53 साल पहले साधु संतो के रक्त से लाल हुआ था संसद भवन . तब इंदिरा गांधी को महर्षि करपात्री जी ने दिया था श्राप.. तिथि था गोपाष्टमी


बहुत कम लोग ही जानते होंगे इस इतिहास के बारे में.. तब एक विशेष प्रकार के धर्मनिरपेक्षता का ऐसा बोलबाला रहता था कि हिन्दू शब्द को ही साम्प्रदायिक घोषित कर दिया जाता था. इस बात का भी ध्यान रखा जाता था कि अल्पसंख्यको को कोई भी समस्या न आने पाए .. ये परम्परा नेहरु के समय से चली आ रही थी जिसका निर्वहन उस समय इंदिरा गांधी कर रही थीं.. भला ऐसे में भगवा वस्त्र पहले साधू सन्यासी दिखाई दें और उन पर कार्यवाही न हो, ऐसे कैसे हो सकता था..

पर कार्यवाही ऐसी होगी वो किसी ने सोचा भी नहीं था .. आज भले ही मीडिया के ऊपर दबाव आदि की बात करते हुए कुछ विशेष श्रेणी के पत्रकार अपनी राय अपने अनुसार रखते हों पर आज के दिन कितने साधू संत मारे गये थे इसका आंकड़ा अब तक जगजाहिर नहीं किया गया है… ये वो घटना थी जिसके बाद तत्कालीन महर्षि करपात्री महराज ने इंदिरा गांधी को वो शाप दिया था जिसकी चर्चा आज भी भारत का संत समाज अपने भाषणों में करता है जबकि संतो की मांग केवल गौ रक्षा को ले कर थी..

बताया जा रहा है की अंधाधुंध फायरिंग में न सिर्फ संत मारे गये थे बल्कि उनके साथ चल रहा गौ वंश भी गोलियों का शिकार हुआ था.. ऐसा कत्लेआम इसी के बाद मुलायम सिंह ने अयोध्या में कारसेवको का करवाया था जिसकी उन्होंने कई बार मंचो से सीना ठोंक कर जिम्मेदारी भी ली है..संतो के इस नरसंहार की याद में अब तक प्रदर्शन होते हैं जिसको ले कर जन्तर मंतर पर लोग जमा होते हैं और नरसंहार के स्थल का नाम बदल कर “गौ भक्त चौक” रखने की मांग करते हैं ..

इस घटना की पृष्ठिभूमि ऐसी है की पचास के दशक के काफी मशहूर संत स्वामी करपात्री जी महाराज लगातार गोहत्या पर बैन लगाने के लिए एक कड़े कानून की मांग कर रहे थे, लेकिन कांग्रेस की तत्कालीन मुखिया व् दिवंगत इंदिरा गांधी के नेतृत्व में तब चल रही सेक्युलर  केंद्र सरकार इस प्रकार का कोई कानून लाने पर विचार नहीं कर रही थी। इससे संतों का क्रोध लगातार बढ़ता जा रहा था। उनके आह्वान पर सात नवंबर 1966 को देशभर के लाखों साधु-संत अपने साथ गायों-बछड़ों को लेकर संसद के बाहर डट गए थे।

संतों को रोकने के लिए संसद के बाहर बैरीकेडिंग की गई थी। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी सरकार को यह डर लग रहा था कि संतों की भीड़ बैरीकेडिंग तोड़कर संसद पर धावा बोल सकती है। कथित रुप से इस खतरे को टालने के लिए ही पुलिस को संतों पर गोली दागने का आदेश दे दिया गया। एक रिपोर्ट के अनुसार, तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा को इस बात का अहसास था कि वे वार्ता से स्थिति को संभाल लेंगे, किन्तु मामला हाथ से निकल गया और फायरिंग तक पहुंच गई। नंदा को इस घटना के बाद त्यागपत्र देना पड़ा था।


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