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3 तलाक को जारी रखने की जद्दोजहद में मदनी भी… सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीम फैसले के बाद भी दे रहा ऐसा बयान तीन तलाक के पक्ष में तनकर खड़े हुए इस्लामिक मौलाना..

दो दिन पहले केंद्र की मोदी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को अंतहीन प्रताड़ना देने वाली कुरीति तीन तलाक के खिलाफ अध्यादेश जारी करते हुए मुस्लिम महिलाओं को एक सौगात दी. केंद्र के इस फैसले से मुस्लिम महिलाओं के चेहरे चमक उठे तथा उन्होंने मोदी सरकार का धन्यवाद किया लेकिन इस्लामिक मौलाना इसके बाद भी तीन तलाक के पक्ष में तनकर खड़े हो गये हैं. जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने तीन तलाक संबंधी अध्यादेश को शरीयत में जबरन हस्तक्षेप बताया है. उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान में दिए गए अधिकारों के तहत मुसलमानों के धार्मिक और शरई मामलों में अदालत या पार्लियामेंट को हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है.

मौलाना मदनी ने कहा कि कोई भी कानून या अध्यादेश जिससे शरीयत में हस्तक्षेप होता है वह मुसलमानों के लिए बिल्कुल भी मान्य नहीं होगा. मुसलमान हर स्थिति में शरीयत का पालन करना अपना प्रथम कर्तव्य समझते हैं और समझते रहेंगे. गुरुवार को जारी बयान में मौलाना महमूद मदनी ने अध्यादेश को विरोधाभासी करार देते हुए कहा कि इसमें मुस्लिम तलाकशुदा औरतों के साथ न्याय नहीं बल्कि बड़े अन्याय होने का खतरा है. इसके तहत इसकी बड़ी आशंका है कि तलाकशुदा हमेशा के लिए त्रिशंकु हो जाएं और उनके लिए दोबारा निकाह और फिर से नई जिंदगी शुरू करने का मार्ग बिल्कुल बंद हो जाए. उन्होंने कहा कि यह बड़े आश्चर्य की बात है कि कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने दो वर्षों में तलाक के राष्ट्रीय स्तर पर 201 मामलों का हवाला देकर अध्यादेश को संविधानिक अनिवार्यता बताया है. मामला या घटना चाहे एक ही क्यों न हो वो दुखदाई है मगर 16 करोड़ की आबादी वाली कम्युनिटी में वर्ष में सौ मामलों का अनुपात हरगिज संवैधानिक अनिवार्यता के क्षेत्र में नहीं आता.

मौलाना मदनी ने कहा कि सच्चाई यह है कि सरकार का यह रवैया असंसदीय, हठधर्मिता और आम सहमति को शक्ति से रौंदने के बराबर है जो किसी भी लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है. मौलाना मदनी ने कहा कि यह केंद्रीय सरकार की दूषित सोच-नीति का प्रमुख उदाहरण है कि जिस कौम के लिए यह कानून बनाया गया है उस के प्रतिनिधियों से कोई सलाह मशवरा नहीं किया गया और शरीयत के विशेषज्ञ संस्थानों और संगठनों ने इस समस्या के समाधान के लिए जो प्रस्ताव पेश किए उन्हें सभी को बिल्कुल नजरअंदाज कर दिया गया. उन्होंने कहा कि इस अध्यादेश को लेकर मुस्लिम समाज रणनीति बना रहा है.

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