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दिल्ली का जीसस एंड मैरी स्कूल चाहता है केवल कैथोलिक प्रिंसिपल लेकिन BHU में संस्कृत पढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया मुस्लिम शिक्षक.. हरा तरफ विरोध के स्वर


इधर देश की राजधानी दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय JNU के कथित बवाली छात्र सस्ती फीस की मांग के नाम पर दिल्ली की सड़कों पर उन्माद फैला रहे थे, ठीक उसी समय माँ गंगा की गोद में स्थित देश की प्रतिष्ठित बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय BHU अचानक से ट्रेंड में आ गया. JNU के कथित बवाली छात्रों के उन्माद को एक्सपोज करने के बजाय देश की ज्यादातर मीडिया तथा कथित सेक्यूलर बुद्धिजीवी, जिन्हें पीएम मोदी ने खान मार्केट गैंग का नाम दिया था, BHU को निशाने पर लेने लग गये.

दरअसल BHU में संस्कृत पढ़ाने के लिए मुस्लिम शिक्षक फिरोज की नियुक्त की गई है, जिसका विरोध BHU के छात्र कर रहे हैं. छात्रों का कहना है कि BHU की स्थापना के समय से ही ये नियम रहा है कि संस्कृत पढ़ाने के लिए हिन्दू शिक्षक ही नियुक्त किया जाएगा, तब फिरोज की नियुक्ति क्यों की गई है? शिक्षक फिरोज के तबादले के लिए यूनिवर्सिटी के ज्यादातर छात्र धरने पर हैं. छात्रों का कहना है कि उन्हें शिक्षक फिरोज से समस्या नहीं है लेकिन संस्कृत पढ़ाने के लिए जो हमारे सांस्कृतिक मापदंड होते हैं, उस पर फिरोज खरे नहीं उतरते, इसलिए हम उनसे संस्कृत नहीं पढ़ सकते हैं.

बस फिर क्या था, देश की लिबरल मीडिया तथा कथित सेक्यूलर बुद्धिजीवियों को मसाला मिल गया तथा उन्होंने BHU के इन छात्रों को सांप्रदायिक तथा उन्मादी घोषित कर दिया. देश की राजधानी दिल्ली में बैठकर ये लोग BHU के इन छात्रों को उन्मादी घोषित करने में ये लोग दिल्ली में ही स्थित DU से संबंधित जीसस एंड मैरी कॉलेज पर पूरी तरह चुप्पी साध गये हैं. बता दें कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के जीसस एंड मैरी कॉलेज  विज्ञापन दिया हैं कि केवल और केवल बपतिस्मा सर्टिफिकेट और किसी चर्च के पादरी द्वारा “ईसाई” होने के प्रमाणपत्र के बाद ही “कॉलेज में प्रिंसिपल” की नौकरी मिलेगी.

अर्थात अगर आप ईसाई नहीं है तो आपको नौकरी नहीं मिलेगी. यहां सुदर्शन सवाल करता है कि अगर सिर्फ संस्कृत पढ़ाने के लिए मुस्लिम शिक्षक की नियुक्ति का विरोध करने वाले BHU के छात्र गलत हैं जब DU से जुड़ा हुआ जीसस एंड मैरी कॉलेज गलत क्यों नहीं है? अगर संस्कृत पढ़ाने के लिए फिरोज की नियुक्ति का विरोध करने वाले BHU के छात्र उन्मादी तथा सांप्रदायिक हैं तब पूरा का पूरा जीसस एंड मैरी कॉलेज सांप्रदायिक क्यों नहीं है?

दरअसल ये वो मानसिकता है जो हिन्दू शब्द को ही निशाने पर लेने का मौक़ा तलाशती है तथा ये मौक़ा मिलते ही उस पर गिद्ध की तरह टूट पड़ती है. लेकिन जब जीसस एंड मैरी कॉलेज सरेआम ये एलान करता है कि इस कॉलेज में वही व्यक्ति प्रिंसिपल बन सकता है जो ईसाई हो. गैर ईसाई को नौकरी नहीं दी जा सकती है तब ये मानसिकता चुप्पी साध लेती है. शायद इसे ही छद्म सेक्यूलरिज्म कहा जाता है जिसके जहर से देश लंबे समय से संक्रमित होता रहा है तथा जिसकी अब सफाई हो रही है.


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