क़ुरान की दुहाई देने वाले मुस्लिमों को पुराण पर आपत्ति क्यूँ ?- सुरेश चव्हाणके जी का सम्पादकीय


प्रभु श्री राम जी के मंदिर पर चल रही सुनवाई में मुस्लिम पक्षकारों ने आज कोर्ट को कहा,’ अयोध्या मामले का निर्णय करते समय कोर्ट आस्था, मान्यता, परंपरा या पुराणों के अनुसार नहीं भारतीय क़ानून और संविधान पर निर्णय करे।”

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आखिर सर्वोच्च न्यायानल में मुस्लिम पक्षकार अजीबो गरीब तर्क क्यों दे रहे हैं ? सर्वोच्च न्यायालय में अयोध्या के मंदिर को लेकर चल रही सुनवाई में विभिन्न प्रकार के कुतर्कों को मुस्लिम पक्ष के द्वारा रोज सामने लाया जा रहा है। लग रहा है कि उनको न्याय पाने के बजाये हिन्दुओं की आस्था पर ठेस पहुँचाने में ज्यादा आनंद आ रहा है। या फिर जब किसी प्रकार के सबूत ही नहीं हैं तो कुतर्कों के आधार पर ही अपनी बात को ज्यादा से ज्यादा समय खिंचना है?

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मुझे ये समझ में नहीं आता, जो धर्म अपने क़ुरान को सर्वोच्च रखता है, वह हिन्दू पुराण के खिलाफ क्यों बोल रहा है?  हमारा पुराण कोई क़ुरान जैसा नहीं है कि उसकी लिखित प्रती नहीं है, बल्कि हिन्दू पुराण लिखने वाले हिन्दू इतिहासकार है। उनको तब पुराण कहा गया था, लेकिन वो वास्तव में इतिहास है। उसको हमारा कोर्ट नहीं मानेगा तो किसको मानेगा?

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रही बात आस्था की तो मक्का में जाकर पत्थर फेंकने की परंपरा मुस्लमानों में आस्था के कारण है या किसी और कारण? आख़िर मुस्लिम पक्षरकार ये कैसे भूल गया की कश्मीर में हज़रत बल के अंदर रखा हुआ बाल हज़रत का है इसके लिए कब और किसने DNA किया था? ये बाल वही बाल है जो वहाँ आग लगने के बाद में रखा गया है। उसको हज़रत का बाल बताने के लिए किसी लैब का रिपोर्ट लेने के बजाय खाड़ी देशों से मौलाना को बुलाया गया, ओर उन्होंने कहा की,” हाँ ये हज़रत साहब का ही बाल है।’ बस इतनी बात पर ही उसको आज भी वो सम्मान दिया जाता है जो हज़रत जी को दिया जाता था , तो ये आस्था का मुद्दा है तो हमारा मंदिर किसका मुद्दा है।

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ऐसी जगह खड़े होकर इन कुतर्को दिया जा रहा है, जहां मान्यताओं और परंपराओं का महत्व है। जी हां। मैं न्यायालय की बात कर रहा हूं। न्यायालय में भी कई चीजें परंपरा के आधार पर नहीं चलती है ? आखिर विश्व भर के न्यायधीश और वकील काला कपड़े ही क्यों पहनते हैं ? जज साहब को मीलॉड ही क्यों कहते हैं? न्याय के देवता की प्रतिमा क्यों लगाई जाती है ? और जहां आप भारत में ये बात कर रहे हैं, वहां पर हिन्दू व्यक्ति का बयान लेने से पहले उससे हिन्दू धर्मग्रंथ पर और मुस्लमान का बयान लेने से पहले क़ुरान पर और इसाइयों के लिए बाइबल का ही क्यों उपयोग किया जाता है? क्या वो आस्था नहीं है? और कितनी मजाक की बात है की, रामनवमी की छुट्टी लेने वाले जज और वकील मिल कर प्रभु रामचंद्र जी थे या नहीं इसकी चर्चा कर रहे हैं!!  मई सवाल पूछ रहा हु, क्या मुस्लिम पक्षकारों ने और उनके वकीलों ने अपने पिता को पिता कैसे स्वीकार किए है?  या माता जी से कोई डीएनए सर्टिफ़िकेट माँगा था? सामान्यता कोई भी व्यक्ति अपने पिता को पिता जो मानता है, वो अपनी मां के कहने पर मानता है। क्यू की माँ में उसकी आस्था है, विश्वास है और परंपरा यह भी। मां के कहने पर एक व्यक्ति को अपने पिता के तौर पर स्विकार करते हो तो ऐसे खरबो मां ने हजारो सालो से प्रभु रामचंद्र और उनकी जन्मभूमी अयोध्या ही कही है। उसको हम क्यों नहीं माने ?

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अब यहाँ पर ये भी बात देखने लायक है की दिल्ली के संत रविदास मंदिर के लिए वो मुस्लिम संघठन सामने आकर मंदिर बनाने की बात कर रहे है, और उसे  आस्था का मुद्दा बता रहे है। मुझे समझ में नही आता, दिल्ली के संत रविदास के मंदिर के लिए खड़े होने वाले मुस्लिम संघठन अयोध्या के राम मंदिर के लिए आस्था का नाम लेकर क्यूँ नहीं खड़े होते? वहाँ तो वो बाबर के साथ बाबरी मस्जिद के लिए खड़े होते है मानो जैसे बाबर बाप हो। वह अरबों भक्तों की आस्था नहीं याद आती ? ये विरोधाभास आख़िर क्यू है?

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मुसलमान दुनिया भर में क़ुरान के नाम पर और आस्था के नाम पर ही मंदिर तोड़ते है, चर्च तोड़ते है। न जाने कितने करोड़ लोगों के हत्याएँ करते है। बम धमाके करते है। आज वही लोग हिंदुओ के मंदिर का निर्णय जब होने जा रहा है, तो आस्था नहीं क़ानून की बात कह रहे है!  आख़िर तीन तलाक़ क़ानून बन रहा था, तब उन्होंने क़ानून और संविधान को क्यूँ महत्व नही दिया? तब तो वो आस्था का विषय कह रहे थे। ऐसे और भी कौमन  सिविल कोड से लेके जनसंख्या नियंत्रण क़ानून की बात आएगी तो मुसलमान समाज वहाँ आस्था की बात करेगा। वही समाज जो आज राम मंदिर में आस्था नही क़ानून और संविधान की बात कर रहा है। ये दोगलापन नही चलेगा। करोड़ों हिंदुओ की ये मान्यता है की प्रभु राम चंद्रा जी की जन्मभूमि अयोध्या ही है। और यही होके रहेगा। मुकदमा हारते देख कर बौखलाने के बजाए कहिए, जय श्री राम !!

आपका – सुरेश चव्हाणके 

 

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