योगी सरकार के दृढ संकल्पों का फल है कमलेश तिवारी हत्याकांड में मौलाना, वकील व् अन्य की गिरफ्तारी अन्यथा तैयारी थी इसको भूमि विवाद का रंग देने की


ज्यादा समय नहीं बीता है कमलेश तिवारी की निर्मम हत्या को.. इस हत्या की खबर जैसे ही जनता के बीच में आई वैसे ही पुलिस से पहले ही एक वर्ग सक्रिय हो उठा था और वो वर्ग है हिन्दू विरोधी मानसिकता रखने वाला वो समूह जिसको किसी न किसी रूप में हर विवाद का एंगल हिन्दू या हिंदुत्व की तरफ घुमा देना होता है.. जैसे ही कमलेश तिवारी की निर्मम हत्या की खबर सामने आई वैसे ही हिन्दू समूहों ने इसको मजहबी चरमपंथियों द्वारा की गई हत्या बताया लेकिन उसी के बराबर चल रही थी एक और विचारधारा..

आतंकी हरकत में जिस अंदाज़ में कमलेश तिवारी को निर्ममता से मारा गया उसकी निंदा करने और अपराधियों को जल्द पकड़ने की मांग के बजाय फ़ौरन ही मीडिया का एक खास वर्ग और नेताओं का एक बड़ा समूह फौरन ही इस मामले में आतंकियों से ज्यादा योगी सरकार पर हमलावर हो गया.. इस पूरे हो हल्ले के पीछे एक मंशा थी और वो मंशा थी की जनता के बीच सही और साफ़ संदेश न जाने पाए की कमलेश तिवारी को २ क्रूर मजहबी चरमपंथियो ने मार डाला.

इस मंशा में पुलिस की जांच को भी प्रभावित करना था जो उत्तर प्रदेश शासन के निर्देश के बाद बेहद तन्मयता से न सिर्फ हत्यारे बल्कि उनकी किसी भी प्रकार से मदद करने वालो को खोज रही थी.. इसी बीच में बेटे के दुःख में बेसुध माता के बयान भर को आगे रख कर उसी वर्ग द्वारा इतना शोर मचाया जाने लगा कि जैसे पुलिस से पहले वही वर्ग किसी निष्कर्ष पर पहुच गया हो.. इन सब के पीछे एक ही मंशा थी और वो थी ये कुकृत्य करने वाले उन्मादियो को किसी भी रूप में ढाल की तरह बन कर कवर देना..

हल्ला ऐसे मचाया गया की जैसे ये भूमि विवाद हो और पड़ोसी के साथ हुए विवाद में ये हत्या हुई हो जबकि हत्यारे मोईनुद्दीन और अशफाक खुद शान से स्वीकार करते रहे कि कमलेश तिवारी वाजिबुल कत्ल थे और उनकी हत्या जायज थी इस्लामिक कानून के हिसाब से .. साथ ही दोनों हत्यारों को अपने कुकृत्य पर किसी प्रकार का पछतावा भी नहीं था पर मीडिया का वो विशेष वर्ग अपनी विचारधारा के नेताओं के साथ इस निर्मम व् दुस्साहसिक हत्याकांड को जमीनी विवाद का रूप देने में लगे रहे.

ये ठीक उसी समय की याद दिलाता है जब साध्वी व् कर्नल जैसे व्यक्तित्वों को जबरन आतंकी बनाने पर एक सरकार तुली थी और उसी मानसिकता की हाँ में हाँ मीडिया का वही वर्ग मिलाये जा रहा था जबकि तब उनके पास कोई भी सबूत नहीं था.. फिलहाल यहाँ प्रशंशा करनी होगी योगी सरकार  और उत्तर प्रदेश पुलिस के अटल इच्छाशक्ति की जिसने बिना दबे और बिना झुके इस शोर को नजरंदाज़ करते हुए इस मामले से जुड़े तमाम हत्यारों को एक एक कर के भारत के विभिन्न कोनो से धर दबोचा..

इन गिरफ्तारियो पर एक बार भी शोर मचाने वाले वो तमाम विशेष वर्ग व् नेता ये कहते नहीं दिखाई दे रहे हैं की वो अब चल रही कार्यवाही से संतुष्ट हैं.. कईयों को तो अब की कार्यवाही एक वर्ग विशेष पर सत्ता का अत्याचार दिखाई दे रही है जबकि पुलिस ने जिस किसी को भी पकड़ा है उसके खिलाफ पुलिस के पास पक्के प्रमाण हैं.. उपरोक्त को मंथन करने के बाद एक बड़ा वर्ग इतना जरूर मानता है की शायद यदि योगी सरकार प्रदेश में न होती तो कमलेश तिवारी की निर्मम हत्या को एक जमीनी विवाद का रूप दे कर सदा के लिए दबा दिया जाता..


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