विंग कमांडर अभिनंदन की तरह मूंछे रखते थे दंगाइयो से दिल्ली को बचा कर बलिदान हुए दिल्ली पुलिस के वीर रतनलाल.. और अभिनंदन जैसी ही बहादुरी से लड़े भी - Hindi News, हिंदी समाचार, Samachar, Breaking News, Latest Khabar -

विंग कमांडर अभिनंदन की तरह मूंछे रखते थे दंगाइयो से दिल्ली को बचा कर बलिदान हुए दिल्ली पुलिस के वीर रतनलाल.. और अभिनंदन जैसी ही बहादुरी से लड़े भी


ये वो देश है जहाँ पर खुद को खत्म कर के दिखाना पड़ता है नेताओ की संतुष्टि के लिए. ख़ास कर अगर आपने वर्दी पहन रखी है तब तो और भी ज्यादा. सेना पाकिस्तान में घुस कर सर्जिकल स्ट्राइक कर के आने का दावा करती है तो सबसे पहले पाकिस्तान से भी पहले भारत के ही नेता आवाज उठाने लगते हैं कि सबूत दो. जब सेना का प्रमुख आतंकियों को हद में रहने की चुनौती देता है तो उसको गली का गुंडा बोल दिया जाता है.

जब सेना के लिए उन नेताओं के मन में ऐसे भाव हैं तो पुलिस की बात ही छोड़ दीजिये. उनके लिए मुख्यमंत्री तक ठुल्ला जैसे शब्द इस्तेमाल करता है और भीड़ उस नेता को रोकने के बजाय तालियाँ बजाती है. आज भी ताली बजाने वाली भीड़ में रहने वाले लोग रहे होंगे जब उन्मादी हिंसक रूप से आगे बढ़ रहे थे. उनके निशाने पर दिल्ली का अमन चैन था.. संभव है कि बिजली पानी फ्री में किसी सरकार से मिल जाए, लेकिन अमन और सुरक्षा फ्री में नहीं बल्कि वर्दी वालों के ही दम पर आ सकती है.

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ठुल्ला, भ्रष्ट , मामू और न जाने कितने शब्द सहने वाले पुलिस बल को सूचना मिली थी कि दंगाई आगे बढ़ कर आम जनता को नुकसान पहुचा सकते हैं. वो जनता दिल्ली की थी जो अभी हाल में ही प्रचंड बहुतम से एक सरकार बना कर आराम से अपनी जीत का जश्न भी ठीक से नहीं मना पाई थी. सरकार तो सिर्फ ट्विटर पर दिखे लेकिन पुलिस तत्काल पहुच गई और ये सुनिश्चित किया कि हिंसक भीड़ जनता जनार्दन को नुकसान न पंहुचा सके.

दंगाइयो का एकमात्र उद्देश्य ही लोगों को नुकसान पहुचाना होता है. उनके उद्देश्य को दिल्ली पुलिस ने पूरा नहीं होने दिया तो उन्होंने उस अभेद्य दीवाल में ही छेड़ करने की कोशिश शुरू कर दी. यहाँ भी एक खास बात रही, जो जनता और जो पत्रकार दिल्ली पुलिस की दीवाल के पीछे सुरक्षित बचे थे, उनमे से ही कई वीडियो बना कर इस चक्कर में लगे थे कि कोई शॉट ऐसा मिल जाए जो दिल्ली पुलिस के खिलाफ हो और वो उसको वायरल कर सकें पुलिस को क्रूर बताते हुए.

पुलिस क्रूर , पुलिस निरंकुश जैसे शब्दों के बिना वर्तमान मीडिया तो दूर सोशल मीडिया में भी खबरें अधूरी सी लगती हैं . अतंकवाद का मजहब आज तक न खोज पाने वाली जनता के एक बड़े वर्ग ने पुलिस को क्रूर और भ्रष्ट मान लिया, ये उसकी बड़ी योग्यता को दर्शाता है. फिलहाल दंगइयो ने पुलिस को रास्ते से हटाने की बहुत कोशिश की लेकिन उनकी ड्यूटी थी कि उनकी जान चली जाय पर जनता बची रहे.

हुआ भी वही.. विंग कमांडर अभिनंदन को अपना आदर्श मान कर उनके जैसी ही मूंछे रखने वाले दिल्ली पुलिस के अनमोल रतन हेड कांस्टेबल रतन लाल उन उन्मादियो से जूझते हुए अमरता को प्राप्त हो गये. दिल्ली पुलिस के शाहदरा के DCP भी एक कुशल सेनापित की तरह अड़े और रहे और जब तक उनके पैरों में दम रहा तब तक एक भी दंगाई आगे नही बढ़ पाया और वीडियो बनाती जनता सुरक्षित रही.

DCP अमित शर्मा की एक सेनापति के तौर पर जांबाजी और साथी रतनलाल के बलिदान ने बाकी पुलिस बल को प्रेरित किया और दंगइयो को खदेड़ने में कामयाबी मिली.. उन्माद शांत हो गया लेकिन रतनलाल के घर से चीख और चीत्कार गूंजने लगे. उनके परिवार का एक एक सदस्य बदहवास हो गया जबकि उनका परिवार हिंसा ग्रस्त नही बल्कि सुरक्षित स्थान पर था.. वो लड़े अपने परिवार के लिए नहीं बल्कि दिल्ली की जनता के लिए.

बहुत ही मुश्किल है कि रतन लाल के बलिदान के बाद भी वो जनता पुलिस के प्रति अपनी सोच बदल पाए जिसके लिए रतनलाल ने अपना शरीर त्याग दिया. विंग कमांडर अभिनंदन पाकिस्तान से सुरक्षित और जीवित निकाल लिए गये लेकिन भारत में ही पड़ने वाले शाहदरा क्षेत्र के मौजपुर इलाके से रतनलाल को नहीं बचाया जा सका. ये तथ्य भी सोचने और समझने के लिए बहुत सवाल छोड़ गया है.

रतनलाल लड़े भी अभिनंदन के अंदाज़ में. उन्होंने घाव और बहते खून की चिंता नही की और डटे रहे. अभिनंदन और रतनलाल में एक अंतर ये भी था कि अभिनंदन दुश्मनों पर बम बरसाने के लिए स्वतंत्र थे लेकिन यहाँ रतनलाल के आगे वो थे जो बिना कोई कागज़ दिखाने की धमकी के साथ, पुलिस वालों की जान ले कर भी संविधान के रक्षक बने हुए है. अब ये जनता और सरकार को तय करना है कि रतनलाल के बलिदान से संविधान कितना सुरक्षित हुआ ?

दंगइयो को पुलिस की लाठी लग जाने पर उनकी कराह दिल्ली की संसद तक सुनाई देती रही. कांग्रेस पार्टी की प्रियंका गांधी ने तो उनके लिए मानवाधिकार का दरवाजा खटखटा डाला, पर रतनलाल मानव में आते हैं या नहीं ये शायद वही दल अभी तय कर रहे हैं. अगर तत्काल सहमत होते तो अब तक उनके घरों की तरफ भी तथाकथित सेक्युलर नेताओं के काफिले निकल गये होते और दंगइयो के खिलाफ मानवाधिकार से ले कर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं पड़ चुकी होतीं.

यहाँ उन नेताओं से भी सवाल है जो UP पुलिस और दिल्ली पुलिस के लगातार दुश्मन बने हुए हैं ? पुलिस का दुश्मन बनना बाकी देशो में भले ही अपराध में शामिल माना जाता हो लेकिन भारत के विशेषकर उत्तर भारत में संविधान का पालन माना जाता है. फ़िलहाल सुदर्शन न्यूज़ वीरता की बलिवेदी पर चढ़ गये रतनलाल को बारंबार नमन करते हुए DCP सहित बाकी घायल पुलिसकर्मियों के जल्द से जल्द स्वस्थ होने की कामना करता है.

रिपोर्ट – 

राहुल पाण्डेय 

सुदर्शन न्यूज़ 

मोबाईल – 9598805228

 


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