क्या सारी बीमारियों की दवा केवल गांधी ही हैं? मैं क़तई नहीं मानता- गांधी जयंती पर सुरेश चव्हाणके जी का संपादकीय

सत्ता का सर्वोच्च शिखर स्वयं गांधी के चरणों में नतमस्तक हो। सत्ता, विपक्ष और तटस्थ भी जब गांधी के अनुकरण करने की शपथ ले रहे हो, तो मैं अकेला गांधी से कुछ मुद्दों पर असहमति जता कर उन महापुरुषों के विचारों का सम्मान कर रहा हूँ जो गांधी जी से सहमत नहीं थे।

इस समय मेरा यह प्रयास क्या-क्या नुकसान कर सकता है यह मेरे मित्रों ने समझाने का प्रयास किया। पर मैं सत्य के लिए गांधी से ज्यादा जोखिम लेने के लिए तैयार रहता हूँ। ऐसे समय मौन या क्षमा का प्रयोग मेरे प्रकृति और देश के स्थिति दोनों के लिए ठीक नहीं।

मैं पुरातन गांधीवादियों या नव गांधीवादियों के उस अधिकार पर भी सवाल नहीं उठा रहा हूँ जो उनकी निजी और वैचारिक भक्ति है। मैं तो गांधी के विफल प्रयोगों को राष्ट्रीय नीति बनाने से असहमत हूँ।

राष्ट्र-धर्म रक्षा के लिए उबलते रक्त की धमनियाँ, कहीं हर हालात में अहिंसा के प्रयोग में पंचर ना हो जाए। इससे मैं चिंतित हूँ।

बलिदानी हुतात्माओं की वीर पत्नी और शुर पुत्रों के ह्रदय में हत्यारे शत्रु से बदला लेने के लिए उफान भर रहे ज्वालामुखी पर कहीं क्षमा का पानी न डाला जाए।

हमारे जैसे कईयों ने अपना सर्वस्व दाँव पर लगा कर पुनर्जागृत किए राष्ट्र रक्षा के यज्ञ के दहकते अंगारों पर इन प्रयोगों के कारण राख न जम जाए।

पराक्रम और बलिदान को छोड़ युद्ध के समय में शांति या अहिंसा की बातें करने वाला समाज एक दिन पराजित और ग़ुलाम हुए बगैर नहीं रह सकता।

इस्लामिक आतंकवाद का नंगा नाच जब खून की नदियाँ बहा रहा हो, लैंड जिहाद से ख़ाली होती बस्तियाँ, छूटते आशियाने, लव जिहाद से पराई होती बहनें और लुटती इज़्ज़त का तमाशा। खून, बलात्कार, धर्मांतरण। सिकुड़ता हिंदुस्थान और फैलते मिनी पाकिस्तान के समय भगत सिंह, पटेल, सुभाष बाबू चाहिए या नेहरू-गांधी? आप हि बताए।

दुश्मनों ने दशों दिशाओं से हिंदुस्थान को घेरा है। ऐसे में देश को छत्रपती शिवाजी जैसे महानायक, सावरकर जैसे महावीर और भगतसिंह जैसे क्रांतिकारीयों की ज़रूरत होते हुए गांधी के पुतले के सामने दोनों हाथ जोड़ कर आँखें बंद कर के सो जाने का मैं अनुकरण नही कर सकता।

किसी मरीज़ को तीसरे स्तर का कैंसर होने जा रहा है। डॉक्टर ने उसे प्रभावी दवाई देने या ऑपरेशन करने के बदले चॉकलेट चखने को देने को आप क्या कहेंगे?

मेरा संपूर्ण गांधी को लेकर विरोध नहीं है। परंतु जिस लिए गांधी को महात्मा कहा जाता है उस अहिंसा के अतिरेक पर मेरा विचार भिन्न है।

दया, करुणा, क्षमा यह वीरों के विराट और महान लक्षण है। परंतु जो व्यक्तिगत स्वार्थ, विधर्मियों के भ्रमजाल और जिहादियों के आतंक से भ्रमित और भयभीत है उसे यह बहाना कायर न बनाए।

गांधी के प्रयोगों ने क्या दिया ?

आइए शिवाजी के तरीकों का प्रयोग करते हैं। अस्तित्व की लड़ाई में बुद्ध वाले भी युद्ध कर रहे हैं। म्यांमार शिवाजी महाराज को पढ़ कर रोहिंग्याओ को सीमाओं खदेड़ रहे हैं।श्रीलंका हो या पूर्व के कई बौद्ध देशों ने बुद्ध या युद्ध में युद्ध ही चुना है।

सर्वपंथ समभाव, मैं तब स्वीकार करूँगा जब गांधी का राम और अल्लाह को बराबर बताने वाला भजन प्रत्येक मस्जिदों में उपर लगे स्पीकरों से गूंजेगा।

मोदी जी, आपको पता है, कहाँ भगत सिंह बनना है और कहाँ गांधी होना है ! आप समझदार है। रणनीति कार है। पर बड़ी मुश्किल से जागा हिंदू इस अहिंसा की पूजा में कहीं आरती करता न रह जाए, केवल तालियाँ बजाते-बजाते हाथ में केवल घंटी न रह जाए !

विचारों और सिद्धांतों को वर्तमान की बीमारियों को ठीक करने के लिए उपाय के तौर पर उपयोग में लाना चाहिए। लेकिन क्या सारी बीमारियों की दवा केवल गांधी ही है? मैं क़तई नहीं मानता। कही शांति-अहिंसा भी चाहिए। तो कहीं हिंसा करने की क्षमता का उपयोग करके हम पर हिंसा थोपने वालों को आतंकित करने की क्षमता भी चाहिए। स्वतंत्रता के बाद गांधी परिवार और सारे ही सरकारों ने आँख बंद करके एक मुखी केवल गांधी-गांधी का ही नारा दिया। देश को और भी महापुरुषों के विचारों की समसामायिक आवश्यकता है। आख़िर भारतीय मुद्रा पर केवल अकेले गांधी ही क्यों?

क्या गांधी में कुछ भी अच्छा नहीं था? यह भी में कभी नहीं कहूंगा। लेकिन उनकी अच्छाईया हिंदुस्थान का विभाजन रोक नहीं पाई। क्रांतिकारियों की फाँसी को टाल नहीं पाई। देश को सही प्रधानमंत्री दे नहीं पाई।

जब उनकी अच्छाई सारा जग बोल रहा है। कई राजनीति के लिए, कई स्वार्थ के लिए, कई अज्ञान में, तो कई भेड़चाल में। उस समय दूसरे पहलू पर मैं प्रकाश डाल रहा हू।

आशा है, गांधी भक्त मेरे असहमत होने के अधिकारों का सम्मान करेंगे।- सुरेश चव्हाणके।

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