एक दावा.. अंतरिक्ष में भारत की दखल उसकी तरक्की के साथ युद्ध की क्षमता को और ज्यादा बढ़ाने की है

मिशन शक्ति/ऐंटी-सैटलाइट (ASAT) मिसाइल के सफल परीक्षण तो भारतीय वैज्ञानिकों की सफलता की बानगी भर है..जबकि इसके अलावा भारतीय वैज्ञानिक अन्तरिक्ष में भारत के दखल तथा युद्ध क्षमता को और ज्यादा तेजी से बढाने में जुटे हैं. भारतीय वैज्ञानिकों का प्रयास है कि अन्तरिक्ष में भारत की स्थिति इतनी ज्यादा मजबूत हो जाए कि परिंदा भी पर नहीं मार सके. मीडिया सूत्रों के हवाले से पता चला है कि अब अंतरिक्ष में दुश्मन के इरादों को चकनाचूर करने की क्षमता विकसित करने के कई अन्य विकल्पों पर तेजी से आगे बढ़ रहा है.

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के प्रमुख जी सतीश रेड्डी ने बताया कि हम DEWs, लेजर्स, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स (EMP) और को-ऑर्बिटल वेपंस समेत कई तकनीक पर काम कर रहे हैं. मैं इसकी विस्तृत जानकारी नहीं दे सकता, लेकिन हम इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. 27 मार्च को लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में 283 किलोमीटर की दूरी से माइक्रोसैट- आर सैटलाइट को मार गिराने वाला ASAT मिसाइल दिशानिर्देशित गतिमान मारक हथियार (डायरेक्टसेंट, काइनेटिक किल वेपन) था. डीआरडीओ चीफ ने कहा कि अंतरिक्ष में 1,000 किलोमीटर तक की दूरी तय कर सकनेवाले त्रीस्तरीय इंटरसेप्टर मिसाइल की एकसाथ कई लॉन्चिंग से कई उपग्रहों को भेदा जा सकता है.

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गौरतलब है कि को-ऑर्बिटल वेपन मूलरूप से एक उपग्रह ही होता है जिसमें कुछ विस्फोटक, हथियार या DEW डिवाइस लगे होते हैं. को-ऑर्बिटल वेपन को पहले अंतरिक्ष की कक्षा में रखा जाता है और फिर इससे दुश्मन के उपग्रहों को निशाना बनाया जाता है. चीन इन काइनेटिक किल वेपंस के अलावा अन्य ऐंटि-सैटलाइट वेपंस, मसलन लेजर्स जैमर्स, ईएमपी और हाई-पावर्ड माइक्रोवेव्स आदि तेजी से तैयार कर रहा है. उसने पहली बार ऐंटि-सैटलाइट मिसाइल का परीक्षण 2007 में एक लो-ऑर्बिट वेदर सैटलाइट को भेदकर किया था.

सूत्रों की माने तो भारत प्रतिस्पर्धा में कड़ी टक्कर देने के साथ-साथ दोनों, LEO और GEO सिंक्रोनस ऑर्बिट्स, में मौजूद उपग्रहों के खिलाफ ASAT वेपंस विकसित करने के दूरगामी लक्ष्य पर काम कर रहा है ताकि अंतरिक्ष में अपनी बढ़ती सामरिक संपदा पर उभरते खतरों से निपट सके. एक सूत्र ने बताया कि EMP हमारे सैटलाइट्स और सेंसर्स को सुरक्षा कवच प्रदान कर रहे हैं और इनका इस्तेमाल उन्हें अपने दुश्मनों से सुरक्षित रखने में किया जा सकता है.

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सूत्रों ने ये भी बताया है कि दुश्मन द्वारा हमारे मुख्य उपग्रहों को निशाना बनाए जाने की स्थिति में सेना की मांग पर छोटे-छोटे उपग्रहों की लॉन्चिंग की योजना पर भी काम हो रहा है. डीआरडीओ हवा और जमीन पर विभिन्न लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता वाले हाई-एनर्जी लेजर्स और हाई पावर्ड माइक्रोवेव्स जैसे DEWs पर लंबे समय से काम कर रहा है, लेकिन क्या इन्हें ASAT वेपंस का प्रारूप देने में सफलता मिल पाएगी, यह भविष्य के गर्भ में छिपा है. हालाँकि वैज्ञानिकों का मानना है कि वह अपने मिशन को हासिल कर लेंगे.

डीआरडीओ चीफ जी सतीश रेड्डी ने कहा कि ऐंटि-सैटलाइट सिस्टम्स के शस्त्रीकरण (वेपनाइजेशन) या एक फुलफ्लेज्ड एयरोस्पेस मिलिट्री कमांड बनाने जैसे मुद्दे पर आखिरी फैसला सरकार को लेना है. उन्होंने कहा, ‘सैन्य क्षमता के लिहाज से अंतरिक्ष का महत्व बढ़ गया है. सुरक्षा सुनिश्चित करने का सर्वोत्तम उपाय प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना है. डीआरडीओ चीफ ने स्पष्ट किया कि अब फिलहाल नए ऐंटि-सैटलाइट मिसाइल परीक्षण पर काम नहीं हो रहा है. उन्होंने कहा कि मिशन शक्ति के सफल प्रदर्शन से भारत ASAT क्षमता वाले तीन देशों (अमेरिका, चीन और रूस) के एलिट क्लब में शामिल हो गया है तथा भविष्य में  भारत अंतरिक्ष की महाशक्ति बनेगा.

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