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असम में बोडो के असम पुलिस से हाथ मिलाने के बाद बंगलादेशी घुसपैठियों में मातम और हलचल जबकि राष्ट्रभक्तों में ख़ुशी की लहर


बहुत कम लोग ही जानते हैं कि असम में बोडो ने वो संघर्ष किया है अपने अस्त्तिव को बचाने के लिए जिसकी मिसाल शायद ही कहीं कोई और देखने को मिली हो. जिस प्रकार से कश्मीर से अचानक ही हमला कर के वहां के हिन्दुओ को निकल जाने पर मजबूर कर दिया गया था वैसे ही बंगलादेशी घुसपैठियों से भरे असम में बोडो के ऊपर कई जिहादी हमले हुए थे लेकिन उन्होंने किसी भी हालात में पीछे न हटने का इरादा रखा था और हर जिहादी हमले का मुहतोड़ जवाब दिया था.

बोडो दो तरफा लड़ाई लड़ रहे थे. एक तरफ बंगलादेशी घुसपैठी थे जो न सिर्फ धर्मांतरण बल्कि लव जिहाद और हथियारों से लड़ाई लड़ रहे थे और आये दिन बोडो पर हमले किये जा रहे थे तो दूसरी तरफ वो तथाकथित सेक्युलर राजनीति थी जो बंगलादेशी घुसपैठियों को कभी भी किसी भी रूप में गलत मानने को तैयार नहीं थी. आज जिस प्रकार से CAA और NRC के नाम पर घुसपैठ को सही ठहराने की कोशिश हो रही है उस से समझा जा सकता है कि असम में इन दंगाइयो को कितना समर्थन मिला रहा होगा.

असम में न सिर्फ सेना बल्कि पुलिस के हाथ भी कभी बाँध जैसे दिए गये थे. उनकी आँखों के सामने ही बंगलादेशी घुसपैठी हंगामा किया करते थे लेकिन सबको सेकुलरिज्म के नाम पर माफ़ किया जाता रहा. ये दोगलापन भी बोडो में असंतोष की एक बड़ी वजह बनता चला गया और इसी वजह से एक बार बोडो का जिहादी घुसपैठियों से जबर्दस्त दंगा हुआ था. बोडो को कहीं समर्थन नही मिला जबकि उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जैसे जिलों में बंगलादेशी घुसपैठियों के लिए हंगामा मचा.

अब जिस प्रकार से आज 644 बोडो चरमपंथियों ने हथियार डाल दिए हैं उसके बाद ये माना जा रहा है कि बोडो असंतोष खत्म होने के अंतिम पायदान पर आ गया है और उनका चीन समर्थक मुखिया अब अकेले ही रह गया है. बोडो ने असम पुलिस से हाथ मिला लिया है और ये हाथ मिलाना बंगलादेशी घुसपैठियों के लिए एक बड़ा संदेश है. माना ये जा रहा है कि अब सरकार को राष्ट्र को घुसपैठ मुक्त करने में आसानी मिलेगी जिसकी शुरुआत असम से होनी है.


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