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“प्रभु श्रीराम को कोर्ट का विषय बनने देना ही हिंदुओ का सबसे बड़ा पतन है”.. सुरेश चव्हाणके जी का संपादकीय

भु श्रीराम को कोर्ट का विषय बनने देना ही हिंदुओं का सबसे बड़ा पतन और पराभव है !

क्या  ईसाइयों के ईसा के जन्म स्थान पर कोई विवाद हो सकता है ?

क्या मुस्लिमों के मोहम्मद साहब के जन्म स्थान पर कोई विवाद हो सकता है ?

क्या कभी यह सोचा भी जा सकता है ? नहीं ना …. सपने में भी नहीं !

पर करोड़ों हिंदुओ की आस्था और आदर्श के केंद्र प्रभु श्रीराम शताब्दियों तक विवाद में हैं।

यहां तक कि स्वतंत्रता के बाद भी। मुस्लिमों को धर्म के नाम पर पाकिस्तान देने के बाद भी।
इन तीनो की तुलना करूँ तो ईसाईयत और इस्लाम का शक्तिशाली होना और हिंदु का कमजोर होना ही दिखता है, बल्कि मैं कहूँगा कि प्रभु श्रीराम को कोर्ट का विषय बनने देना ही हिंदुओं की सबसे बड़ी पराजय है। इस से बड़ा शब्द नहीं है मेरे पास !

श्रीरामजन्मभूमि विवाद पर मुस्लिम पक्षकार हमारे प्रभु श्रीराम के ऊपर संवेदनहीन, अमर्यादित और ओछी टिप्पणी कर रहा है। हिंदू उसको लेकर छुट-पुट प्रतिक्रिया दे रहा है। वास्तविकता देखें तो वह प्रतिक्रिया नहीं, वह उनका रोना है। वास्तविकता में हिंदू विक्टिम कार्ड खेल रहा है। ध्यान रखना, विक्टिम कार्ड केवल और केवल कमजोर खेलते हैं। क्या कभी कोई शक्तिशाली पहलवान किसी कमजोर व्यक्ति के ऊपर शारीरिक बल प्रयोग की उलाहना देगा, शिकायत करेगा ?  या उसको लेकर विक्टिम कार्ड खेलेगा? अगर आपका कोई पहलवान मित्र भी आप को कहेगा तो आप स्वयं उसे कहेंगे कि ”ये बलवान शरीर किसलिए है, पहलवान जी?” पर आप श्रीराम के मुद्दे पर स्वयं से यह सवाल नही कर रहे हो!

न्यायालय में अपनी आस्था पर हमले का हम रोना रो रहे हैं। अब क्या वहां पहलवानी दिखाएँगे? नहीं ना.. हमारे देश में एक बड़ी प्रचलित कहावत है। सज्जनों को पुलिस और कोर्ट की सीढ़ी नहीं चढ़नी चाहिए..। यह इसलिए कहा जाता है कि वहां जाने पर आपकी प्रतिष्ठा की क्षति पहुँचना तय है। वहां मच्छर भी शेर को कटघरे में खड़ा करने की शक्ति पाता है। मच्छर तो गटर के गंदे पानी पर ही पनपता है, उसके लिए क्या कोर्ट और क्या कटघरा ?

यह कहावत सज्जनों के लिए है, पर शक्तिशाली पुरुष के लिए नहीं। क्योंकि कहावतें बनाने वाले जानते थे कि ताक़तवर को न्यायालय या पुलिस के पास जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। दुर्भाग्य से हिंदू आज सज्जन तो है, पर शक्तिशाली नहीं, और इन अन्य दो मजहबों के सामने किसी कमजोर का टिकना संभव ही नहीं है। विश्व में इन दोनों के अतिरिक्त जो-जो पंथ थे, जो भी सभ्यताएं थीं, वह सब इन्होंने निगल ली। हिंदू के अब तक बचने का कारण केवल उसकी संख्या है, पराक्रम तो कई पीढ़ियों से पहले ही भूल गए हैं ! पराक्रम की संभावनाएँ तो वह 1947 के बाद समाप्त मान बैठा है। यही से उसके अंतिम पतन का कारण भी शुरू हुआ और जिस संख्या के बल पर वह टिका है उसमें भी वह तेजी से पिछड़ रहा है।

अब कोई मुझे यह कहेगा कि क्या तुम कोर्ट, कानून या संविधान नहीं मानते? तो मेरा उतर है,”
संविधान देश चलाने के लिए है, धर्म चलाने के लिए नहीं । धर्म तो ब्रह्मांड चलाता है।”

कईयों को ये बात समझ में नहीं आएगी क्योंकि समझ में आने का मतलब ही जागते रहने की निशानी है, पर वह तो सोया हुआ है, बल्कि मुझे तो वह कोमा (अचेतन अवस्था, अति मूर्छित) में दिख रहा।

बाबर के समय के हिंदुओ ने तो सशस्त्र लड़ाई लड़ी, तब भी कई हिंदू उसकी सेना में थे। उसके बाद भी अंतिम मुग़ल बादशाह तक कई हिंदू सरदार रहे, पर सबकी निष्ठा बादशाह के ही प्रति बनी रही। यही निष्ठा धर्म के प्रति होती तो वह पहले प्रभु

श्रीराम की बात करते। परंतु अपने निजी स्वार्थ के चलते उनकी राजनिष्ठा हमेशा धर्मनिष्ठा से बड़ी रही।

छत्रपति शिवाजी महाराज दक्षिण में तिरूवन्नमलई में एक रात के लिए रूके थे। उनको पता चला कि यहां श्रीशिव और समोत्तिपेरूमल भगवान के विशाल मंदिर को गिराकर भव्य मस्जिद बनायी गई है। विजयनगर साम्राज्य के साथ मुस्लिमों ने ऐसे कई मंदिरो को गिराया था। उन्होंने तुरंत उस मस्जिद को तोड़ कर वहां भव्य मंदिर बनाने का आदेश दिया था।  इस पर उनके सरदार ने कहा कि महाराज जी आप तो सबका सम्मान करते हैं, मस्जिद कैसे तोड़ेंगे ? तो छत्रपति शिवाजी महाराज ने उतर दिया कि यही प्रश्न मंदिर तोड़ते समय तोड़ने वाले को क्यों नहीं पूछा गया? इस मस्जिद के यहाँ बने रहने से क्षेत्र के हिंदुओं का मनोबल हमेशा ग़ुलाम बना रहेगा। और ग़ुलामी मतलब होता है पतन। उसके बाद उन्होंने वो मस्जिद तोड़ी वहाँ भव्य शिवालय का निर्माण करवाया। वह ऐतिहासिक शिवालय आज भी वहां है जबकि उसके निर्माण के बाद आदिलशाही, निज़ामशाही और मुग़ल तक वहाँ पहुँचे, पर किसी ने भी उस मंदिर की तरफ़ टेढ़ी आँख कर के भी नहीं देखा। क्योंकि वह मंदिर हिंदू के सामर्थ्य का प्रतीक बन चुका था।

कम-से-कम 1947 को तो यह सारे प्रश्न समाप्त हो जाने चाहिए थे। इस्लाम के नाम पर 2 हिस्सों में पाकिस्तान देने के बाद यहां बाबरी का क्या काम? उसके वंशजों को तो अधिकार दे दिया (उन्होंने छीन लिया).. उस दिन के बाद अयोध्या, मथुरा और काशी ही नहीं, वह चार लाख मंदिर भी मुक्त होने चाहिए थे जो हमारी ग़ुलामी के प्रतीक थे, और वह आज भी मस्जिदों के नीचे है। पर हम उसे वैसा रख कर भी अपने आप को आजाद मान बैठे। अंतिम पतन उसी समय से शुरू हुआ था हमारा। तब सरदार पटेल ने अपने गृह राज्य में इस स्थिति को बदला। सोमनाथ मंदिर का सरकारी निर्माण हुआ। जब सोमनाथ मन्दिर का निर्माण हो गया था तो सबका क्यों नही हो सकता था ? या आज क्यों नही हो सकता है??

पर पतन में वतन नहीं केवल जतन याद आते हैं। किसी पशु और मनुष्य में जो अंतर है वह यही तो है, हिंदू तो उस से भी ज्यादा लाचार हुआ है इसलिए शोषित है और पीड़ित भी !
मैं मोदी, शाह और योगी का प्रशंसक हूँ। वे इस स्थिति को समझें और इस मुद्दे को सोमनाथ की तरह समाप्त करें व हिंदुओं को पतन से उबारें। जब उसका स्वाभिमान जागेगा, वह तब ही पराक्रम कर पाएगा ।  राष्ट्र का नव निर्माण तभी संभव है। अन्यथा आज जो मंदिर हैं , वह फिर टूटेंगे !
हमें  केवल मंदिर नहीं बनाना है।  हमें तो देश भी बनाना है।  अटल जी कहते थे कि टूटे मन से कोई खड़ा नही होता, छोटे मन से कोई बड़ा  नही होता।  टूटा और छोटा मन गुलामी मतलब पतन का परिचायक है, भले ही हम कोर्ट में जीतते हुए दिखाई दे रहे हों, फिर भी सरकार स्वयं प्रभु श्री राम का मंदिर बनवाये।  कोर्ट नही।

आपका –  सुरेश चव्हाणके

पूरा ब्लॉग पढने के लिए नीचे लिंक पर जाएँ –

https://sureshchavhanke.in

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