वाराणसी को बंगाल बनने से बचाने वाले जांबाज़ पुलिस इंस्पेक्टर के खिलाफ शुरू हो गई जांच. बहादुरी से खदेड़ा था उन्मादी भीड़ को


उस पुलिस वाले के आगे २ रास्ते बचे थे, पहला कि जो कुछ भी हो रहा था उसको चुपचाप देखता और केवल वायरलेस पर अपने अधिकारियो को मूकदर्शक बना बताता रहता लेकिन दूसरा ये कि न सिर्फ अधिकारियो को सूचित करना बल्कि अपनी तरफ से भी आगे बढ़ कर एक पूरी भीड़ का सामना करना जो अपने हाथो में तख्तियां और अन्दर न जाने क्या छिपा कर आई थी. पुलिस वाले ने बहादुरी का रास्ता चुना और अब वही बहादुरी उस पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है.

अभी हाल में ही हैदराबाद पुलिस के द्वारा बलात्कारियो को ढेर करने की घटना पर पूरे भारत ने ताली बजाई थी. उसी मामले में एक खास पहलू ये था कि उस पुलिस टीम के मुखिया सज्ज्नार जी ने पूरी टीम की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली और एक कुशल सेनापति की तरह न सिर्फ एनकाऊंटर पर सवाल उठाने वालों को जवाब दिया बल्कि मीडिया से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक खुद आग खड़े हो कर ये बताते रहे कि पुलिस अधीनस्थ स्टाफ ने जो भी किया वो समय की मांग थी.

लेकिन कदाचित ऐसे अधिकारियो का अब अभाव है और ऐसे प्रदेश के शासको का भी. बात हो रही है वाराणसी के थाना जैतपुर क्षेत्र की.. यहाँ पर इंस्पेक्टर शशिभूषण जी नागरिकता संसोधन बिल के बाद बने हालत पर नजर गडाए हुए थे. यही इंस्पेक्टर अयोध्या प्रकरण के फैसले के बाद भी उच्चतम स्तर पर सतकर्ता के चलते अपने क्षेत्र को शांत और सौहार्दपूर्ण रखने में सफल रहे थे. नागरिकता संसोधन बिल के बाद अचानक ही सोशल मीडिया पर कुछ हलचल देखी गई.

उसके बाद सहारनपुर के देवबंद में एक ख़ास वर्ग के लोगों ने पथराव किया और पुलिस के साथ सत्ता को सीधी चुनौती दी. ये खबर उत्तर प्रदेश के बाकी पुलिस बल के लिए एक सबक थी और उसी सबक को सीख कर इंस्पेक्टर जैतपुर शशि भूषण अपने क्षेत्र में होने वाली एक एक गतिविधि पर नजर रखे हुए थे. अचानक ही उनकी जानकारी में आया कि बिना अनुमति के कुछ प्रदर्शनकारी एक स्थान पर जमा हो रहे हैं, इस से पहले कि वहां भीड़ बढती , वो पुलिस बल के साथ पहुच गये.

सहारनपुर में हुए प्रदर्शन के बाद अमित शाह , नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ के खिलाफ मुर्दाबाद जैसे नारे लगे थे जिसके बाद क्षेत्र में तनाव फ़ैल गया था. इसको ध्यान में रखते हुए इंस्पेक्टर शशि भूषण ने कोई चूक नहीं की और इस से पहले कि भीड़ उन्मादी हो उसके आगे चट्टान की तरह खड़े हो गये. इंस्पेक्टर शशि भूषण के पास पुलिस बल सीमित संख्या में था और भीड़ अपेक्षाकृत बड़ी थी. उनके आने से पहले वहां पहले से मौजूद पुलिस बल ने उस भीड़ को अपने हिसाब से रोकने की कोशिश की थी जिसे वो नहीं माने थे.

इंस्पेक्टर जैतपुर के साथ पूरे वाराणसी को ये मालूम था कि जैतपुर में लगने वाला कोई भी बड़ा जाम पूरे काशी की यातायात व्यवस्था को चरमरा सकता है, इसी के साथ वहां से उडी कोई अफवाह भी न सिर्फ काशी क्षेत्र बल्कि पूरे प्रदेश में चिंगारी भडकाने का काम कर सकती थी, साथ ही वो क्षेत्र प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है जहाँ की एक छोटी सी भूल दिल्ली की संसद तक गूंजती, जैतपुर क्षेत्र से कई हिन्दू तीर्थयात्री महाकाल के दर्शन के लिए भी जाते हैं जिसमें से कुछ उन्मादी नारों से भडक सकते थे.

इसी के साथ वाराणसी के चप्पे चप्पे पर विदेशी नागरिक देखे जाते हैं, किसी एक के साथ भी भीड़ द्वारा होने वाली कोई अप्रिय घटना न सिर्फ देश बल्कि विदेश में भी भारत की साख पर बट्टा लगा सकती थी और देश के पर्यटन को बुरी तरह से प्रभावित कर सकती थी.. ये सब कुछ उस भीड़ को देख कर इंस्पेक्टर शशिभूषण के दिमाग में चल रहा था.. भीड़ के रूप में हिंसा को मॉब लिंचिग का नाम दे कर इस से पहले भी आजम खान जैसे लोग संयुक्त राष्ट्र संघ तक जाने की बात कर चुके हैं.

समय बेहद कम था और उसी कम समय में इंस्पेक्टर शशिभूषण को निर्णय लेना था..वहां प्रदर्शन उस NRC के लिए भी होने जा रहा था जिसका फ़िलहाल अभी कोई नामोनिशान भी नही है. आखिरकार कम संख्या में मौजूद पुलिस बल द्वारा जब शुरुआत में समझाने से भीड़ नहीं मानी तो उन्होंने अपने तेवर सख्त किये और उसी सख्त तेवरों में से कुछ शब्द निकाल कर उसकी वीडियो बनाने के बाद उन्ही पर कार्यवाही मांगी जाने लगी. बाकायदा सोशल मीडिया में उनके वीडियो घुमाए जाने लगे और उनको एक अनुशासनहीन पुलिस अधिकारी कहा जाने लगा.

अगर इसकी तह तक जाया जाये तो ये एक खिसियाहट के रूप में सामने आएगी जो वो भीड़ को संचलित करने वाले कुछ खास लोग अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाए.. लेकिन यहाँ हैरानी की बात ये है कि इस मामले में वाराणसी पुलिस उच्चाधिकारियों ने पल भर में सरेंडर जैसा करते हुए वाराणसी को बंगाल बनने से बचाने वाले इंस्पेक्टर पर ही जांच बिठा दी और जांचोपरांत कार्यवाही का दिलासा उन्हें देने लगे जो बिना अनुमति के जमा हुए थे धार्मिक नगरी में अधर्म फैलाने के लिए.

पिछले कुछ समय में उत्तर प्रदेश में कई ऐसे मामले सामने आये हैं जिसमे मनोबल बढने के बजाय वर्दी वालों का मनोबल गिरा नहीं बल्कि अपनों के द्वारा ही गिराया गया है. ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद अब जनता का एक पक्ष इंस्पेक्टर शशि भूषण के पक्ष में उतरता दिखाई दे रहा है. फिलहाल जांच रिपोर्ट की प्रतीक्षा है लेकिन इतना तो तय है कि अन्याय करने पर आमादा उस भीड़ ने अपने कुकृत्य से ध्यान हटा कर सारा ध्यान पुलिस पर डालने में सफलता पा ली है..

आतंक , उन्माद और अपराध से लडती उत्तर प्रदेश के पुलिस बल के लिए ऐसी भीड़ को तितर बितर करना भले ही कुछ पलों का काम हो लेकिन ऊपर से चलने वाली जांच को झेलने में उनके कंधे घायल हो जाते हैं. फिलहाल इस मामले में आम जनता मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरफ भी देख रही है और सवाल कर रही है कि गलत कौन ? वो भीड़ जो जमा हुई थी कुछ गलत करने के लिए या वो इंस्पेक्टर जिसने कुछ भी गलत नहीं होने दिया वहां पर.

रिपोर्ट –

राहुल पाण्डेय 

सुदर्शन न्यूज़ – नोएडा मुख्यालय 

मोबाईल – 9598805228


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