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बड़ा सवाल- क्या चंद्रयान दो के साथ कोई षड्यंत्र तो नहीं हुआ ? सुरेश चव्हाणके जी का सम्पादकीय

क्या चंद्रयान दो के साथ कोई षड्यंत्र तो नहीं हुआ ? 

हिंदुस्तान के सबसे बडे वैज्ञानिक परमाणु अभियान के जनक डॉ होमी भाभा और अंतरिक्ष अभियान और इसरो के जनक विक्रम साराभाई जी की विदेशी ताक़तों द्वारा हत्या के बाद भी क्या हम किसी पर शक तक नहीं करेंगे ?

मैं इसरो के वैज्ञानिकों, उनके प्रयासों, उनकी क्षमताओं और निष्ठा के प्रति पूर्ण विश्वास व्यक्त करते हुए, चंद्रयान दो के साथ कोई षड्यंत्र की संभावनाओं पर प्रकाश डाल रहा हूँ।

मैं अपने तर्कों की बात रखते हुए पहले कहूंगा कि क्या ऐसा हो सकता है या नहीं हो सकता? अपने आपको पूछिए, क्यों नहीं हो सकता? आपका मन भी कहेगा कि हाँ हो सकता है!  शायद हो सकता है। संभावना है।

मैं जो इतनी बड़ी बात कहने जा रहा हूँ इसके लिए मेरे कई प्रश्न हैं। इस से ही उत्तर भी मिलेगा।

होमी जहांगीर भाभा जी का प्लेन 24 जनवरी, 1966 को फ्रांस के मांउट ब्लैक की पहाड़ियों में हादसे का शिकार हुआ। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की हत्या के 13 दिनों बाद ही इसे अंजाम दिया गया था। चार वर्षों तक पूर्व CIA संचालक, रॉबर्ट क्रॉली के साथ अपने साक्षात्कारों पर पत्रकार, ग्रेगरी डगलस ने अपनी टेलीफोनिक बातचीत को रिकॉर्ड किया और बाद में एक बातचीत को “क्रो के साथ बातचीत” नामक पुस्तक में प्रकाशित किया।  क्राउली लिखते हैं कि होमी भाभा की हत्या के लिए CIA जिम्मेदार था। रॉली लिखते हैं कि विमान के कार्गो सेक्शन में एक बम ने मध्य-हवा में विस्फोट किया। क्राउले ने दावा किया कि अमेरिका 1965 की लड़ाई में भारतीय परमाणु प्रगति और उनके सहयोगी पाकिस्तान की हार से अवगत था। इस लिए इतनी बड़ी घटना को अंजाम दे कर हिंदुस्तान के परमाणु कार्यक्रम को पंगु बनाया गया था।

हमारे अंतरिक्ष मिशन के जनक विक्रम साराभाई जी की संदिग्ध मृत्यु 31 दिसंबर, 1971 को केरल में कोवलम के रिसोर्ट हुई। वह वहाँ हमेशा जाते थे। एक दिन सुबह उनको मृत पाया गया। आज तक उनकी मृत्यु का कारण पता नहीं चल सका है। मौत स्वाभाविक नहीं हुई । यही प्रत्येक्षदर्शी और जाँच करने वालों ने कहा है। चंद्रयान २ में जिस विक्रम लैंडर के साथ संपर्क जुटा है वह इन्हीं के नाम पर  है। जब विक्रम साराभाई के साथ षड्यंत्र हो सकता है तो उनके नाम के लैंडर के साथ क्यों नहीं हो सकता? 

आज भी हमारे कई वैज्ञानिकों की लगातार संदेहास्पद मृत्यु और हत्याएं हुई। कई वरिष्ठ वैज्ञानिक ग़ायब हुए। इसको लेकर प्रत्यक्ष एफआइआर भी हुए हैं। जाँच भी हुई है। मैंने भी इसको लेकर मनमोहन सरकार के पहले और दूसरे कार्यकाल में बिंदास बोल कार्यक्रम किए हैं। उसके बाद आज भी भारत सरकार महत्वपूर्ण संस्थानों में अनुसंधान केंद्रों पर काम करने वाले दर्जनों  वैज्ञानिकों को सुरक्षा प्रदान कर रही है। मतलब सरकार भी मानती है बल्कि भरोसा करती है कि हमारे वैज्ञानिक मारे जा रहे हैं और आगे भी हमारे शत्रु उनको मारना चाहते हैं ! इन वैज्ञानिकों ने किसी का कोई निजी नुक़सान नहीं किया है। वह तो हिंदुस्तान के लिए शोध-अनुसंधान कर रहे हैं। तो इनका दुश्मन कौन हो सकता है? इनकी कोई निजी दुश्मनी नहीं बल्कि हिंदुस्तान का दुश्मन ही उनका दुश्मन है। इसलिए इस दुश्मनी में इनकी हत्याएं हो रही हैं। अगर इनकी हत्यायें हो सकती हैं, तो हमारे नासा का मिशन चंद्रयान २, जो कि हिंदुस्तान का नाम गौरव और बढ़ाता, ऐसा न चाहने वाले इसमें ख़लल डालने का प्रयास क्यों नहीं करेंगे ?

भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के  680 लोगों की पिछले पंद्रह वर्षों में मृत्यु हुई है और बड़ा रोचक है कि इसरो के भी 684 लोगों की मृत्यु हुई है।

इसरो द्वारा १०० से ज्यादा  सैटेलाइट एक साथ, एक ही रॉकेट के द्वारा अंतरिक्ष में छोड़े जाने पर, डेन कोट्स जो की संचालक है (डायरेक्टर नेशनल इंटेलिजेंस अमेरिका),  ने कहा था कि इस से हमारे कार्यक्रमों को धोखा है और हमें इसे केवल देखते रहने से नहीं चलेगा। उन्होंने कहा था, हमें इसे डिफ़ेंसिव(सुरक्षात्मक) होकर देखने के बजाए ऑफेंसिव() होकर सोचना चाहिए। इतनी ख़तरनाक बात बोलने के बावजूद भी हम चंद्रयान २ के विरुद्ध षड्यंत्र की बात भी नहीं सोचे,  यह तो ग़लत होगा!

अटल जी की सरकार ने परमाणु परीक्षण किया था। वह परीक्षण न हो इस के लिए अमेरिका ने क्या-क्या नहीं किया? आकाश और भूमि पर कई-कई अन्वेषी सैटेलाइट लगा कर वर्षों उसकी निगरानी की। इतना ही नहीं, पाकिस्तान की सबसे ख़तरनाक एजेंसी आईएसआई का सहारा लेकर हमारे लोगों को मारने तक का प्लान किया था। अगर अपने ‘परमाणु’ फ़िल्म नहीं देखी है तो इसके लिए ज़रूर देखें। अगर परमाणु परीक्षण के कार्यक्रम में अमेरिका बाधा डाल सकता है, नानाविध अवरोध पैदा कर सकता है..कई देश विरोध कर सकते हैं, तो चंद्रयान दो में क्यों नहीं करेंगे? और जब खुल कर करने की संभावना न हो तो षड्यंत्र क्यों नहीं करेंगे?

अब तो हिंदुस्तान परमाणु शक्ति संपन्न बन चुका है। परमाणु शक्ति का उपयोग केवल विकास और ऊर्जा के क्षेत्र में कर रहा है।  इस के लिए प्रतिबद्ध भी है। इस के बावजूद आज भी हमको परमाणु ईंधन आसानी से क्यों नहीं मिलता है? अगर इसकी रोकथाम के लिए भी दुनिया के कई देश अपना अरबों-खरबों रुपये का मुनाफ़ा भूलकर हमारे ख़िलाफ़ है तो चंद्रयान 2 के ख़िलाफ़ क्यों नहीं हो सकते ?

चंद्रयान २ तो चंद्र के दक्षिण धृव पर जाने वाला था। अभी तक यहाँ पर कोई देश नहीं पहुँचा है। अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था नासा २०२४ में यहाँ  जाने वाली है। उसके पाँच साल पहले हिंदुस्तान वहाँ पहुँच जाए और वह भी केवल 800 करोड़ रुपये के ख़र्चे पर। तो 10 हज़ार करोड़ रुपये से भी ज़्यादा ख़र्च करने वाले अमेरिका पर सवाल नहीं उठेंगे?  क्या उनकी वह हार नहीं होती ?

चाँद पर कॉलोनी बनाकर उसको अभी से बेचने वाली अमरीकी-यूरोपीय कंपनियाँ भारत के इस अभियान की दुश्मन क्यों नहीं हो सकती हैं?  कम-से-कम वह समर्थक तो नहीं होंगे।

इसरो आज अंतरिक्ष विज्ञान और बाज़ार का सबसे बड़ा खिलाड़ी बन चुका है।  उसकी सबसे बड़ी ताक़त उसके परिणामों के साथ साथ सस्ती सेवा देना भी है। तकनीक में तो शायद दूसरे देश नासा से स्पर्धा कर सकते हैं। परंतु किफ़ायती दरों पर तो बिलकुल स्पर्धा नहीं कर सकते। जब स्पर्धा नहीं कर सकते हैं तो स्पर्धक को ही बाहर करने के तरीक़े क्रूरता के साथ व्यावसायिक क्षेत्र में अपनाए जाते हैं। यह मुझे अलग से बताने या साबित करने की आवश्यकता नहीं है। यह सर्वविदित है। अन्तरराष्ट्रीय राजनीति और कंपनी-कॉर्पोरेट वार में क्या से क्या होते आया है , और क्या-क्या होता है क्या यह रहस्यमय और नई बात है ?

अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में जाने वाले खिलाड़ियों से पूछिए। उनके साथ क्या-क्या व्यवहार किया जाता है। बाथरूम में बंद करने, खाना न देने, खाने में ग़लत चीज़ें मिलाने, मनोबल तोड़ने, जान से मारने की धमकी देने से लेकर सब कुछ किया ज्याता है। जब खिलाड़ी को साधारण मेडल मिलने से रोकने के लिए बहुत कुछ अमानवीय हो सकता है तो हिंदुस्तान के नासा यानी हमारे गौरव इसरो को विश्व का सबसे बड़ा मेडल मिलने से क्यों नहीं रोका जा सकता?

दूसरे विश्व युद्ध के बाद दो ध्रुवीय विश्व में– स्टार वार में प्रमुख देश क्या क्या करते थे, या क्या क्या कर सकते हैं इस पर आज भी आपको बहुत जानकारी मिलेगी।  हॉलीवुड में इस पर कई फ़िल्में बनी है जो मेरी बात की पुष्टि करती हैं।

अब यह प्रश्न उठता है कि हमें रोकने के इच्छुक कौन से लोग हैं? इस सूची में कई देश हो सकते हैं। लेकिन इसमें उन्हीं देशों का विचार करना चाहिए, जिनमें हमें रोकने की क्षमता भी हो। इसमें केवल तीन नाम आते हैं। अमेरिका, रूस और चीन। इस में चीन के नाम की संभावना इसलिए धूमिल हो जाती है, क्योंकि वो ख़ुद वहाँ तक नहीं पहुँचा है और ऐसा करने की क्षमता विकसित करने लायक़ उसका अंतरिक्ष विज्ञान उतना सक्षम नहीं है। वो अभी भी मशीनें और गैजेट की कॉपी कर रिवर्स इंजीनियरिंग तक ही सीमित है।

इसमें ये भी जानना ज़रूरी है कि इस रॉकेट के लिए इंजिन देने से रूस ने भी मना किया था। हमारे चंद्रयान २ मिशन में देरी होने का बड़ा कारण रूस की अंतरिक्ष संस्था ROCOSMOS है। इसने रॉकेट इंजन देने से पहले तो देरी की और बाद में देने से मना किया। इस लिए भी मिशन में देरी हुई नहीं तो यह अभियान और शीघ्र होता।

लेकिन कई लोग मानते हैं कि इसमें नासा सबसे बड़ा प्लेयर हो सकता है क्योंकि अब रूस अंतरिक्ष मामले में उतना आक्रमक नहीं है। अमेरिकन कंपनियां अभी से ही बाज़ार से अरबों-खरबों रुपये चाँद पर कॉलोनी बनाने के लिए मार्केट से इकट्ठा कर चुकी हैं। इस मिशन के सफल होने पर उनके लिए स्पर्धा बढ़ जाती। और अमेरिका जब २०२४ की तिथि घोषित कर चुका हो,  तो उसके पहले ही भारत का चंद्रमा के सबसे रहस्यमय और जटिल चन्द्र भाग में पहुँचना अमेरिका के लिए सबसे ज़्यादा घातक और नुकसानदायक होता !

नासा के पहले मून मिशन पर भी स्वयं  अमेरिका से ही कई प्रश्न उठे हैं। अपोलो यान से ही अंतरिक्ष यात्री चाँद पर पहुँचे ही क्या? इसको लेकर अमेरिका में काफ़ी बहस हुई। यहाँ तक कि वो फ़ोटो और वीडियो हॉलीवुड के कुछ स्टूडियो में रिकॉर्ड किए गये थे, ये भी आरोप लगे। पूर्व सोवियत संघ के साथ गलाकाट शक्ति प्रतिस्पर्धा में अमेरिका ने यह किया होगा ऐसा कहने वालों में स्वयं अमेरिकन से ही कई बड़े लोग रहे हैं।

विश्व में महासत्ता बनने के जो मानक हैं उनमें अंतरिक्ष क्षमता, सैन्य क्षमता, अनुसंधान क्षमता, अर्थव्यवस्था का आकार यही प्रमुख मानक माने जाते हैं। इन सब में धीरे-धीरे हिंदुस्तान का आगे बढ़ना आज की महासत्ताओ के लिए और कल महासत्ता बनना चाहने वालों के लिए निश्चित तौर पर स्वीकार्य नहीं होगा।

मैं जब इतना बड़ा प्रश्न खड़ा कर रहा हूँ। या संदेह खड़ा कह रहा हूँ। तो कई लोग मुझे भी कह रहे हैं कि अमेरिका तुमको छोड़ेगा नहीं। हो सकता है तुम्हारा वीज़ा कैंसिल कर दें। तो मैं उनको बताना चाहता हूँ, मैं कभी भी कोई सच्ची बात करने के लिए परिणामों का विचार नहीं करता। वह मैं ईश्वर पर छोड़ देता हूँ और अपने मन में आयी बात को तर्कों, तथ्यों, अतीत, वर्तमान और भविष्य की संभावनाओं के आधार पर रखता हूँ। यहाँ लेख लिखने, संपादकीय में शब्दों की मर्यादा है। इसलिए मैं चाहूंगा कि इस लेख को पढ़ने के बाद ८ सितंबर २०१९ का बिंदास बोल कार्यक्रम ज़रूर देखें।

मै पुनः इसरो के वैज्ञानिकों , हिन्दुस्तान की सरकार को बधाई देता हूँ और भविष्य के मिशन के लिए शुभकामनाएं देता हूँ  और सावधानी की सलाह भी देता हूँ।

आपका –  सुरेश चव्हाणके

पूरा ब्लॉग पढने के लिए नीचे लिंक पर जाएँ –

https://sureshchavhanke.in

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