बलिदानी पुलिसकर्मियों की याद में तो बीत गया “पुलिस स्मृति दिवस” पर उनकी स्मृति कब जो निर्दोष हो कर भी काट रहे हैं जेल या कर चुके हैं आत्महत्या ?


पुलिस के बलिदानियों को आज का दिन समर्पित रहा.. पूरे भारत के तमाम बड़े नेताओं और बड़े से बड़े पुलिसकर्मियो ने आज राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा करते हुए अपने जीवन को स्वाहा कर देने वाले वीरों को याद किया और उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए.. आज जो भाव व प्रेम पुलिस के लिए नेताओं, शासकों व अन्य लोगो मे था वो अगर रोज़ रहे थे पुलिस की दिशा और दशा दोनों अपने आप बदल जाये.. लेकिन अगर इसको कुछ पीड़ित स्टाफ के नजरिये से देखा जाय तो ये दिन ठीक वैसे ही लगेगा जैसे कुछ अति आधुनिक युवा मदर्स डे या फादर्स डे को साल में 1 दिन तो धूम धाम से मनाते हैं , पर बाकी 364 दिन उन्हें वृद्धाश्रम में बेसहारा छोड़ दिया करते हैं..

बात सिर्फ एक प्रदेश की नहीं है, यहां हालात कश्मीर से कन्याकुमारी व नागालैंड से गुजरात तक एक जैसे हैं.. एक अजीब सी सोच ने आम जनमानस के मन मे पुलिस के किये इतना विष भर रखा है कि उनके वेलफेयर की बात करने वाले को भी नाराजगी की दृष्टि से देखा जाता है.. यहां ये ध्यान रखना जरूरी है कि सांसदों व विधायको के भत्ते वेतन या अन्य सुविधाएं कब और कितना बढ़ती हैं इस से उसी विषम सोच का कोई सरोकार नहीं होता और अगर कभी कभार होता भी है तो मात्र 1 या 2 दिन सोशल मीडिया पर बेहद सामान्य विरोध के रूप में. पर जब पुलिसकर्मियों की निंदा लिखी जाती है तो उन्ही विशेष लोगों द्वारा इतनी शिकायतें गिना दी जाती हैं कि शायद लिखने के लिए स्याही में समंदर का पानी और कागज़ में पूरी जमीन भी कम पड़ जाए..

एक बात और समझ मे नहीं आती कि “पुलिस स्मृति दिवस” को देश की आंतरिक सुरक्षा में बलिदान हुए वीरों को सिर्फ याद करना तक क्यों सीमित कर दिया जाता है ? उस से आगे क्यों नहीं बढ़ा जाता है ? “पुलिस स्मृति दिवस” को अगर पुलिस स्मृति व आत्ममंथन दिवस” का नाम दे दिया जाय तो क्या बुराई है ? कहीं कोई न कोई कमी या तो सूचना में, या तो युद्ध कौशल में, या तो हथियारों में, या तो संख्या में, या तो नियमो में और या तो संसाधन में जरूर होती है जो एक पुलिसकर्मी अपराधी से युद्ध में वीरगति पाता है.. फिर उनमें से कितनी कमियो पर आज के दिन आत्ममंथन किया गया है इसका जवाब कोई बड़ा अधिकारी शायद न दे पाए, छोटे अधिकारियों को मुह बन्द रखने के निर्देश बहुत पहले ही जारी कर दिए गए हैं.. फिर इस से ये नुकसान होता है कि अगले साल आत्ममंथन न किये जाने से स्मृति में 3 – 4 और वीर शामिल हो जाया करते हैं जिन्हें साल में 1 दिन फूल चढ़ा दिया जाता है पर उनके बच्चे जीवन भर अनाथ, उनकी पत्नी आजीवन विधवा व उनके माता पिता ताउम्र बेसहारा हो जाते हैं..

निश्चित रूप से मात्र स्मृति दिवस मनाने व इसमें आत्ममंथन को शामिल न करने से साल में एक वीर बलिदानी को मिलने वाला फूल बहुत घाटे का सौदा होता है क्योंकि उनके बेसहारा परिवारों का सहारा वो फूल नहीं बन पाता.., उदाहरण के लिए चित्रकूट में डाकू बबली कोल से युद्ध मे वीरगति पाए सब इंस्पेक्टर जे पी सिंह जैसे कोई अन्य पुलिसकर्मी डाकू की गोली का शिकार न हो इसके लिए 2 वर्षों में क्या अतिरिक्त प्रयास किये गए ? क्या अब चित्रकूट या दस्यु, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तैनात सभी पुलिसकर्मियों को बुलेटप्रूफ जैकेट, उच्च क्वालिटी हथियार इत्यादि मिल गए ? सब इंस्पेक्टर जे पी सिंह को पुलिस स्मृति दिवस पर याद करने के साथ कोई दूसरा सब इंस्पेक्टर जे पी सिंह की तरह स्मृति न बने उसका आत्ममंथन हुआ या नहीं इसको सभी जानते हैं..

इस बीच मे संभल जिले में 2 वीर बलिदान हुए थे जिसमें उन्हें तिरंगा न मिलने का विवाद लंबे समय तक गूंजा था और संभल पुलिस प्रमुख ने कहा था कि तिरंगे का प्रावधान उत्तर प्रदेश पुलिस में नहीं है.. हालांकि ये बात मात्र 1 लाइन की थी पर इसने उत्तर प्रदेश पुलिस के लाखों बल के मन मे कितना गहरा घाव किया था ये तब ही जाना जा सकता था जब “पुलिस स्मृति दिवस” के साथ आत्ममंथन शब्द भी जोड़ दिया जाता.. जीते जी न वेतन बढ़ाने की मांग, न सुविधा बढ़ाने की शिकायत कर पाने वाले पुलिसकर्मी मृत्यु के बाद तिरंगे के लिए क्यों तरसे ये बड़े पदों पर बैठे सक्षमो को जरूर सोचना चाहिए.. क्या उनके द्वारा लड़ी गई लड़ाई व्यक्तिगत लड़ाई थी , क्या उन्होंने अपनी खुद की जमीन जायदाद बचाने के लिए गोली खाई थी ? इसीलिए पुलिस स्मृति दिवस के साथ आत्ममंथन दिवस भी जब लगाया जाएगा तब स्वतः ही इन सवालों के जवाब हर साल खोजे जाएंगे और हर साल स्मृति में शामिल होने वाले नए बलिदानियों की संख्या में भी कमी आएगी..

इस समय मामला कमलेश तिवारी का सबसे ज्यादा चरम पर है..सबसे ज्यादा चर्चा में है.. इस मामले में भी पुलिस पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि कमलेश तिवारी की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी ने सक्रियता नही दिखाई.. प्रथम दृष्टया ये सच भी हो सकता है पर अगर एक पुलिस वाले के हाथों उन दो हत्यारो में से एक भी मारा जाता तो आज UP पुलिस की निष्क्रियता पर सवाल उठा रहे तमाम विपक्षी दल उस पुलिसकर्मी का जीना कमलेश तिवारी की मृत्यु से भी बदतर कर चुके होते.. कितने उदाहरण मौजूद हैं इस बात के . पुलिसकर्मी दूसरों को बचाने की तो बाद में सोचेगा जब उसके खुद के बचने की संभावना की गवाही प्रयागराज कचहरी कांड में 5 साल से जेल काट रहा सब इंस्पेक्टर शैलेंद्र सिंह देगा ..जिसका कसूर सिर्फ इतना था कि उसने अपने प्राण बचा लिए..

निश्चित तौर पर अगर कमलेश तिवारी की घटना इतनी होती कि हत्यारो के हमले में बाकी सब बच जाते और पुलिसकर्मी वीरगति पाता तो शायद पक्ष व विपक्ष सब ख़ामोश होते.. कुछ माहौल ही इस तरह बना डाला गया है कि जीवित पुलिसकर्मी की बातों पर यकीन ही नही आता. अगर आता तो झांसी में पुष्पेंद्र व लखनऊ में विवेक तिवारी मामले में फंसे पुलिसकर्मियों को फांसी दिलाने के लिए इतने जोर शोर से आंदोलन न हुए होते.. इन दोनों घटनाओं में शायद पुलिसकर्मियों के दोष इतना भर था कि वो बेचारे जीवित बच गए.. इसको सोच कर भी रोंगटे खड़े होंगे कि अगर संभल में 2 कैदी मारे जाते और सिपाही जिंदा होते तो उनकी क्या दुर्दशा होती..

क्या पुलिस स्मृति दिवस पर इन तथ्यों की स्मृति नही आई.. बलिदान हो गए पुलिसकर्मियों को याद करना बहुत ही सराहनीय कार्य है लेकिन क्या बुराई है कि उन्हें पुलिस मुख्यालयों के बजाय उनके घरों में जा कर याद किया जाय.. देखा जाय कि उनके घरों के हालात क्या हैं ? बच्चे पढ़ पा रहे हैं या नही ? बूढ़े पेट भर रहे हैं या नहीं ? पत्नी को किसी और क घर मे झाड़ू पोंछा तो नही करना पड़ रहा .. ऐसा करने से न सिर्फ बलिदान हुए वीरों की आत्मा को शांति मिलेगी बल्कि समाज के नौजवानों को भी पुलिस में जाने की प्रेरणा मिलेगी.. साथ ही गांव समाज को एक सन्देश जाता कि मरने के बाद भी पुलिस वाले का परिवार सुरक्षित रहता है.. लेकिन मात्र मुख्यालयों में सलामी मार देने से बलिदानियों के पीड़ित व दुखी परिवारों को उतना ही फर्क पड़ता है जितना कि बरसात की बूंद पकड़ कर आसमान में जाने का विचार… उपरोक्त मंथन तभी संभव है जब “पुलिस स्मृति दिवस” में आत्ममंथन भी शामिल किया जाय ..

वैसे स्मृति में आत्महत्या करने वाले पुलिसकर्मी क्यों नही शामिल होते ? वो पुलिसकर्मी क्यों नही शामिल होते जो तनाव के चलते कई बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं और उन्ही बीमारियों का इलाज करवाते हुए कर्जदार हो कर ये लोक छोड़ जाते हैं.. स्मृति में उन पुलिसकर्मियों को शामिल क्यों नही किया जाता जो जेलों की सलाखों में कभी राजनैतिक कुंठा को शांत करने व कभी जनसमूह के दबाव को कम करने के लिए डाले गए हैं.. क्या स्मृति अर्थात “याद” वाली कैटेगरी में जीते जी कोई भी विकल्प नही है ? स्मृति में बिजनौर के सब इंस्पेक्टर सहजोर सिंह की याद क्यों नहीं आती है जिनके हत्यारे कौन हैं ये शायद किसी को भी पता नही चल पाया ? उनके लिए कभी पुलिस की अलग अलग टीमें रवाना नही की गईं. पता नही क्यों .. और उनका नाम स्मृति वाली कैटेगरी में भी नही है..

फिलहाल “पुलिस स्मृति दिवस” पर समाज की रक्षा के लिए प्राण देने वाले वर्दी में अमर हुए सभी वीर बलिदानियों को सुदर्शन न्यूज परिवार का शत शत नमन..और आशा है कि स्मृति के साथ आत्ममंथन भी जोड़ा जाएगा जिस से एक वर्दी वाले के शरीर को जीवित रहते शांति व सुकून न सही पर बलिदान के बाद उसकी आत्मा को शांति जरूर मिले…

रिपोर्ट-

राहुल पांडेय
सहायक संपादक- सुदर्शन न्यूज
मुख्यालय नोएडा
सम्पर्क- 9598805228


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