मुखर्जी नगर मामले में साहस दिखाया होता तो फिर घायल न हुआ होता दिल्ली पुलिस का आत्मबल.. क्या बलिदान भी उन्ही को होना है और बलि भी उन्ही को चढना है ?


कहा जाता है की विपत्ति काल में साथ देने वाला ही अपना सगा होता है.. विपत्ति काल को भारत में परखने के लिए समाज का हर वर्ग स्वतंत्र है. यहाँ तक कि दुर्दांत आतंकी भी जिनको उस समय यकीनन फक्र होता होगा जब उनके लिए आधी रात को अदालतें खुलवा दी जाती हैं, लेकिन अगर कोई एक विभाग ऐसा है जिसके पास विपत्ति काल में गिनाने के लिए कोई भी नहीं होता है तो वो है पुलिस विभाग.. ये वो विभाग है जो विपत्ति काल और शांतिकाल हमेशा खुद को लाचार और बेसहारा पाता है..

ये वो विभाग है जो घर के झगड़ो से ले कर आतंकी हमलो तक जिम्मेदार ठहराया जाता है.. कई बार तो हालात यहाँ तक बने हैं कि इस विभाग का विरोध करने वालों ने बयानों में ये तक कहा कि वो अपने घर में गहरी नींद में सो गये थे और उनका नौकर सामन चोरी कर के भाग गया.. इसी के अंत में उन्होंने नहीं तो मीडिया के कुछ अति बुद्धिमानो ने इस खबर को ऐसा बनाया कि व्यापारी के घर चोरी , और सोती रही पुलिस.. सो कौन रहा था और सोता किसे दिखा दिया . पर ऐसा सिर्फ भारत में ही होता है, कहीं और नहीं ..

फिलहाल वर्तमान समय में दिल्ली पुलिस और वकीलों का विवाद वर्तमान समय में सबसे ज्यादा चर्चा में है. वायरल हो रहे वीडियो और हालात साफ़ साफ़ इशारा कर रहे हैं कि गलती किस की और कितनी थी लेकिन मांग सिर्फ और सिर्फ एक चल रही है कि पुलिस वालो पर कार्यवाही की जाय.. ये कार्यवाही मांग रहे लोग कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं बल्कि बाकायदा कानून के एक एक अंश और अंग के जानकार हैं वो सब जो भारत की राजधानी की शोभा बढ़ा रहे हैं..

पुलिस के खिलाफ अचानक ही पूरे भारत में प्रदर्शन और विरोध शुरू हो गये और घुमा फिर कर कहानी इस बिंदु पर लाइ जा रही है की पुलिस पर कार्यवाही हो.. किसी अन्य घटना में वीडियो साक्ष्य व् अन्य सबूत खोजना भले ही पुलिस की जिम्मेदारी हो लेकिन जब मामला पुलिस से जुड़ा हो तब वीडियो साक्ष्य ही नहीं, शायद भगवान् की भी गवाही कम पड़ जाए..यद्दपि इस व्यवस्था में कोई आश्चर्य भी नहीं है क्योकि यहाँ तो भगवान के जन्मस्थल और उनके अस्तित्व को भी पिछले 25 वर्षों से अदालत में साबित करना पड़ रहा है ..

निश्चित तौर पर अगर मीडिया व् सोशल मीडिया में दिल्ली की घटना के इतने वीडियो वायरल न हुए होते हो अब तक एक सिरे से बिना लम्बी जांच पड़ताल के कार्यवाही कर दी गई होती और पिटने के बाद भी कुछ सिपाही और सब इंस्पेक्टरों को दंड दे कर मामले को रफा दफा करने की जद्दोजहद शुरू हो गई होती.. मुखर्जी नगर की घटना से कौन वाकिफ नहीं होगा, हर किसी ने सच को सामने देखा और जाना था कि उसमे सही कौन था और गलत कौन .. लेकिन अंतिम बलि पुलिसकर्मियों की चढाई गई ..

देश के लिए ये अफ़सोस और अनुसन्धान दोनों का विषय है कि खाकी वर्दी पहनते ही वो कौन सा ठप्पा लग जाता है जो न उसकी किसी बात पर विश्वास किया जाता है और न ही उसके किसी कार्य पर.. मुखर्जी नगर मामले में वायरल हुए एक वीडियो में तो महिला पुलिस अधिकारी से इस प्रकार कार्यवाही की सौदेबाजी सुनाई और दिखाई दी थी जैसे किसी दूकान पर किसी सामान का मोलभाव किया जा रहा हो और अंतिम में एक जगह आ कर वो मोलभाव रुक गया जो जिसमे दोनों पक्ष सहमत थे..

अगर वहीँ दिल्ली पुलिस के कुछ बड़े नाम और उनके संरक्षक साहस दिखाए होते और सच को सच व् झूठ को झूठ कहने का दम रखे होते तो आज कैमरा चालू कर के दिल्ली पुलिस को पीटने और उनके वाहन जलाने की हिम्मत शायद किसी में न पडती.. भारत के गृहमंत्री अमित शाह जी ने अभी हाल में ही दिल्ली पुलिस मुख्यालय के उद्घाटन में पुलिसकर्मियों का दर्द विस्तार से बताया था लेकिन बताने के साथ उस पर सख्ती से अमल के भी निर्देश दिए होते तो शायद आज राष्ट्रीय आंतरिक सुरक्षा का प्रहरी ऐसे न पिट रहा होता..

दिल्ली की वर्तमान घटना में तो मामला और भी ज्यादा टेढा है.. यहाँ वीडियो में मारते पीटने वाले खुद को पीड़ित बताते हुए कार्यवाही उन पर मांग रहे हैं जिनके विरुद्ध अभी तक कोई प्रमाणिक साक्ष्य नहीं हैं.. उनके खिलाफ साक्ष्य इतना भर है की वो पुलिस वाले है और उन्होंने खाकी वर्दी पहनी हुई है.. शायद इतना साक्ष्य काफी भी है वर्तमान के उस भारत में जो देश की आंतरिक सुरक्षा को इतना चाक चौबंद चाहता है कि पत्ता भी न हिल पाए और परिंदा भी न पर मार पाए…

लेकिन घायल कंधे और टूटे मनोबल किसी समाज की कितने समय तक सुरक्षा करेंगे इसको खुद समाज को तय करना है.. पिछले कई वर्ष दिल्ली पुलिस की ही सतर्क निगाहें और चौकस कार्यवाही के चलते कोई बड़ी अनहोनी या आतंकी घटना नहीं घटी और आतंकियों को उनकी कार्यवाही से पहले या तो ढेर कर दिया गया या गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन उसके बाद भी उन्हें इनाम के तौर पर क्या मिला ? मुखर्जी नगर और तीस हजारी ? गृहमंत्री को विचार करना होगा कि आने वाली पीढ़ी पुलिस में क्यों जायेगी ?

90 % डाक्टर अपने बेटे को डाक्टर बनाना चाहते हैं , 90 % व्यापारी अपनी आने वाली पीढ़ी को अपने ही व्यापार में शामिल कर लेती हैं लेकिन अगर पुलिसकर्मियों से सवाल किया जाय कि कितने प्रतिशत पुलिसकर्मी चाहते हैं कि उनकी आने वाली पीढ़ी भी पुलिस में जाए तो ये प्रतिशत 90 तो नहीं होगा इतना तय है .. गृहमंत्री जी को विचार करना ही होगा कि आखिर ऐसा क्यों है कि जो नौकरी बचपन में सबसे ज्यादा आकर्षित करती है वही नौकरी बुढ़ापे में सबसे ज्यादा दर्द की वजह बन जाया करती है ..

इसका जवाब दिल्ली पुलिस के वो कर्मी बेहतर दे सकते हैं जिन्हें मुखर्जीनगर और तीस हजारी मामले में सजा मिली है.. वर्तमान मामले में वायरल हो रहे वीडियो देख कर कौन खुश हो रहा होगा इसको बताने की जरूरत नहीं है लेकिन दुनिया भर का इतिहास गवाह है कि जहाँ कहीं भी किसी भी सुरक्षा बल के मनोबल को कुचला गया है वहां शांति लम्बे समय तक स्थपित नहीं रह पाई है.. पुलिस का मनोबल गिरना किसी भी प्रकार से समाज के हित में नहीं है इसको जल्द ही समाज को समझना ही होगा , इस से पहले कि देर हो जाए..

फ़िलहाल सुदर्शन न्यूज तमाम दबावों और तनाव के साथ मुख्यमंत्री तक से ठुल्ला जैसा अशोभनीय शब्द सुन कर भी अपनी जान पर खेल कर दिल्ली की रक्षा कर रहे दिल्ली पुलिस के जवानो के धैर्य और दृढ़ता को नमन करता है और अपेक्षा करता है कि देश की आंतरिक सुरक्षा की इस रीढ़ पर अपने व्यक्तिगत स्वार्थो के चलते वार न किया जाय क्योकि रीढ़ पर हमला पूरे शरीर को लकवाग्रस्त बना देता है . साथ ही उम्मीद करता है कि जनसंतुष्टि के लिए किसी पुलिसकर्मी को बलि का बकरा न बनाया जाय क्योकि वर्दी के अन्दर वो भी एक इन्सान है जिसका परिवार उनके कमाए पैसो से पल रहा होता है ..

रिपोर्ट –

राहुल पाण्डेय

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज 

नोएडा मुख्यालय 

मोबाईल- 9598805228

 


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