कल का गणेशोत्सव कल के लिए- सुरेश चव्हाणके जी का सम्पादकीय

ॐ  श्री गणेशाय नम: । गणेश चतुर्थी की आप सभी को शुभकामनाएं।  मेरा पहला नियमित संपादकीय आज से इस ब्लॉग पर आपके लिए प्रस्तुत है। आज से गणेश उत्सव आरंभ हुआ है।  जिसे मूलत: लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी ने प्रारंभ किया। लोकमान्य तिलक और मेरे विचार से गणेश उत्सव का आज का स्वरूप मूल स्वरूप से बहुत ही विचित्र स्थिति में है। आज ये प्रायः एक ‘इवेंट’/आयोजन के रूप में रह गया है! कुछ लोगों के लिए यह धार्मिक उत्सव है । कुछ लोगों के लिए ये धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित है। कुछ लोग इसलिए मनाते हैं क्योंकि घर में होता है, तो चलो सहभागी हो जाते हैं।  कुछ लोग सोचते हैं कि गली-मोहल्ले में हो रहा है, समय है तो सम्मिलित हो जाते हैं।  कुछ लोग भगवान से डरते हैं , इसलिए सहभागी होते हैं।  कुछ लोग सेल्फी, फोटो खींचने, आउटिंग पर जाना हो तो यहां चलते हैं।  पार्टी, मस्ती, घर से बाहर निकलने के  बहाने, तो कुछ लोगों के लिए नशा तो कुछ लोगों के लिए राजनीति और नेतागिरी तक सीमित सा रह गया है। लेकिन क्या इस बदलते स्वरूप को हम बाजार और लोगों  के अज्ञान के हवाले करके इसके बड़े उद्देश्य और बड़ी संभावना को छोड़ देंगे ? मेरे जैसा पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता तो कभी नहीं नहीं छोड़ेगा।

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गणेश उत्सव की मूल संकल्पना लोकमान्य तिलक जी की दृष्टि में केवल स्वतंत्रता आंदोलन यही तक ही बताई जाती है। यह आंशिक सच्चाई है। लेकिन इसके तात्कालिक कारण को ज्यादा लोग नहीं बताते। अपने देश में मुसलमानों का उल्लेख जहां भी आता है उस मुद्दे को या संदर्भ को टाल देना ही अच्छा और उचित समझा जाता है। बहुत से लोग नहीं जानते कि उन दिनों में पूणे शहर में बहुत बड़े पैमाने पर ताजियां निकलते थे । और वे दिन-रात लम्बे समय तक चलते थे। हिंदुओं का ऐसा कोई सार्वजनिक त्योहार, उत्सव न होने के कारण बड़े पैमाने पर हिंदू भी उसमें सम्मिलित होते थे । उस कारण हिंदुओं का मुसलमान बनना शुरू हो रहा था।  भले ही प्रत्यक्ष धर्म स्वीकार करके नहीं हुए हो, लेकिन ताजिया में जाकर  उसको स्वीकार करना आधा हिंदू रह जाना ही तिलक मानते थे, और उससे मुस्लिम समाज ज्यादा संगठित हो रहा था । हिंदुओं के पास ऐसे  किसी उत्सव की नितांत आवश्यकता उनको प्रतीत हो रही थी। साथ ही अग्रेजों के  समय  में  स्वंतन्त्रता आंदोलन के लिए कार्य किए जाते थे तो उसको लेकर सरकार बहुत ही सख्त थी । साधारण लेखों, पत्रक छापकर बांटने से भी कड़ी कार्रवाई होती थी। लेकिन अपने सौ वर्ष  के  इतिहास में अंग्रेज  जान चुके थे कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर अगर  प्रहार  होता है  तो यहां के सभी  हिन्दू  व्यापक पैमाने पर प्रतिक्रिया देता है।  इसलिए धार्मिक आयोजनों में वो सर्वदा ही उतने कठोर नहीं होते थे। इन दोनों संदर्भ का उपयोग करते हुए लोकमान्य तिलक जी ने घर के चारदीवारी के अंदर हजारों वर्षों से मनाये जाने वाले गणेश उत्सव  को सड़क-चौराहे पर लाने का निर्णय किया। उसके द्वारा उन्होंने स्वंतन्त्रता आंदोलन  में लोगों का मार्गदर्शन करने का अवसर देखा। बड़े पंडाल बनाए जाते थे।  वहां पर जो सजावट की जाती थी, चित्र लगाए जाते थे, प्रदर्शनी लगायी जाती थी।  उनके द्वारा भी लाखों लोग  उन मुद्दो को जान पाते थे।   दस दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव में  क्रांतिकारियों के भी भाषण , व्याख्यान आदि होते  थे । इसके साथ ही अंतिम दिन होने वाली शोभा यात्रा को लोकमान्य तिलक जी बड़े पैमाने पर इसलिए भी विशाल रूप से करवाते थे कि केवल उत्सव बनकर रह न जाए।  जैसे कहीं  पर कुछ हो जाता था तो लोगों में  डर और आतंक फैलाने के लिए अंग्रेज अपने पुलिस की परेड करवाते थे।  उस परेड से लोगों में अंग्रेजी शासन के प्रति दहशत बैठती थी।  शक्ति का प्रदर्शन भी हो जाता  था।  तिलक जी ने यही विचार किया और इसलिए गणेश जी की विसर्जन यात्रा जो अंतिम दिन होती है, उसको बड़े पैमाने पर हिंदुओं का सामर्थ्य दिखाने के रूप में किया जाने लगा।

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प्रारंभिक दिनों के विसर्जन शोभा यात्रााओं के अगर हम वर्णन पढेंगे तो हमें ज्ञात होगा  कि उसमें सशस्त्र खेल खेले जाते थे।  व्यायाम, और कई करतब ऐसी चीजों को प्रदर्शित किया जाता था।  तलवारबाजी  या  भाला फेंकना,  निशानेबाजी जैसे पारपंरिक  खेलों के द्वारा  भी समाज में  मनोरंजन से ज्यादा मार्गदर्शन करके आत्मबल मजबूत  बनाया जाता था। ऐसा कहा जाता है कि उस विरोध के और जबर्दस्त दबाव के प्रभाव में भी गणेश विसर्जन की बड़ी शोभा यात्रा के बाद विरोंधियों पर और अंग्रेज़ सरकार पर  समाज के एकत्रित होने की शक्ति का बड़ा प्रभाव होता था।  लंबे समय तक  स्वतंत्रता आंदोलन के बाद भी  इसका स्वरूप बहुत हद तक वही रहा । लेकिन इसके बाद के राजनीतिक या सामाजिक नेतृत्व को स्वतंत्रता मिलने के बाद आगे क्या इसकी समुचित योजना तैयार न होने के कारण इसका सदुपयोग नहीं हो पाया । और इसका भटकना आरम्भ हुआ।

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आगे ये बहुत बड़ा महोत्सव, बाजार और अज्ञान के कारण क्या से क्या यह हुआ….. मैंने आपको ऊपर बताया ही है।

इस उत्सव का आज के परिप्रेक्ष्य में क्या हो सकता है, और आने वाले दिनों में भी समय के साथ सामंजस्य बनाते हुए इसे कैसे बदला जा सकता है। इसका स्वरूप आपके समक्ष रख रहा हूँ।

इसके मैं कुछ प्रमुख हिस्से करूंगा।

जैसे १– व्यक्तिगत और २-सामाजिक जीवन। ३- देश और ४- पूरा विश्व ।

मैं तो कहूंगा बहुत कुछ कर सकते हैं।  इसका उपाय समाज के सामने रख सकते हैं।  मार्गदर्शन कर सकते हैं।  उनको सोचने की दिशा में आगे ला  सकते हैं।   उसके बाद प्रत्यक्ष क्रिया के लिए प्रवृत्त करके  उसका मनचाहा परिणाम प्राप्त    कर सकते हैं।  उन मुद्दों में व्यक्तिगत, सामाजिक समस्या हमारे और पूरे विश्व के साथ ब्रह्माण्ड में जो समस्या है  उनका भी मार्गदर्शन हो सकता है।  शारीरिक , मानसिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक समस्या का समाधान भी हो सकता है।

आर्थिक –  हम गणेश उत्सव को  अर्थव्यवस्था के तौर पर आज खरबों करोड़ रूपये खर्च कर ही रहे हैं।  हम इसके द्वारा स्वदेशी और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करने का संदेश दे, विशेष कर जहां पर गणेश जी विराजमान हो रहे हैं। उसके आसपास के घरों में,  उसके बाद आसपास के उत्पादकों को ही और उससे भी ज्यादा आगे बढ़ते हैं  तो हमारे देश में बनने वाले उत्पादों को  प्राथमिकता के आधार पर लेकर आर्थिक वृद्धि का भी संदेश दे सकते हैं।   यही आदत धीरे- धीरे गणेश उत्सव के साथ विजयादशमी, दीपावली अन्य त्योहारों में लगाएंगे तो हम अर्थव्यवस्था पर एक बड़ा संदेश के साथ विकल्प भी दे सकते हैं।

आध्यात्मिक – व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिकता एक चेतना का काम करती है। ईश्वर को ना मानने वाला व्यक्ति भी मानता है कि कोई-न-कोई चेतना, प्रेरणा  उसके मन में हो सकती है। व्यक्ति ज्यादा आगे बढ़कर काम कर सकता है। सामान्य से असामान्य की ओर जाने के लिए उसकी चेतना अध्यात्म से मिलती है।  इसलिए नास्तिक से आस्तिक  तक की यात्रा को इन दिनों में आरंभ  किया जा सकता है। किसी श्रद्धा कमजोर हुई है तो मजबूत किया जा सकता है ।जिसकी पहले से मजबूत हो उसको और आगे बढ़ाया जा सकता है।

धार्मिक – सामान्यतः हम आध्यात्मिक और धार्मिक में फर्क नहीं कर पाते। आध्यात्मिकता से पूजा-पाठ और व्यक्तिगत जुड़ा हुआ है और धार्मिक धर्म के विचारों और समूह के साथ अधिक जुड़ा हुआ है। मैं मानता हूं कि धर्म में आए हुए दोषों को दूर करने के लिए समय के साथ सामंजस्य  आवश्यक है।  धर्म बनाने के लिए इस त्योहार का धार्मिक संदेश के रूप में उपयोग कर सकते हैं।

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अगर सामाजिक समस्या के बारे में बात करूं तो धर्मातरण – हमारे देश में जो हो रहा है, उसका भी बड़ा उपाय हो सकता है।  हम हमारे धर्म की सही जानकारी देकर धर्म से भटके हुए लोगों को वापस ला सकते हैं। उनकी घर वापसी करायी जा सकती है। आखिर आज विदेश में बड़े पैमाने पर गैर हिंदुओं के द्वारा मनाया जाने वाला गणेश उत्सव किसका  प्रतीक है? वहां पर चर्च और मस्जिदें बंद हो रही हैं।  उसको वहां पर गए हुए हिन्दू खरीद कर मंदिर में परिवर्तित  भी कर रहे हैं।  वहां अपने पंथो के प्रति मौलवियो और पादरियों से निराश मिल रही है। उनका छोटापन ध्यान में आ रहा है। कई देशो में धर्म न होने के कारण जैसे रूस और कई देश  वहां पर हमारे पूजा पद्धति , श्रद्धा  और परम्पराओं का बड़ा स्वागत किया जाता है।   इसलिए  वहां पर तो लोग  हिन्दू हो ही रहे हैं। भारत के अन्दर के लोगों को भी  हम एक धार्मिक अभियान के अंतर्गत  अपने ज्ञान को  सही, सकारात्मक , वैज्ञानिक  आधार  पर भी समझा जा सकते हैं।   यहाँ हमें पता नहीं होने के कारण जाकिर नाईक जैसा कोई दुष्ट आदमी गणपति  के बारे में उलटे सूलते प्रश्न कर सकता है। जिसके उत्तर हमारे पास नहीं होते। इसलिए इन त्योहारों को केवल हाथ जोड़कर दर्शन करके या उत्सव करके मनाने के साथ-साथ धार्मिक ज्ञान लेने और देने पर भी हम लेकर जा सकते हैं।

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सांस्कृतिक परम्परा  में इतने वर्षों से संबद्ध होने के कारण अब यह उत्सव हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग बन चुका है। किसी ने अगर धर्म बदला भी हो या पूजा पद्धति बदली हो,  लेकिन संस्कृति नहीं बदली है। इसलिए तो इंडोनेशिया का प्रधानमंत्री अपने आदर्श नायक के तौर पर भगवान श्रीकृष्ण का नाम लेता है।  कई गैर हिन्दू भी गणेश जी की पूजा करते हुए दिखाई देते हैं , तो हम सांस्कृतिक महोत्सव को वापस लाने के लिए, पुन: जोडने के लिए और  कुछ मात्रा में आपस की शत्रुता समाप्त करके भी इसे उपयोग में ला सकते हैं।

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मनोवैज्ञानिक समस्या – यहां पर ये उपाय हो सकते है कि गणेश उत्सव में आने वाला व्यक्ति समाज में घुल मिलता है। उसकी दैनिक दिनचर्या से वो बाहर आता है।  उससे उसके आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होती है, और जो अकेले रहने से होने वाले विकार हैं उससे बाहर आकर समूह  के साथ रहकर आने वाले मनोबल लेकर वो अपने जीवन की नई शुरुआत कर सकता है। अन्य लोग भी उसके समश्या का समाधान देते है।

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शारीरिक तौर पर कहें तो इन दिनों में  आप व्रत , (उपवास करके  अपने मोटापे को कम कर सकते हैं।   अपने शरीर को इन दस दिनों में गणपति जी की दिनचर्या के साथ  एक अनुशासन लगा सकते हैं। जिससे  कि आप  आगे  आने वाले दिनों में उपयोग में ला सकते हैं , लोगों को शरीर, खेल, योग इससे जुड़े हुए मार्गदर्शन भी किए जा सकते हैं।  खेलो की स्पर्धाए और स्वयं सुरक्षा के लिए शस्त्र प्रशिक्षण भी दे सकते है।

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इसका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो समस्या है, उसमें भी उपयोग हो सकता है।  

जैसे आतंकवाद – आज विश्व में आतंकवाद को लेकर बड़ी भ्रम की स्थिति है। बहुत से देश नए हैं। वहां पर बड़े सांस्कृतिक बदलाव हुए हैं।  इस कारण उनके पास अतीत की विराट परम्परा नहीं है। अधिकतर बाहर से आए लोगों ने धार्मिक या राजनीतिक आधार पर देशों को नियंत्रण करने के कारण भी हिंदुस्थान जैसा मनोबल नहीं है। इसलिए वहां पर आतंकवाद से निपटने का मार्ग अभी दिखाने वाला कोई महापुरुष नहीं है। हमारी सभ्यता अकेली ऐसी सभ्यता हैं जो हजारो साल से अधिक समय से टिकी हुई है और प्रवाहमान है । अन्यथा अन्य कोई संस्कृति नहीं दिखती । अगर हम अद्यतन उदाहरण भी दें तो पांच हजार वर्ष से पुराना  उदाहरण महाभारत का हमारे सामने है। हम लाखों वर्षों के संदर्भ भी दे सकते हैं।  ऐसे में हमारे पास रावण जैसे आक्रांता को मारने वाले प्रभु रामचंद्रजी भी है। कंस जैसे क्रूर राजा को मारने वाले भगवान श्रीकृष्ण भी हैं। बीते वर्षों की बात करें तो आक्रांताओं , आतंकियों  को मारने वाले पृथ्वीराज चौहान , महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे प्रबल उदाहरण भी हमारे पास है। ऐसे में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर फैलने वाले इस आतंकवाद को ख़त्म करने के लिए हिंदुस्थान विश्व को मार्ग दर्शन नहीं कर सकता क्या ?  मेरा मानना है कि कर सकता है। इसके लिए और सूक्ष्म से सूक्ष्म विस्तृत विवरण , चिंतन और  योजना बनाकर इसका   उपयोग किया जा सकता है। विश्व की और बड़ी समस्या है पर्यावरण प्रदूषण ।

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पर्यावरण का गणेश उत्सव में बहुत ही अच्छा संदेश दिया जा सकता है। जैसे गणेश जी की मूर्ति मिट्टी से बनाई जाती है। हम पंच महाभूतों को मानते हैं और पंच महाभूतों में बनाई हुई चीज या वस्तु पंच महाभूतों में मिलाने से उसका पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता।  इसलिए गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति पानी में डालकर दुबारा प्रकृति में मिल जाती है। पर्यावरण का कोई नुकसान नहीं होता। पर्यावरण खाने के प्रसाद से लेकर , पूजा, फल  उन सारी चीजों से हम एक संदेश दे सकते हैं  कि भारतीय  जीवन शैली जो है वो प्रकृति के साथ रहने वाली है। अन्य देश भी इसको अपने यहां पर पर्यावरण के समाधान के तौर पर हम देख सकते हैं।

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विश्व में गरीबी और अमीरी के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। ये विश्व की प्रमुख तीन समस्या में से एक समस्या को आज माना गया है। हम इस त्योहार से अमीर- गरीब  के भेद के बगैर एकत्र होते हैं। एक साथ एक भगवान को  अपनी क्षमता के अनुसार प्रसाद चढ़ाते हैं, या सेवा करते हैं। जांति- पांति से ऊपर उठकर हम एक होते हैं। ये संदेश विश्व के लिए बहुत बड़ी बात है।

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इसके साथ ही विश्व आज परिवार के बिखरते परिस्थिति को लेकर चिंतित है। गणेश जी अपने महादेव के पुत्र के तौर पर पूरे परिवार का एक रूप  विभिन्न विभिन्नताओं के बावजूद कैसे एक रहा जा सकता है। इसका संदेश विश्व को देते हैं। हम गणेश भक्त कैसे इस उत्सव के लिए अपने घर लौटते है। साथ रहते है। इसलिए इस समस्या  का समाधान भी इससे हो सकता है ।

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लोकमान्य तिलक जी ने बड़े सोच- समझकर गणेश भगवान का ही चयन किया। वैसे हमारे पास 33 करोड़ भगवान हैं। लेकिन तिलक जी ने गणेश जी को ही क्यों चुना?  एक तो सबसे बड़ा कारण की ये त्योहार दस दिनों का होता है। हिंदुस्थान में हर अच्छे कार्य  के शुरुआत से पहले गणेश पूजा का चलन है। मान्यता से  शुंभाकर माना जाता है। विद्या के देवता, ज्ञान का प्रतिरूप है। साथ ही महादेव जैसे विराट परिवार का सदस्य जिसकी स्वीकार्यता विभिन्न प्रकार की पूजा पद्धति में भी की जाती है। उससे भी अधिक आवश्यक इसलिए मै यहां विशेष उल्लेख कर रहा हूं। वो ये है कि गणपति के नाम में अगर हम विग्रह करके देखें तो गण मतलब समूह , संगठन तो आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है।  हिंदू यहां पिछड़ रहा है। असंघटित है। इसलिए गण मतलब समाज के रूप में संगठित हो और पति का मतलब नेतृत्व लीड़रशीप।  गणेश उत्सव में छोटे-छोटे बच्चे आकर कोई ढ़ोल बजाता. कोई तलवार चलाता है। कोई सजावट करता है कोई पूजा करता है । विभिन्न प्रकार के नेतृत्व कौशल गुण उससे विकसित होते  हैं । इसीलिए ऐसे कार्यक्रम  से कार्यकर्ता बनता है ।  कार्यकर्ता को नेतृत्व करने वाला नेता बनता है।

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इसीलिए लोकमान्य तिलक जी ने अन्य भगवान का चयन न करके गणपति जी का चयन किया है । हम उनके चयन की चाल बदल कर देश का चरित्र बदल सकते है। सोए हुए समाज को जगा सकते है। दिशाहीन विश्व को मार्गदर्शन कर सकते है। बस अवशक्त है रणनीति और आस्था के साथ आगे बढ़ने की। उसके लिए शुभ कामनाए।

आप सभी के सकारात्मक सुझाओ की प्रतीक्षा में…

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