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महँगा क्या – जान या चालान ? सडक सुरक्षा कानूनों पर मची हाय तौबा पर सुरेश चव्हाणके जी का संपादकीय

एक सितम्बर से हिंदुस्थान के परिवहन क्षेत्र एवं यातायात व्यवस्था में अब तक के सबसे महंगे दंड प्रावधान के अंतर्गत चालान कटने क्या शुरू हो गए, देश भर में इसको लेकर विरोध के सुर और उससे भी ज़्यादा मज़ाक के क़िस्से और व्यंग्य दुष्प्रचारित किये जाने लगे।

मैं सामान्यतया ऐसे मुद्दों पर बोलता या लिखता नहीं हूँ, परंतु हमारे देश में प्रतिवर्ष डेढ़ लाख से ज़्यादा लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवा देते हैं। यह आँकड़ा विश्व में सबसे ज़्यादा है। हिंदुस्थान में पाकिस्तान के साथ दो, चीन के साथ एक युद्ध और अब तक के सभी आतंकी हमले मिला कर जितने लोग मारे गए हैं, उससे कई गुना ज़्यादा लोग प्रतिवर्ष सड़क हादसों में अपनी जान गंवाते हैं।  आज कहीं पर आतंकवादी हमले में दो – चार लोग मरने पर भी पूरा देश एक होकर उसका विरोध करता है और ऐसा करना भी चाहिए, लेकिन क्या लाखों लोगों के मरने पर हम चुप रहेंगे ? किसी उचित उपाय की खोज भी न करें ? इतनी बड़ी संख्या में मौतें राष्ट्रीय चिंता का मुद्दा क्यों नहीं ? क्यों इसको लेकर बड़े राष्ट्रीय जन आंदोलन नहीं होते ? क्यों इस मुद्दे पर संसद ठप नहीं की जाती ?.. लगता है हमारे देश में सबसे सस्ती चीज़ जान ही रह गयी है, इसीलिए तो उसका कोई उपाय नहीं खोजा जा रहा !

आज देश में आधे लाइसेन्स फ़र्ज़ी हैं !  जो अधिकृत हैं वह भी कैसे मिलते हैं, इसे हम सब जानते हैं ! मैं पिछले दिनों जर्मनी की यात्रा पर था.. चार बड़े शहरों में मेरे भाषण थे.. चारों शहरों में हम कार से ही गए।  प्रत्येक गाड़ी की गति 150 किलोमीटर प्रति घंटे से 200 किमी प्रति घंटे थी.. परंतु यात्रा में सब सामान्य रूप से बैठे थे।  हमारे यहां तो जान हथेली पर लेकर बैठना पड़ता है।  मैंने पूछा कि इतनी गति से गाड़ी चलाते आप को डर नहीं लगता? तो उन्होंने कहा, क्यों ?  यहां सभी इसी गति से चलते हैं ! मैंने फिर पूछा कि दुर्घटना का भी डर नहीं ? तो उन्होंने उन्होंने जवाब दिया कि कोई डर नहीं, यहां पर कोई भी अपनी लेन को काटता या अचानक बदलता नहीं.. जैसे रेलवे ट्रैक पर ट्रेन चलती है वैसे ही वो वहां अपनी गाड़ी चलाते हैं।   मैंने उन्हें “वाह”, यहां के लोग तो बड़े अच्छे हैं, तो उन्होंने जवाब दिया कि भाई साहब यहाँ ग़लती के लिए बहुत बड़े चालान होते हैं।  सबसे बड़ा डर तो लाइसेंस निलंबित करने का है।  यहां तो ड्राइवर भी नहीं मिलते।

अफसोस की बात है कि हमारे यहां तो जिस राज्य से चाहे निकाल लो।  यदि एक जगह सस्पेंड तो दूसरी जगह से मिलेगा।  लेकिन वहाँ तो स्वयं ही गाड़ी चलानी पड़ती है.. जर्मनी को ट्रैक पर लाने के लिए शिक्षा में परिवहन भी सिखाया जाता है।  लाइसेंस लेने के लिए 6 माह का कोर्स अनिवार्य है।  उसमें कोई भी सोर्स, सिफारिश या रिश्वत नहीं चलती है।  वहां आम आदमी और चांसलर का एक ही नियम है।  50 वर्ष की उम्र में भी कोई नियम तोड़े तो उसे फिर नए सिरे से कोर्स करना पड़ता है।  जिस भी देश में परिवहन के नियम ज़्यादा सख्त और चालान/ सज़ा बड़ी है, वहां सड़क पर कम लोग दम तोड़ते हैं।  अब हमें तय करना है कि क्या महँगा है- जान या चालान ?

परिवहन के नियम तोड़ने पर कोई पुलिसिया कार्रवाई, कस्टडी या जेल के प्रावधान जब न हों तो आर्थिक दंड भी न लगाया जाए तो आखिर क्या किया जाए ? इतने दशकों से जनजागरण के तमाम प्रयास विफल होने के बाद अगर 1 – 2 वर्ष इन महंगे चालान को लागू कर के और इसके परिणाम देखने में क्या आपत्ति है ? अगर डेढ़ लाख मौतों की संख्या इस से घट जाती है तो इससे भी महंगे चलान चलेंगे, क्योंकि मरने वाली एक जान की क़ीमत कितनी है ये उसका परिवार बताएगा।

हमें इन महंगे चलान और कड़े नियमों को राष्ट्रीय अनुशासन निर्माण अभियान की तरह देखना चाहिए। आतंकवाद विरोधी क़ानून सख्त हो रहे हैं, बलात्कार विरोधी क़ानून कड़े हो रहे हैं, टैक्स विरोधी क़ानून मजबूत हुए और बाकी जनहित व राष्ट्रहित का हर प्रारूप जब सख़्त हो रहा हो तो लाखों लोगों के जीवन से जुड़ा परिवहन कानून क्यों सख्त न हो ? आज लोगों को सड़क पर सख्ती कर राष्ट्रीय स्तर पर एक साथ अनुशासन सिखाना भी ज़रूरी है.. अनुशासन जैसे व्यक्ति के जीवन में ज़रूरी है वैसे ही राष्ट्र जीवन, सामाजिक जीवन में भी बेहद ज़रूरी है।

इसमें यह भी देखने लायक है कि नितिन गडकरी जी ने सबसे पहले  सड़क निर्माण में डिज़ाइन की गलती के लिए संबंधित इंजीनियर के लिए कड़े दंड का प्रावधान किया है, दण्ड ही नहीं बल्कि सजा का प्रावधान किया है…  अर्थात जिम्मेदारी ऊपर से नीचे की तरफ़ जा रही है।  इस चर्चा का एक रोचक पहलू यह भी है की सरकार और विरोध करने वालों का उद्देश्य ही अलग है। सरकार ने यह सक्ती जान बचाने के लिए की है और विरोध मोटी रक़म के चालान का हो रहा है।विरोध जान बचाने का नहि है। और सरकार का मोटी रक़म का दंड लगाने के पीछे पैसे वसूल करना उद्देश नहि है। इस

जीवन को इतना सस्ता और नकारात्मक बनाने की जरूरत नहीं। हमें जान बूझकर यातायात के नियम तोड़कर न हत्यारा बनाना है ना आत्महत्यारा बनना चाहिए। मनुष्य जीवन दुर्लभ है और उसमें भी भारत भूमि में जन्म लेना। क्या हमारे जीवन से जुड़े एक प्रभावी कानून को हमें आचरण में ढाल कर मजबूत नहीं बनाना चाहिए। यह क़ानून जनता के लिए जनहित का कानून है। इसे जनता की शक्ति हासिल है।

भागवत में एक श्लोक है – “नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारं मयाsनुकूलेन तपः स्वतेरितं पुमान भवाब्धि न तरेत स आत्महा।” यानी भगवान कहते हैं कि पहले तो मनुष्य जन्म ही दुर्लभ है सो मिला और उस पर गुरु की कृपा और उस पर मेरी अनुकूलता। इतना सामान पाकर भी मनुष्य इस संसार सागर के पार न जाए उसको आत्महत्यारा कहना चाहिए। 

आपका – सुरेश चव्हाणके 

पूरा ब्लॉग पढने के लिए नीचे लिंक पर जाएँ – 

https://sureshchavhanke.in

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