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आदर्श माता – पिता का कर्मयोग – स्वामी पुण्य देव जी


आदर्श माता – पिता का कर्मयोग – स्वामी पुण्य देव
संसार में रहकर कर्म करना प्रत्येक जीवधारी की स्वाभाविक प्रकृति है। क्योंकि कर्म के बिना इस पृथ्वी लोक पर जीवन संभव नहीं है। माता-पिता का कर्मयोग पर पतंजलि योगपीठ के सन्यासी स्वामी पुण्य देव जी जो कि योग प्रचारक प्रकल्प को राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व दे रहे। आपकी नजर में माता-पिता का निष्काम कर्मयोग-
अधिकांश माता-पिता कर्मयोग के बारे में यही सोचते हैं कि अखंड प्रचंड पुरुषार्थ करके जो भी हम अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए भौतिक संसाधन जोड़ते हैं एवं अपनी संतानों को श्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थाओं में पढ़ा लिखा कर किसी व्यवसाय या नौकरी में स्थापित कर देते हैं वह उनका कर्मयोग है।

लौकिक संसार में अधिकांश माता-पिता अपनी संतानों का पालन पोषण कि इसी भाव से करते हैं कि भविष्य में हुए हमारे वंश को बढ़ाएंगे, हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे, हमारी अन्य भौतिक इच्छाओं को पूर्ण करेंगे। अपनी संतानों से ऐसी उम्मीद न रखते हुए माता-पिता को चाहिए कि हमने इनको जन्म दिया है और ऐसा करके भगवान ने हमको बहुत बड़ा उत्तरदायित्व दे दिया है, भविष्य में इनके द्वारा एक अच्छे काम करने पर हमारा गौरव बढ़ेगा और हम एक अपराध करने पर हम भी अपमानित होंगे एवं हमारा देश भी अपमानित होगा। एक आदर्श नागरिक के निर्माण के लिए अपनी संतानों को प्रातः काल जल्दी उठाना, योग प्राणायाम कराना, उनके आहार विचार को पूर्ण शुद्धि करना यह प्रत्येक अभिभावक का परम दायित्व है जिससे कि वह एक चरित्रवान विश्व नागरिक बन सकें।

अपनी संतानों के लिए इतना सब कुछ करने के बाद भी स्वयं के मन में यह भाव रखना कि बड़े होकर मेरी संताने जैसी भी सेवा करें अच्छा कार्य करें बाकी का काम तो भगवान का है हमें तो अपने कर्तव्यों का निर्वाहन प्रभु सेवा समझ कर करना है। निष्काम कर्मयोग का संदेश देते हुए गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहते हैं, हे-अर्जुन ‘तू फल की चिंता मत कर निष्काम होकर कर्म कर फिर जो होगा वह शुभ ही होगा, तुझे शुभ फल मिला तो तू त्याग पूर्वक भोग करना और यदि तेरे कार्य की असिद्धि होती है तो निष्काम कर्तव्य परायण का भाव रखकर आगे बढ़। निष्काम कर्मयोग की ऐसी साधना सेतु चिरकाल तक इंद्रजीत बन जाएगा और तीनों लोकों में तेरी हमेशा विजय होगी। भारत की भूमि में जन्मने वाले हमारे सभी वैदिक क्रांति धर्मा व शांति धर्मा महापुरुषों ने भी तो यही संदेश संपूर्ण मानव जाति के लिए दिया है।

हमारे घरों की दीवारों में लगे महापुरुषों की प्रतिमाएं भी हमें यही संदेश दे रही हैं कि हमारा जन्म भी देश, धर्म, संस्कृति के लिए सर्वज्ञ न्योछावर करने के लिए हुआ है, ऐसी सोच नहीं उनका चिरकाल तक अमर इतिहास बनाया। उनके इसी समर्पित राष्ट्र निष्ठा, भगवद निष्ठा वह त्याग में जीवन का परिणाम है कि उनके माता-पिता का भी आज अमर इतिहास है। आज जिस भी माता पिता के हृदय में ऐसी कर्म योगियों की निष्काम भावना भरी है मैं आश्वस्त हूं वे आज भी प्रतीक सांसारिक युद्ध में अपने चरम आत्मबल के कारण जीवन की प्रत्येक चुनौती में प्रसन्न नहीं रहते हैं।

अपनी संतानों के प्रति प्रत्येक माता पिता को सोचना चाहिए हमने अब बच्चों को जन्म देकर ईश्वर के संविधान का ही पालन किया है। हमने अपने संतान को पढ़ा-लिखा कर श्रेष्ठ इंसान बनाया क्योंकि यह हमारा कर्तव्य है अपनी संतान को चरित्रवान, वीर, पराक्रमी एवं श्रेष्ठ आचरण सिखा कर इस राष्ट्र की सेवा के लिए अर्पित करना ही राष्ट्र के लिए हमारी श्रेष्ठ आहुति है। हम तो केवल निर्मित मात्र ही हैं कराने वाला तो ईश्वर है। ऐसा भाव जिस भी माता पिता का अपने संतानों के प्रति है उनका तो वर्तमान में ही निष्काम कर्मयोग सिद्ध है। वे हमेशा दुःख, अशांति एवं जीवन की अपूर्णता से मुक्त हैं।

एक साधारण परिवार में प्रायः ऐसा दिखता नहीं माता-पिता के मन में भाव रहता है हमने इसके लिए इतना किया अब यह भी हमारे की उपकार को चुकाए। यदि माता सूची कि मैंने इस आत्मा को 9 माह अपने गर्भ में पाला मेरे गर्व को निर्माण करने वाला तो भगवान है, एक गर्भ, रक्त व भोजन के मूल में तो उस परमात्मा की वैज्ञानिकता छुपी हुई है और तो और मेरे स्वयं के इस बहुत ही शरीर का भी प्रत्येक रक्त के कण से लेकर प्रत्येक कोशिका का निर्माण करने वाला तो वह परमात्मा ही है, मेरा तो सामर्थ्य 9 महीने का है जीवन बनाने वाला तो कोई और शक्तिमान है। पिता सोचे मेरे वीर्य से इसका निर्माण हुआ यह वीर्य तत्व बनाने वाला कौन है?

वास्तव में तो कोई है जो इसके मूल में है, मैं तो इस शरीर रूपी संतान के भौतिक जीवन के लिए केवल भोजन, वस्त्र, क़िताबें विकी व्यवस्था कर सकता हूं परंतु आप की आंखें, कान, भविष्य में माता-पिता की अपने संतानों से यही अपेक्षा है उनकी कर्म योग की विफलता का कारण बन जाती है। परिणाम स्वरूप बुढ़ापा, दुःख, अधीरता के कारण बन जाता है और बच्चों को माता-पिता सिर विमुख होने वाली पर अलौकिक संसार में इसे बच्चों का माता पिता के प्रति कृतज्ञता कहा जाता है। वास्तव में यह माता-पिता की अज्ञानता व कर्मयोग की विफलता का परिणाम होता है। आता स्वयं के संपूर्ण जीवन को खुशियों का उत्सव बनाने के लिए प्रत्येक माता पिता को अपनी संतानों को कर्म योग की निष्काम था के भाव से तैयार करना चाहिए ऐसा करने से जीवन ही आनंदमई उत्सव बन जाएगा। ऐसा तभी संभव है जब माता-पिता अपनी संतानों को निष्काम कर्मयोग की भावना से पालन पोषण करें।

ऐसी सोच संसार की जिस भी माता-पिता के हृदय में रहेंगी उनका तो निष्काम कर्मयोग ही साधना इसी जीवन में सफल बननी निश्चित है | भगवान स्वयं ही ऐसे माता-पिता के आत्मा में निवास करके माता-पिता के ह्रदय को पूर्ण वैराग्य से भर दिए हैं | ऐसे माता-पिता अपनी निष्काम कर्मयोग की साधना द्वारा इसी जीवन में पूर्णता को प्राप्त हो गए है उनका वर्तमान जीवन ही उत्सव बन जाता है और मृत्यु ईश्वर का आमंत्रण बन जाता है ।
– स्वामी पुण्य देव
प्रभारी योग प्रचारक प्रकल्प
पतंजलि योगपीठ हरिद्वार


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