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क्या सच में भारत में मुसलमानों के साथ अन्याय हुआ या मिला जरूरत से ज्यादा ? जानिये


हम आपको एक बात बिल्कुल स्पष्ट कर देते है, कि जो लोग ये सोच रहे है कि इस बिल के आने से धर्म का बंटवारा हो रहा है, मुस्लिमों के खिलाफ नाइंसाफी हो रही है, तो ये बिल्कुल गलत है… गलत क्यों है ये भी हम आपको बता देते है… प्राचीन काल से चक्रवर्ती हिन्दू सम्राटों का इतिहास रहा है कि उन्होंने भारत के गौरवशाली इतिहास में कभी भी किसी भी धर्म को लेकर किसी के खिलाफ कोई ना-इंसाफी नहीं की है, महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी के राज्य में कभी मजहब को ले कर भेदभाव नहीं किया गया,.

हां वहां से जरूर प्रताड़ना की खबरे लगातार आती रहीं जहाँ हिन्दू की संख्या कम हुई. मुगल काल में तो हिन्दुओ के सामूहिक नरसंहार और उनके घरों को लूटने के अनगिनत उदहारण मौजूद हैं…फिलहाल आते हैं आज के मुद्दे पर, यही बात गृहमंत्री अमित के बयान में भी आपने सुनी होगी… भारत में संविधान के अनुसार सभी धर्मों के लोगों को एक समान ही माना गया है, और सभी को समान अधिकार भी प्राप्त हुए है… जिन लोगों को ये लगता है कि मुसलमानों के साथ कभी समान बर्ताव नहीं हुआ या उन्हे कोई अधिकार प्राप्त नहीं हुआ है, तो वो इस बात को जरा गौर से सुने…

नागरिकता संशोधन बिल पर कई राजनीतिक पार्टियां दुषप्रचार कर रही है, लेकिन आज एक 17 वर्ष पुराने दुषप्रचार पर भी ब्रेक लग गया है… देश पर सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षा सोनिया गांधी का एक स्टेटमेंट हम आपको बताते है, जिसमें वो साफ कह रही है कि आज का दिन काला-दिन के रूप में मनाया जाएगा… वो अपने एक स्टेटमेंट में पूर्वजों की बात करती है… आज हम भी पूर्वजों की ही बात करना चाहते है… कांग्रेस पार्टी के जो पूर्वज थे उन्होनें धर्म के आधार पर 1947 में देश के विभाजन को रोकने के लिए क्या किया ???  वो देश के विभाजन को क्यों नहीं रोक पाए ???

आपको स्कूलों में पढ़ाया है कॉलेजों में पढ़ाया है, फिर एक ईको सिस्टम आपके आस-पास बना दिया गया है औऱ आप उन्हीं बातों में विश्वास करते चले गए… इसी तरह से धर्म- निरपेक्षता की जो परिभाषा है वो आपके मन में भर दी है औऱ बता दिया है कि धर्म- निरपेक्षता तब-तक पूरी नहीं होगी जब-तक उसमें मुस्लमानों का नाम नहीं आएगा… जबकि सच्चाई ये है कि इस देश में जितने भी मुस्लमान यहां रह रहे है वो अच्छे से रह रहे है औऱ उनके भविष्य को किसी भी प्रकार का कोई खतरा नहीं है औऱ बिल के आने के बाद भी… जबकि ये कहना गलत नहीं होगा कि मुसलमानों को बहुसंख्यक हिन्दुओ से भी ज्यादा अधिकार दिए गये और उनका ज्यादा ध्यान रखा गया है.

अगर उदहारण के रूप में देखा जाय तो हिन्दुओ का कोई भी पर्सनल लॉ बोर्ड नहीं बनाया गया जबकि आज भी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड वजूद में है जो आये दिन सरकार से किसी ने किसी मुद्दे पर दो दो हाथ करने को तैयार रहता है..

हिन्दुओ को किसी भी तीर्थयात्रा पर आज तक सब्सिडी नहीं दी गई जबकि कई स्थानों पर तो अतिरिक्त टैक्स वसूला जाता रहा लेकिन मुस्लिमों को हज यात्रा पर भेजने के लिए सरकारी अनुदान से सब्सिडी मिलती रही.

आज तक किसी भी नेता ने हिन्दू शब्द भी कहा तो उसको साम्प्रदायिक घोषित कर डाला गया लेकिन पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने तो खुल कर एलान किया था कि देश के संसाधनो पर पहला अधिकार मुसलमानों का है.

इतिहास में शायद किसी किसी मन्दिर को मजहबी उन्माद से बचाने के लिए गोली चलवाई गई हो लेकिन बाबरी ढांचे को बचाने के लिए सीधे गोलियां बरसाई गई और उसकी बाकायदा ढोल पीट कर जिम्मेदारी भी ली गई.. इस मामले में मानवाधिकार आयोग भी खामोश रहा.

आज़ादी के पहले भी तुर्की तक के खलीफा के लिए इस देश में आन्दोलन किये गये. आज भी यहाँ फिलिस्तीन , मयन्मार और चीन तक के मुसलमानों के लिए ज्ञापन और प्रदर्शन देखने को मिल जाया करते हैं.

इसी के साथ मुस्लिम बहुल राज्य कश्मीर में विशेष धारा 370 लगा कर उनको लम्बे समय तक विशेषाधिकार दिए जाते रहे जो वर्तमान सरकार के साहस से खत्म हो पाया .

मदरसों को अनुदान और उनके शिक्षको को समय से वेतन मिलना भी यहाँ अनवरत जारी रहा.

देश के स्थाई निवासी मुसलमानों की बात तो दूर ममता बनर्जी जैसी मुख्यमंत्री ने तो बाहर से आये घुसपैठियों तक के लिए केंद्र सरकार से तकरार कर डाली.इसके भी अलावा ऐसे तमाम मुद्दे हैं जो बताने में पूरा दिन बीत जाएगा.. लेकिन क्या ऊपर कही गई बातें ये साबित करने के लिए काफी नहीं हैं कि डर जैसा शब्द मात्र एक साजिश या राजनैतिक हथकंडा है विदेशो में भारत की मजबूत होती छवि को धूमिल करने के लिए ? फिलहाल फैसला आप पर छोड़ा जा रहा है, आशा है कि आपने अब तक काफी कुछ आंकलन कर लिया होगा.

 


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