श्रीराम जन्मभूमि मामले में मुसलमानो नें क्यों गँवाया भाईचारे का मौका ? हिन्दुओ ने एकतरफा सेकुलरिज्म से क्या पाया और क्या गंवाया ? विवेचना करता सुरेश चव्हाणके जी का सम्पादकीय


श्रीराम जन्मभूमि विवाद में मुसलमानो नें क्यों गँवाया भाईचारे का मौंका ?

मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम मंदिर की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में पूरी हो चुकी है. हिंदुस्थान का एक बड़ा वर्ग इस आशा में था कि कम से कम केस को हारता देख मुस्लिम समाज भाईचारे का परिचय देगा. करोड़ों हिंदुओ के आराध्य और खरबों लोगों के आदर्श की जन्मभूमि का विवाद कोर्ट के बजाए आपसी समझौते से होगा, हम एक होने का परिचय देंगे, मुसलमान हमारे उच्च नीति मूल्यों के राष्ट्रीय प्रतीक प्रभु श्रीराम जी की जन्मभूमि पर अपना फ़र्ज़ी दावा छोड़ देगा, आख़िर प्रभु श्रीराम जी उनके भी तो पूर्वज हैं, इत्यादि भोली अपेक्षाओ की पीठ में ख़ंजर घोंपा गया. जो अपेक्षाए कथित गंगा – जमुनी तहज़ीब के पानी से लम्बे समय तक सींची गयी थीं. जिसकी दुहाई हर चौखट से चौक तक और पंचायत से संसद तक दी जाती थी. ये गंगा – जमनी का जुमला हिंदुओ को मूर्ख बनाने के लिए ही था क्या ?

इस प्रश्न का उत्तर भी मिल ही गया. वैसे व्यक्तिगत रूप से मैं स्वयं ऐसे किसी भी भ्रम में न तो था, न हूँ और न ही रहूँगा. क्योंकि मैं इस भ्रम जाल को पहले से पहचानता भी हू और कई बार इस पर मुखर हो कर लिख-बोल भी चुका हूँ. परंतु मेरे जैसे लोगों को हमेशा तथाकथित भाईचारे का दुश्मन बताने वाले तमाम कथित धर्मनिरपेक्षों के मुँह पर यह बड़ा तमाचा लगा है. वह तो आवाक हैं, जैसे सदियों पुरानी निद्रा से एकदम जागे हों.. वास्तविकता तो ये है कि इस देश के बहुत बड़े वर्ग को सदियों से इस भ्रमित भाईचारे की भांग घूँट घूँट कर के पिलाई जाती रही है. वैसे इस भाईचारे की भांग के नशे में हिंदुओ के साथ अब ही नहीं बल्कि इस से पहले भी कई बार धोखा किया गया है, परंतु उनका नशा उतरा ही नही. जिस पीढ़ी ने हिंदुस्थान – पाकिस्तान का विभाजन देखा, जिसको इन शब्दों की सच्चाई पता चली थी, उन्होंने अपनी अगली पीढ़ी को वो सब बताया ही नहीं.

दूसरी तरफ़ बचपन की आरंभिक शिक्षा से लेकर लगभग हर सामाजिक कार्यक्रमों में बार – बार इस घुट्टी को पिलाया जाता रहा . इसलिए पीढ़ी दर पीढ़ी इस धोखे के संदेश के खत्म होने के बजाए अगली नयी पीढ़ी इस षड्यंत्र की शिकार होती रही .. सेकुलर राजनेताओ और मीडिया के बड़े वर्ग द्वारा इस नशे का कारोबार आज भी यथावत जारी है. वह दिन- रात, चारों पहर इसका डोज़ सिर्फ हिंदुओ के दिलो – दिमाग़ में भरते रहते हैं. इस कारण धोखों की एक अंतहीन श्रृंखला के बाद भी हिंदू कभी जाग ही नहीं पाया ..अब आशा है कि हिंदू जागेगा.. जब हार चुके केस को भी मुसलमान इस भाईचारे की खाद के लिए उपयोग में नहीं लाया, तो उसी फ़र्ज़ी भाईचारे के लिए हिंदू अपना सर्वस्व क्यों त्याग दे ? आख़िर वह करे तो क्या करे और उससे भी बड़ा प्रश्न ये है कि वो ही अकेला क्यों करे ?

आप लोगों को याद होगा.  इस केस में बाबर के पैरोकर हाशिम अंसारी की मौत के बाद अयोध्या के ही हिंदू संत कैसे फूट फूट कर रोए थे. हाशिम अंसारी को मुसलमानो से ज़्यादा सम्मान हिंदुओ ने दिया. इतना ही नहीं, मुल्ला कहे जाने वाले मुलायम के मुख्यमंत्री बेटे टीपू अर्थात अखिलेश जी ने तो उनको सरकारी सम्मान का प्रोटोकोल भी दिया. उनके आदेश पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने बंदूको से फ़ायर कर बाकायदा उन्हें सलामी भी दी. जिस आदमी ने प्रभु के मंदिर के विरुद्ध केस को जीवन भर लड़ा, बल्कि जो असल कारण है इसमें देर करने का उसे भी इतना सम्मान दिया और उस पर भरोसा किया. राम नाम लेने वाले संत तो उसे अपनी गाड़ी में लेकर अदालत जाते थे, उसकी देखभाल भी किया करते थे और आर्थिक से ले कर सामाजिक मदद भी..

परंतु सुनवाई के अंतिम दिन भी जब उसके बेटे से समझौते के बारे में सवाल किया गया तो उसने साफ़ – साफ़ इंकार कर दिया, क्योंकि मुस्लिम समाज का उसके ऊपर दबाव था. हिंदू समाज समझ ही नहीं पा रहा है कि आखिर मुसलमानों ने क्यों गंवाया भाई चारे का ये मौका ? आख़िर क्या चाहता है मुसलमान ? मैं तो मानता हूँ कि ऐसे मुसलमानों को सर्वोच्च न्यायालय से भी न्याय नहीं चाहिए. वह तो कुछ भी कर के इस केस से विक्टिम कार्ड खेलना चाहते हैं, वह चाहते हैं कि ये दिखाया जाय कि हिन्दुस्थान में उसके साथ न्याय नहीं हो रहा. अन्याय के इस झूठ को वो अपनी मजहबी लड़ाई का गोला बारूद  बनाना चाह रहे हैं.. वह इस से असंतोष को बढ़ाना चाहता है.

मुझे तो साफ़- साफ़ दिख रहा है कि न्यायालय के निर्णय के बाद भी मुस्लिम नेताओं के भाषणों, मदरसों की शिक्षा, मस्जिदों के अंदर ये तथाकथित इस्लामिक प्रवचनो में न्याय को स्वीकार नहीं किया जाएगा, क्योंकि उसे स्वीकार करेंगे तो मुस्लिम समाज को दुश्मनी के नशे में हमेशा कैसे रखेंगे ?  हिंदू की दुश्मनी से खुद की दुकान चलाने वाले धार्मिक – राजनैतिक नेताओं की बड़ी – बड़ी फैक्ट्रियां बंद हो जायेंगी और वो बेरोज़गार व् दिवालिया हो जाएंगे, क्योंकि उनका व्यापार इसी सब से चलता है. आख़िर क्या कारण है कि आम मुसलमान आपसी बातचीत में बाबर से अपना नाता नकार कर मंदिर के लिए भूमि छोड़ने की बात तो करते हैं, पर वही सामूहिक समाज के रूप में उसे नकारने लगते हैं ?

सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई में मुस्लिम पक्षकारों के वकीलों ने जान बूझकर बार बार हिंदू आस्था के प्रति अपशब्दों का उपयोग किया. मेरे विचार से उनका विचार हार रहे केस को इसी बहाने और लंबा खींचने का था. उनकी टिप्पणियों से हिन्दू समाज अगर ग़ुस्से में आकर कोई प्रतिक्रिया देता तो इस केस को आगे खिसकाने का उनको बहाना मिल जाता. उनके हाथ में इसके सिवा और कुछ भी नहीं था, क्योंकि जब भी साक्ष्य और तथ्यों का पिटारा खुलेगा तो उनका पर्दाफ़ाश दुनिया भर के आगे होगा, इसे वह भली भांति जानते थे. आखिरकार हुआ भी वही, फिर भी वह झगड़ते रहते हुए दिखाना चाहते हैं. परंतु बड़ा सवाल ये है कि भोला हिन्दू समाज ये सब क्यों नहीं समझता ?

अंतिम में प्रभु श्रीरामचंद्र जी की जन्मभूमि के इस विवाद ने ये साबित कर दिया कि हिंदू – मुस्लिम भाईचारे में हिंदू केवल चारा बनता गया और बहुत कुछ गंवाने के बावजूद उसकी बची हुई आशाएँ भी निराशा में बदल दी गईं. इस सत्य को अगर वह पहचाने और आगे से इसको समझ ले तो उसका और राष्ट्र का कल्याण होगा, अन्यथा भाईचारे की भांग का नशा उसका अंत करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ेगी.

अंत में कहूँगा –

भाई – भाई करते – करते, तुम चारा न बन जाओ..

अपने हाथों अपनी संतति का, हत्यारा न बन जाओ..

बड़े भाव से श्रीराम ने, हमको धर्म सिखाया था..

संभाजी ने इसी की खातिर, अपना शीश कटाया था..

लेकिन तुम तो बदल गए बस, थोड़ी दावत इफ्तारी से..

तभी तो भारत जूझ रहा है, “सेकुलर” जैसी बीमारी से ..

अंत में बस इतना कि – “सुधार जाओ हिंदुओ- जागो”

आपका – सुरेश चव्हाणके

पूरा ब्लॉग पढने के लिए नीचे लिंक पर जाएँ –

http://sureshchavhanke.com/


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