दिल्ली में "शरिया कानून" लागू करने की चाह रखने वालों को रोकने की जिम्मेदारी अंग्रेजो द्वारा 1861 में बनाये कानून "पुलिस एक्ट" को मिली थी.. कांस्टेबल रतनलाल मरते न तो क्या करते ? - Hindi News, हिंदी समाचार, Samachar, Breaking News, Latest Khabar -

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दिल्ली में “शरिया कानून” लागू करने की चाह रखने वालों को रोकने की जिम्मेदारी अंग्रेजो द्वारा 1861 में बनाये कानून “पुलिस एक्ट” को मिली थी.. कांस्टेबल रतनलाल मरते न तो क्या करते ?


हर तरफ आधुनिकता की पैरवी हो रही है. लेकिन सबसे खास बात ये है कि ये तथाकथित आधुनिकता नए फैशन के कपड़े पहनने में, आधुनिक अंदाज़ में बाल कटवाने, रातो में नाईट क्लब खोलने, समान लिंग में विवाह करने , लिव इन रिलेशन में रहने जैसे मुद्दों तक ही सीमित रह गई है. जिस चीज से पूरे समाज और देश की आंतरिक सुरक्षा जुडी है उसकी आधुनिकता की बात करना भी उचित नहीं समझा जा सकता है. और ये आधुनिकता है पुलिस का आधुनिकीकरण जो फिलहाल असंभव दिखाई दे रही है..

पिछले दिनों दिल्ली पुलिस के जांबाज़ कांस्टेबल के बलिदान ने हर किसी को रुलाया था. बड़े बड़े जुलूस निकले और मांग हुई कि हेडकांस्टेबल रतनलाल के हत्यारों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाय. लेकिन आगे से कोई कांस्टेबल रतनलाल न बने इस पर किसी ने चर्चा नही की. दिल्ली के दंगो का अगर विस्तृत परीक्षण वृहद रूप में किया जाय तो ये एक लड़ाई थी भारत में शरिया कानून लागू करने की चाह रखने वालों से उन वर्दी वालों की जो अंग्रेजो के समय काल अर्थात 1861 के पुलिस एक्ट में बंधे थे.

दंगाई पूरी तरह से मुक्त थे. वो बम भी चला रहे थे , चाकू भी लहरा रहे थे , गोलियां भी बरसा रहे थे लेकिन पुलिस वाले पूरी तरह से बंधे थे जिसमे सबसे बड़ा बंधन था 1861 में अंगेजी काल का बना पुलिस एक्ट जिसमे अराजपत्रित अधिकारियो के लिए क्या प्रावधान है, इसको हेडकांस्टेबल रतनलाल विधिवत जानते थे. जानकार ये मानते हैं कि इस एक्ट ने पुलिस को बिना दांत और नाखून का शेर बना रखा है जो गुर्रा तो सकता है लेकिन उसके आगे सीमा समाप्त हो जाती है. फिलहाल मोबाईल के पत्रकारिता वाले समय में अब गुर्राना भी बंद है.

अगर एक बार भी पुलिस ने अपनी जान बचाने के लिए बंदूकें खोल दी होती तो आज उन सभी पुलिस वालों का वही हाल होता जो 6 साल से प्रयागराज कचेहरी में अपनी जिन्दगी बचाने वाले सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह का हो रहा है.. वो सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र जिसका परिवार तबाह हो चुका है और एक पल भी जेल से बाहर नहीं आ पाया. हैरानी की बात ये है कि 1861 के कानून से खुद उस ब्रिटेन की पुलिस भी अब नहीं संचालित है जिसने भारत में ये कानून लागू किया था.. लेकिन भारत में न जाने क्या सोच कर वही ढोया जा रहा.

ऐसा नही है कि 1861 के बाद अपराधी हाईटेक नहीं हुए. पैदल अपराध करने वाले अपराधी अब फास्ट वेहिकल प्रयोग कर रहे हैं लेकिन पुलिस वही की वहीँ है. मतबल 2020 के अपराधी का मुकबला सन 1861 की पुलिस से है. अंतिम फैसला क्या आएगा, इसको आप खुद ही सोच और समझ सकते हैं. बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि कई जगहों पर इसी एक्ट के चलते पुलिस वाला साइकिल का भत्ता पा रहा है.. साईकिल सवार पुलिस वाला जब सामने आता होगा तो खुद में सन 1861 का दृश्य सामने नाच जाता होगा.

अगर न्याय की मांग हो दिल्ली पुलिस के बलिदानी रतनलाल के लिए तो तलाशना होगा कि उनकी वीरगति का दोषी कौन ? फिर सामने दंगाई और हत्यारे जरूर पहले दोषी साबित होंगे..लेकिन उसके बाद कटघरे में उस नियम और कानून को भी खड़ा किया जाय तो पुलिस वालों को हथियार चलाने के लिए रोक रखा था और दुर्दांत दंगाइयो के आगे भागने का ही विकल्प दिया. सवाल ये भी है कि अगर उसी हत्यारी भीड़ के ऊपर कुछ पुलिस वाले अपनी बन्दूको का मुह खोल दिए होते तो आज उनके साथ क्या हो रहा होता ? सवाल ये है कि दंगाइयो से घिरे उन दर्जनों पुलिस वालों के पास जिन्दा रहने के कितने और क्या क्या विकल्प थे ?

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने इस बीच में खुले मंचो और संसद के अन्दर पुलिस वालों का खुल कर पक्ष लिया लेकिन जो बुनियादी कार्य है उसकी तरफ अभी तक एक कदम भी नही बढाया गया. पुलिस एक्ट का पुनरवलोकन हो और जिन वर्दी वालों पर तानाशाही करने का आरोप लगता है, वो वर्दी वाले खुद कितनी तानाशाही के शिकार हैं इसको देखा जाय. ये न सिर्फ आगे से किसी कांस्टेबल रतनलाल की हत्या नहीं होने देगा बल्कि आत्महत्या करने वाले कई वर्दी वालों के भी जीने का सहारा बनेगा.

लिंक में देखिये सुदर्शन न्यूज़ के प्रधान सम्पादक सुरेश चव्हाणके जी ने कब कब उठाई 1861 एक्ट खत्म करने और पुलिस वालों को अतिरिक्त अधिकार व सुविधा देने की मांग – 

पूर्व गृहराज्यमंत्री हंसराज अहीर से – 

https://www.youtube.com/watch?v=EoCT0fDwxm4&t=28s

UP के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से –

https://www.youtube.com/watch?v=YB4Rl6TpDhc&t=17s

पुलिस के मानवाधिकार पर बिंदास बोल –

https://www.youtube.com/watch?v=qv9EebpaG9Q&t=2s

इनकाऊँटर पर सवाल उठाने वालो को जवाब –

https://www.youtube.com/watch?v=jmAWZLjpm-Y

रिपोर्ट –

राहुल पाण्डेय 

सुदर्शन न्यूज़ – मुख्यालय नोएडा 

मोबाईल – 9598805228

 


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