कुछ सिद्धांतों में ये भी पक्के निकले , भले ही जनता का निर्णय कुछ भी हो


अक्सर चुनावों में जीत – हार के लिए सिद्धांतों की बलि चढ़ते हम सब ने देखा होगा , और शायद ही कोई पार्टी इस से अछूती हो  …

पर कुछ विपक्षी पार्टियों का एक सिद्धांत काफी समय से एक ही रहा जो लेशमात्र भी नहीं बदला भले ही जनता चीख चीख कर कहती हो कि वो एक बार अपने फैसले पर पुनर्विचार करें  …

हर चुनावों में एक जैसा रहने वाला वो अटल सिद्धांत है- ” स्वयं को सेकुलर कहते हुए एक पार्टी को लगातार साम्प्रदायिक बताना”

उत्तर प्रदेश से पहले भारत का जनमत उनके इस सिद्धांत को झुठला चूका था फिर भी वो खास वर्ग अपने स्वरचित सिद्धांत से इंचमात्र भी हटने को तैयार नहीं …  एक के बाद एक प्रदेश के जनमत भी उनके इस सिद्धांत को चुनौती दे रहे हैं पर वो अपने स्वरचित सिद्धान्त से ज़रा सा भी हटने को तैयार नहीं  ..

सेकुलर और साम्प्रदयिक के इस अटल सिद्धांत से किस पार्टी का भला होगा या किस पार्टी का नुक्सान होगा ये अभी भविष्य के गर्भ में है पर जनता के जनादेश के आगे डटकर खड़े हो कर अपने सिद्धांत को सही मानने कि दृढ़ता काबिल ए तारीफ़ है ..


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