नरेंद्र मोदी जी की विश्व नेता के रूप में अमरीका यात्रा- सुरेश चव्हाणके जी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी अमरीका यात्रा पर भारत देश के नेता के रूप में गए थे और लौटे हैं एक सशक्त विश्व नेता बन कर। वैसे तो यह स्वीकारोक्ति उन्हें पहले से मिलना शुरू हुई थी। सारे बड़े देशों के नेताओ ने उनके साथ बराबरी का व्यवहार किया और बराबरी का सम्मान भी दिया। परंतु इस यात्रा ने उस पर चार चाँद लगा दिए।

जिस देश ने कभी कुछ ही वर्षों पहले उनको अपने देश में आने के लिए विसा नहीं दिया था, वह आज उनके स्वागत के लिए लाल क़ालीन बिछा रहा था। बल्कि पलक पाँवड़े बिछा कर दोनों हाथ जोड़ कर खड़ा था। वहाँ का सर्वशक्तिमान राष्ट्रपति दोनों बाँहें फैलाकर उन्हें गले लगा रहा था। ना केवल भाषण पर ताली बजा रहा था, बल्कि खड़े होकर अभिवादन भी कर रहा था। इतना ही नहीं एक छोटे से हिंदुस्थानी बच्चे को बड़े आनंद से हाथ मिला कर सेल्फ़ी भी दे रहा था। वह हाऊडी मोदी में आकर स्वयं गौरवान्वित अनुभव कर रहा था। यह खुले आम स्वीकार कर के बता भी रहा था। दशकों से अमेरिका में रहने वाले हिंदुस्थानियों के लिए तो इसलिए भी गौरव का क्षण था, क्योंकि उन्होंने वर्षों उपहास और अपमान झेले थे। स्वयं तो ईमानदारी, निष्ठा, परिश्रम और पराक्रम किए, परंतु उनके मूल मातृ देश से अमरीकी तुलना कर के उनको नीचे दिखाते थे। प्रत्येक हिंदुस्थानी ने वहाँ अपना स्थान बनाया था, परंतु उनका देश विश्व में अपना स्थान खो चुका था। उस कमी को मोदी जी ने अपार परिश्रम की पराकाष्ठा और पराक्रम से बदल दिया। हिंदुस्थानियों का गौरव बढ़ा। सीना चौड़ा हो गया। आँखों से आनंद अश्रु आ गए। मानों हज़ारों वर्षों से करोड़ों पूर्वजों का देखा सपना पूरा हुआ हो।

यह केवल संयोग नहीं था। यह लम्बी यात्रा का परिणाम था। इस  यात्रा से मोदी का अंतरराष्ट्रीय नेता के रूप में पूर्ण उदय हुआ। अमरीका के प्रत्येक नेता ने मोदी जी का उल्लेख अंतरराष्ट्रीय नेता के रूप में ही किया। उन्होंने डॉनाल्ड ट्रम्प और मोदी जी को बराबरी के धरातल पर स्वीकार किया। अमरीका के दोनों दलों के नेता मोदी जी को बराबरी में स्वीकार कर रहे हैं। वहाँ का उद्योग-व्यापार करने वाला समाज ही नहीं नागरिक समाज ने भी मोदी जी को मित्र के रूप में स्वीकार किया है।

विश्व का सबसे शक्तिशाली और अड़ियल देश का यह नमस्कार करने के पीछे बहुत बड़े-बड़े चमत्कार हैं। यह नमस्कार उसी के परिणाम हैं। मोदी जी को यह सम्मान केवल यात्राओं से नहीं मिला। यात्राएँ तो परिव्राजक भी करता है। विदेश यात्राएं तो पड़ोसी इमरान खान भी कर रहा है और चीनी राष्ट्राध्यक्ष भी कर रहे हैं। परंतु सम्मान के साथ स्वीकार्यता मोदी जी की ही क्यों बनी? क्योंकि मोदी ने स्वदेश में दशों दिशाओं में पराक्रम किए। चहुँमुखी विकास किए। जो कमी है उसे पूरा करने का विश्वास जगाया। स्थानीय राजनीति में विक्रमी अंतर से विपक्ष को परास्त किया। अनिश्चितता के बादल हटाए। स्थिरता लाई। अच्छे पड़ोसी को गले लगाया तो बदमाश पड़ोसी देश आतंकिस्थान को सीमा पर सेना से तो अंदर रणनीति से और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीति से हराया है। कपटी चीन को भी अपने मामलों में ही उलझाने में सफलता प्राप्त की। साहसपूर्ण चाल चली, उसके सारे दुश्मनों से दोस्ती कर के चीन से बराबरी की दोस्ती के लिए हाथ बढ़ाया तो चीन हाथ जोड़ कर खड़ा था।

रूस और अमरीका को बराबरी के अंतर से एक जैसा सम्भाला। यूरोप, ब्रिटेन और विकसित देश ही नहीं छोटे-छोटे अफ़्रीकी या दक्षिण अमरीकी देशों को भी संस्कृति और व्यापार से गले लगाया। कहीं सोलर अलायंस बनाया तो कहीं विश्व पर्यावरण के लिए केवल चिंता ही नहीं की और परोपदेशी भाषण नहीं दिए, बल्कि स्वयं से उसकी शुरुआत की। विकास या शांति ही नहीं आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे को आक्रामकता के साथ उठाया। संयुक्त राष्ट्र संघ की आतंकवाद पर ढुलमुल नीति को उसी के मंच पर खुल कर उठाया। केवल विरोध, निंदा या निषेध कर के रुकने के बजाए उस पर आगे बढ़ कर नेतृत्व की क्षमता भी दिखाई। पिछले पचास वर्षों में जितने छोटे-बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम हिंदुस्थान में हुए उससे  अधिक पिछले पाँच वर्षों में हुए। विदेशी लोग आए, नेता आए उन्होंने आगे बढ़ता हिंदुस्थान देखा। उनको हमारी शक्ति या कमज़ोरी के तरफ़ देखने का नज़रिया दिया। धीरे धीरे स्वीकार्यता बनी।  विश्व नेता ना एक यात्रा से बनते हैं ना एक यात्रा से स्वीकारे जाते हैं। उसके पीछे निरन्तर लम्बे और आगे विस्तृत सम्भावनाएं होती है, जो मोदी जी ने सम्भव कर के दिखाया है।

मोदी जी के विश्व नेता बनने में सबसे बड़े राजदूत रहे हमारे अनिवासी भारतीय। जिन्होंने, जिस भी देश में गए उस देश से उतना ही प्रेम किया, जितना माँ भारती से करते हैं। वहाँ के संस्कृति को वैसे ही सम्मान दिया जैसे स्वयं के संस्कृति का किया करते हैं। हिंदू शक्कर बन कर ऐसे घुल मिल जाता है कि उसे मूल पदार्थ से अलग कर के नहीं देखा जा सकता। वह सबसे अच्छा पड़ोसी भी है और सबसे ईमानदार बिज़नेस पार्टनर भी साबित हुआ है। ना  बहुसंख्यकों से ख़तरा जताया, ना सुरक्षा माँगी ना विशेषाधिकार माँगे। इस लिए भी हिंदुस्थानियो का तुलनात्मक व्यवहार सर्व स्वीकार्य रहा। इस लिए मोदी जी जो बोल रहे हैं वह सच और ईमानदार ही होंगे वह उन देशों के समाज, राजनेता और मीडिया ने मान लिया। इसलिए कि उनके सामने पहले से वहाँ रह रहे हिंदुस्थानियो का उच्च आदर्श उदाहरण था। डॉनल्ड ट्रम्प ने भी ह्यूस्टन के भाषण में हिंदुस्थानियो को ईमानदार, परिश्रमी, निष्ठावान, तत्वनिष्ठ, सांस्कृतिक मूल्यों के राजदूत और अमेरिका प्रेमी कह कर सम्बोधित किया। यही ट्रम्प मुसलमानों के लिए अमेरिका की सीमायें बंद कर रहे हैं और क्या क्या कहते है हम जानते है।

किसी भी गुरु को चेले तब तक ही मिलते हैं जब तक उनके चमत्कार चलते रहते हैं। हमें मोदी जी पर भरोसा करना चाहिए। उनके पराक्रमों और चमत्कारों को स्वीकारना चाहिए, क्योंकि तभी बाहर वाले स्वीकार करेंगे। हमें आशा है। हमारे खरबों पूर्वजों ने देखा विश्वगुरु हिंदुस्थान का सपना सच हो रहा है। संकल्प मोदी जी पूरा कर रहे है। यह पुनः चिरकाल टिका रहे। इसके लिए न केवल प्रार्थना करें बल्कि निरन्तर परिश्रम और निष्ठा से पराक्रम जारी रखें। – सुरेश चव्हाणके


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