क्रिकेट, बॉलीवुड , राजनीति , ब्यूरोक्रेसी , न्यायपालिका हर कहीं आसीन हुए सर्वोच्च पदों पर. फिर भी सदा पिछड़े होने का राग क्यों ?


वर्ष 1947 में आजादी के बाद पाकिस्तान ने अपने देश में अल्पसंख्यक हिंदूओं को आगे बढ़ने का कोई मौका नहीं दिया, आगे बढना तो दूर, उनको वहां अपनी जान और इज्ज़त के साथ वजूद बचाने का भी खतरा बना रहा जो आज तक है, लेकिन भारत में मुस्लमानों को राजनीति में, प्रशासन में, खेल में, मनोरंजन में और समाज में हर क्षेत्र में बढ़ी- बढ़ी सफलताएं मिली. इसी के चलते पाकिस्तान में हिन्दुओ की जनसंख्या घट कर लगभग खत्म सी हो गई लेकिन भारत में मुस्लिमों की आबादी तेजी से बढ़ी..

असल में सच तो ये है कि यहां मुसलमानों के साथ कोई भेदभाव नहीं हुआ और अगर आप नजर ड़ाले औऱ सोचें कि पिछले 72 वर्ष में हमारे देश में 3 मुस्लिम राष्ट्रपति बन चुके है और उपराष्ट्रपति भी बन चुके है… 4 मुस्लिम भारत के मुख्य न्यायधीश रह चुके है… सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जज भी एक मुस्लिम ही थी… मुस्लमान भारत की आंतरिक खुफिया एजेंसी इंटेलिजेन्स ब्यूरों के प्रमुख भी रह चुके है औऱ अगर आप अपनी हिंदी फिल्म इंड़स्ट्रि की बात करे तो वहां खान नाम के जो तथाकथित सुपरस्टार है वो खान्स के नाम से जाने जाते है यानि शाहरूख खान, आमिर खान और सलमान खान का कितना नाम है कितना दबदबा है, ये हमें आपको बताने की जरुरत नहीं…

भारत एक हिंदु बाहुल देश माना जाता है यहां पर लगभग 80 प्रतिशत आजादी हिंदुओं की है… लेकिन इतने बड़े देश में जो तीन टॉप सुपस्टार है वो तीनों मुस्लमान है, तीनों खान है, और इतने बड़े देश की करोड़ो की संख्या की जनता अपनी मेहनत की कमाई का पैसे खर्च करके सिनेमा हॉल में टिकट लेकर उनकी फिल्में देखने के लिए जाते है… जब ये सारे हिंदु फिल्में देखने के लिए जाते है, तो थिएटर में जाकर ये भूल जाते है कि ये हिंदू है, मुस्लमान है, सिख है, ईसाई है या इनका धर्म क्या है… ये सिर्फ अच्छी फिल्म देखने जाते है, अच्छी एक्टिंग करने जाते है…

इनमें से किसी के दिमाग में ये कभी नहीं आता कि वो एक हिंदू हीरो की फिल्म देख रहे है या एक मुस्लमान हीरो की फिल्म देख रहे है या किसी और धर्म के नायक की फिल्म देख रहे है..यद्दपि इसके बाद भी शाहरुख़ खान और आमिर खान ने देश में डर लगने जैसी बातें की, नसरुद्दीन शाह तो आज तक आग उगल रहे हैं और उसी राह पर शबाना आज़मी और जावेद अख्तर भी है जिनके आये दिन बयान प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हिन्दू समाज को उन्मादी या हमलावर के रूप में पेश किया करते हैं. इस संगीत का संगीतकार कौन है या गायक है वो किस धर्म का है…

मोहम्मद रफी के बारे में आप सोचिए… मोहम्मद रफी जैसा गायक हमारे देश में पैदा हुए उन्हें बहुत प्यार मिला, उन्हें बहुत शोहरत भी मिली… फिल्मों के बाद क्रिकेट पर नजर डालिए, भारत में क्रिकेट को भी एक धर्म ही माना जाता है और यहां भी मनसूर अली खान पटौदी, मोहम्मद अजहरुद्दीन, जहीर खान, इरफ़ान पठान से लेकर आज की टीम में भी मोहम्मद शम्मी तक ना जाने कितने मुस्लमान खिलाड़ियों ने भारत के लिए भी क्रिकेट खेले है. मोहम्मद अजरुद्दीन और पटौदी तो भी भारत की क्रिकेट टीम के कप्तान भी रह चुके है…

ये कुछ उदाहरण आज हमने आपको देने की कोशिश की, जो इस देश की जनता है जो समाज है वहां पर कोई भी, किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं है, लेकिन क्या आप ऐसे उदाहरण हमें पाकिस्तान से लाकर दे सकते है???  क्या आप हमे ऐसे उदाहरण बांग्लादेश से लाकर दे सकते है??? क्योंकि वहां पर दोनों ही देश अपने आप को इस्लामिक देश मानते है और खुलकर कहते भी है…


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