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जहाँ ज्यादा दमन होता है वहां असंतोष फैलता ही है.. वो चाहे पुलिस हो या कोई और …


ये सच है कि उसने नौकरी का फार्म भरते समय ये लिख कर दिया है कि वो न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक मापदंड पर खरे उतरेंगे और किसी भी धरना प्रदर्शन आदि का हिस्सा कभी नहीं बनेगे परन्तु उसके साथ ये भी याद रखना होगा कि उन्होंने ये भी लिख कर नही दिया है कि उसको जो चाहो वो करो वो उफ़ तक नहीं करेगा… पीड़ा, क्षोभ ये सब इंसानी स्वभाव में है, चाहे वो इन्सान काले कोट के अन्दर हो या फिर खाकी वर्दी में .. इसको वो इंसान भी बेहतर जानते होंगे जो सफेद कुर्ते पहनते हैं..

दिल्ली पुलिस का दर्द खुल कर बाहर आ गया है और वो दर्द इस समय दिल्ली पुलिस के मुख्यालय पर साफ साफ़ देखा जा सकता है.. शायद इस अंदाज़ में पहली बार आंदोलित हुई है दिल्ली पुलिस और साथ ही एक संदेश जैसा दे रही है बाकी तमाम राज्यों की पुलिस को क्योकि इसकी धमक पूरे भारत में है . अब तक न्याय मांगने के लिए कोई व्यक्ति पुलिस के पास जाता था लेकिन जब पुलिस को लगा की वो खुद ही अन्याय की शिकार है, तब वो खुद ही उतर गई अपने लिए न्याय मांगने..

राजनेताओं के साथ सर्वोच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों ने यकीनन इतिहास की परीक्षा पास कर के वो पद पाए होंगे.. उन्होंने ये जरूर पढ़ा होगा कि इतिहास में जब – २ और जहाँ जहाँ भी अनावश्यक दमन किया गया है, तब – २ और वहां – २ असंतोष पैदा हुआ है और उस असंतोष की चपेट में कोई एक व्यकित नही बल्कि पूरा समाज आया है. दिन भर ठुल्ला , घूसखोर जैसे शब्द सुन कर भी ड्यूटी पर डटे रहने की कला सिर्फ एक विभाग के पास है और वो है पुलिस .. लेकिन कहीं न कहीं इसकी अति ही कर दी गई.

मुखर्जी नगर मामले में जिस प्रकार से सत्ता तक ने घुटने टेके थे उसका घाव पहले से ही पुलिस वालों के था . अब तीस हजारी में वही सब नासूर बन गया. इससे पहले भी कई ऐसे मामले आये हैं जो सीधे सीधे एकतरफा ही कहे जायेंगे उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के समय में अन्याय के शिकार हुए सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह, जो वकीलों की भीड़ से घिरे होने के बाद अपनी जान बचाने का दंड ऐसा पाए कि शायद उस से बेहतर उन्हें मौत लग रही होगी.. पर नई सरकार शायद अखिलेश यादव के उस काम से सहमत है और सब इंस्पेक्टर को न्याय दिलाने की दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढाया.

ठीक इसी प्रकार से उत्तर प्रदेश में सीतापुर के पुलिस अधीक्षक के आगे उनके सब इंस्पेक्टर को वकीलों ने पीटा था और बाद में पुलिस अधीक्षक का मोबाईल छीन लिया.. पुलिस वाला भले ही आतंकियों को पकड़ने की दबिश देते समय बिलकुल न विचलित हो पर अदालत जाते समय बड़े से बड़े पुलिस वाले अजीब से दबाव में दीखते हैं.. इसके बाद भी कभी अनुशासन के नाम पर तो कभी किसी और बहाने से एकतरफा उन्ही को बलि का बकरा बनाया जाता रहा है जिसका प्रतिफल अब सामने देखने को मिल रहा है..

निश्चित तौर पर शासन को अब 1861 में बने उस कानून की समीक्षा करनी ही होगी जो वर्तमान समय में न जाने कितने पुलिस वालों की बेइज्जती के साथ आत्महत्या तक का जिम्मेदार बन चुका है.. प्रधानमन्त्री का मेक इन इण्डिया कार्यक्रम तब ही सफल होगा जब देश की आंतरिक सुरक्षा की रीढ़ पुलिस विभाग भी मेक इन इण्डिया के कानून से चलेगी.. अगर इसको नहीं बदला गया तो पुलिस ऐसे बदलाव में दिखती रहेगी जो दिल्ली में दिखाई दे रही है ..

रिपोर्ट –

राहुल पाण्डेय

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज 

नोएडा मुख्यालय 

मोबाईल – 9598805228


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