के बजाय काण्डकारी घोषित कर दिया गया..आज भी इतिहास की पुस्तकों में ये गौरवशाली घटना कांड के नाम से दर्ज है जिस से साबित होता है कि चौरीचौरा के वीरों का लिए तब की सोच व अब की सोच में खास फर्क नही आया है.. सुदर्शन न्यूज़ के प्रधान संपादक श्री सुरेश चव्हाणके जी चौरीचौरा के गौरवशाली इतिहास को “चौरीचौरा कांड” के बजाय “चौरीचौरा क्रांति” करने की मांग करते हैं जिस से उन बलिदानियों को “काण्डकारी” के बजाय “क्रांतिकारी” का दर्जा मिल सके..


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