“हिन्दू शिक्षक से ही पढ़ेंगे संस्कृत.. पढाई छोड़ देंगे पर मुसलमान शिक्षक स्वीकार नहीं”.. धरने पर बैठ गये उस यूनिवसिर्टी के छात्र जिसके नाम में है “हिन्दू”


ये वो विश्वविद्यालय है जिसको नकली सेक्युलर शक्तियों के विरोध में महामना मदनमोहन मालवीय जी ने स्थापित करवाया था. ये वो समय था जब देश में मुस्लिम यूनिवर्सिटी को स्थापित करना देश के विकास में मील का पत्थर माना जाता था, लेकिन जैसे ही बात हिन्दू की आती थी तत्कालीन सत्ताधीश असहज महसूस करने लगते थे.. वामपंथी और कांग्रेसी विचारधारा के प्रभाव के समय वाराणसी में स्थापित हुआ था BHU . अर्थात बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी ..

यद्दपि इस बीच जान बूझ कर इस संस्कारी और उच्च स्तर के विश्वविद्यालय की छवि को खराब करने के लिए तमाम विवाद को हवा दी गई और वहां के छात्र छात्राओं को एक अलग ही रूप में दिखाने की साजिश रची गई.. जब उसमे भी सफलता नहीं मिली तो अब वो नियम लागू कर दिए गये जो वहां इस से पहले कभी थे ही नहीं.. यहाँ पर अभी हाल में ही मुहर्रम के समय पहली बार ताजिया निकली गई थी जो भी इतिहास में पहली घटना थी और उसका विरोध भी किया गया था.

अब बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के छात्रो को संस्कृत जैसा विषय पढाने के लिए मुस्लिम शिक्षक नियुक्त कर दिया गया है जिसके विरोध में छात्र सडको पर उतर गये हैं.. छात्रों ने हिन्दू संस्कार में ढोल मजीरे बजा कर कुलपति के आवास का घेराव किया है और कहा है की कुछ भी हो जाए वो संस्कृत किसी हिन्दू शिक्षक से ही पढ़ेंगे.. जब विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रो को मनाने में कामयाब नहीं हो पाया तो आखिरकार पुलिस बुलाई गई है और पुलिस ने वहां डेरा डाल दिया है..

छात्रों ने आरोप लगाया है कि संस्कृत पढ़ाने के लिए जिस शिक्षक की नियुक्ति की गई है वह नियमों के मुताबिक नहीं है. एक छात्र ने दावा किया कि शिक्षक की नियुक्ति पैसे लेकर की गई है. छात्र ने आजतक के साथ बातचीत में कहा कि विभाग के डीन और दूसरे प्रोफेसर का कहना है कि नये शिक्षक की नियुक्ति दबाव में की गई है. छात्र अब इस मुस्लिम शिक्षक की नियुक्ति रद्द करने की मांग कर रहे हैं. स्कृत विभाग के बाहर लगे शिलापट्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि उस पर साफ लिखा हुआ है कि किसी भी गैर हिन्दू धर्म के व्यक्ति का उस संस्थान में प्रवेश वर्जित है. एक छात्र ने कहा कि जब गैर हिन्दू का उस संस्थान में प्रवेश वर्जित है तो फिर ये नियुक्ति सही कैसे हो सकती है.


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