कप्तान नहीं बल्कि कानून सुधारने की जरूरत.. आखिर कौन है अलीगढ का गुनाहगार और सच पर क्यों हावी है दुष्प्रचार ?

वो घटना जिसने जून 2019 में पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा है वो सम्बन्ध रखती है अलीगढ से.. VVIP हस्तियों के निवास व कार्यस्थल से दिल्ली से लगभग 200 किलोमीटर दूर ये वो जगह है जो कुछ समय पहले पाकिस्तान के निर्माता जिन्ना की फोटो के लिए भारत के हर हिस्से में चर्चा में आई थी.. अब वही अलीगढ़ एक बार फिर से चर्चा में है और वो चर्चा है एक मासूम बच्ची की जिसका नाम है ट्विंकल.. वो मासूम जिसके साथ ऐसी दरिंदगी हुई है जिसकी मिसाल शायद इतिहास में किसी क्रूर आक्रान्ता के समय में खोजनी पड़े.

इस घटना ने अलग अलग विचारधारा के लोगों के ऊपर अलग अलग रूप से असर डाला. वो लोग जो किसी बेटी के भाई या पिता थे और उनकी प्राथमिकता में वो थीं , उन्होंने अपनी बहन बेटी के सुरक्षा की चिंता की.. कुछ राजनैतिक मानसिकता के लोगों ने इस मामले में प्रदेश सरकार पर निशाना साधा और मुख्यमंत्री ही नहीं प्रधानमन्त्री तक को कटघरे में खड़ा किया.. इसी में कुछ ने इस मामले को साम्प्रदायिक रूप से देखा और एक वर्ग ऐसा भी था जिसने सारा ठीकरा पुलिस के सर पर फोड़ना चाहा ..

असल में समाज के एक छोटे से वर्ग में आदत है कि वो किसी भी घटना की तह तक जाए बिना , हर घटना को मात्र सुनते ही पुलिस को दोष देना शुरू कर देते हैं जबकि पुलिस के पास ऐसा कोई भी दैवीय यंत्र नहीं है जो किसी के मन में क्या चल रहा है उसको जान सके.. दरिंदगी की शिकार हुई बच्ची के पिता और दरिंदो के बीच पैसो के लेन देन की बात भी सामने आई जिस से इतना तो तय है कि कम से कम बेटी के पिता और परिवार के मन में कोई हिन्दू मुस्लिम आदि की भावना नहीं रही होगी ..

पैसे का लेन देन अक्सर अच्छे परिचित से ही होता है , जब खुद बच्ची के पिता ये नहीं जान पाए कि उनसे परिचित इन दरिंदो के मन में क्या चल रहा है तो दूर कहीं थाने में बैठे पुलिस वाले को क्या भनक रही होगी कि दरिंदो के मन में क्या चल रहा है.. इसलिए प्रथम दृष्टया कुछ लोगों के ये आरोप कि पुलिस को पहले से पता होता है , पूरी तरह से निरर्थक और अप्रमाणिक लग रहा है . फिलहाल घटना होने के बाद पुलिस के निचले स्तर पर कुछ लोगों की निष्क्रियता जरूर सामने आ रही है जिसका उन्हें विभागीय दंड जरूर मिला है ..

इस मामले में अगर अलीगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आकाश कुलहरि की बात की जाय तो घटना के बाद से उन्हें गाँव वालों के बीच में समझाते हुए और मीडिया को एक एक शब्द का जवाब देते हुए देखा जा सकता है . अलीगढ पुलिस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से मीडिया ही नहीं आम लोगों के लिखे सवालों के जवाब लगातार आये .. खुद से ही सभी बड़े मीडिया संस्थाओं को टैग कर के सभी मुख्य पहलुओं की जानकारी दी गयी .. और आख़िरकार सभी आरोपियों को हिरासत में भी लिया गया..

सिर्फ हिरासत ही नहीं , एक पुलिस अधिकारी के अधिकतम सक्षमता में आने वाले धाराओं में आरोपियों को निरुद्ध किया गया.. ऐसे मामलों के बाद कई जगहों पर पुलिस अधिकारियो को अपनी जिम्मेदारियों से बचते देखा गया है.. दिल्ली में निर्भया काण्ड अभी भी सबको याद है जिसमे कांग्रेस की शीला दीक्षित के शासन काल में इण्डिया गेट पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए जमा हुए प्रदर्शनकारियो पर किस प्रकार से दिल्ली पुलिस ने लाठीचार्ज किया था .. पर अलीगढ में हर तनाव को शांतिपूर्ण ढंग से काबू किया गया .

इतना ही नहीं , जब अलीगढ़ में मासूम ट्विंकल की निर्ममता से हत्या हुई थी , ठीक उसी समय मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक मासूम बच्ची की लाश नाले से बरामद हुई थी जिसके साथ ऐसी ही दरिंदगी हुई थी .. उस समय भोपाल पुलिस ने पीड़ित परिवार से कहा था कि कहीं भाग गई होगी .. इतना ही नहीं, शव बरामद होने के बाद भी अब तक कार्यवाही के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति चल रही है और भोपाल पुलिस कोई भी एक बड़ा अधिकारी मीडिया के आगे अब तक नहीं आया है जिस प्रकार से अलीगढ पुलिस खुद से आगे आ कर हर बड़े फ्लू से जनता और मीडिया को वाकिफ करवा रही है .

यहाँ दरिंदो की निंदा करने के बजाय, उन नापाक हरकत की जड़ पता करने के बजाय, पीड़ित परिवार की मदद करने के बजाय कुछ लोगों ने जिस प्रकार से वहां के पुलिस प्रशासन के खिलाफ हल्ला बोला वो कहीं न कहीं ये इशारा जरूर करता है कि उन्हें हत्यारे दरिंदो से नहीं बल्कि समस्या पुलिस के किसी अधिकारी से है जिसको वो मौक़ा दे कर बदनाम करना चाह रहे हैं.. यकीनन कई वकीलों ने इन दरिंदो का केस लड़ने से मना कर के एक मिसाल पेश की है पर सवाल ये है कि क्या ये यथावत बना रहेगा ?

यहाँ ये भी जानना जरूरी है कि दरिंदो को सज़ा दिलाने के लिए पीड़ित परिवार के , उनके कुछ सच्चे शुभचिंतको के साथ अगर कोई विभाग अंतिम समय तक खड़ा रहेगा तो वो पुलिस विभाग ही होगा जो सुनवाई में हर तारीख पर मौजूद होगा.. कोई आश्चर्य नहीं होगा तब जब कुछ समय बाद कोई वकील इन दरिंदो की तरफ से वकालतनामा भर कर इनके केस को लड़ने का एलान कर दे और तब वो इन्हें बचाने के लिए पुलिस के आज किये जा रहे सभी प्रयासों पर ऊँगली उठाएगा .. अफ़सोस की बात ये होगी कि इसको दरिंदो का कानूनी अधिकारी बता कर ख़ामोशी रखी जायेगी..

निश्चित तौर पर मासूम ट्विंकल से प्रेम और स्नेह के साथ उस बच्ची के साथ हुई दरिंदगी के खिलाफ रोष रखने वाले अगर मिल कर एक सार्थक दिशा में अपना प्रयास करें तो दिवंगत को जल्द न्याय मिलेगा .. न्याय की ये लड़ाई किसी भी हाल में पुलिस का विरोध कर के नहीं लड़ी जा सकती है .. मामले को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में भेजने का फैसला पुलिस के अधिकार क्षेत्र से बाहर है, दरिंदो को वकील मिले या न मिले ये भी निर्णय पुलिस नहीं कर सकती है .. इस मामले में दरिंदो के कुकृत्यो की गवाही देने के लिए वहां से समाज वालों को आगे आना होगा जिन्होंने पल भर के लिए भी उनकी दरिंदगी को महसूस भी किया हो और ये निर्णय जनमानस का है..

भले ही तमाम शिकायतों और उलाहनो से भरे पुलिस विभाग के ऊपर आये दिन आक्षेप लगते हों लेकिन एक इंसान के रूप में वर्दी पहने कुछ अति विरलों को छोड़ कर अधिकतर पुलिसकर्मियों में मासूम बच्चो को ले कर संवेदनशीलता जरूर होती है. वो भी किसी परिवार के सदस्य होते हैं और अपनी छुट्टियों में अपने परिवार में किलकारियां सुन कर आते हैं जो उनके विभागीय तनाव और दबाव को कम करती है.. कम से कम अलीगढ पुलिस का नेतृत्व कर रहे आकाश कुलहरि और उनकी टीम के चेहरे पर वो संवेदनशीलता जरूर देखने को मिली है. जो दोषी थे वो दण्डित भी हुए ..

मासूम ट्विंकल को अब लौटाया नहीं जा सकता है लेकिन एक ऐसा सबक जरूर लिया जा सकता है कि आगे ऐसी घटनाएं किसी भी हाल में न हों. जनमानस किसी के बहकावे या भड़कावे में न आ कर ये ध्यान से जरूर देखे कि कौन कौन मासूम ट्विंकल के न्याय की लड़ाई में हैं और कौन कौन दरिंदो की तरफ से ताल ठोंकते हैं .. उन कानूनी मजबूरियों पर ध्यान रखे जो इन दरिंदो को फांसी के फंदे पर चढने में देर करवाएगी.. उस सोच की गहराई में जाएँ जो मासूम बच्चियों में हिंसा और हवस देखती है .. बाकी पुलिस एक ऐसी रेलगाड़ी के समान है जो कानून की बिछाई पटरी पर ही चलने को बाध्य है.

 

रिपोर्ट – 

राहुल पाण्डेय 

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज – मुख्यालय नोएडा 

मोबाइल – 9598805228

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