मेजर सोमनाथ जयंती विशेषांक- यदि 1947 में आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल के आई थी तो मात्र 1 साल बाद 1948 में उसी भारत को बचाने के लिए गोलियाँ क्यों चलानी पड़ी ?


इतना सवाल तो हर हाल में बनता है क्योंकि सत्य को जानना व उसकी तलाश करना हर किसी का ईश्वर प्रदत्त व कानूनीअधिकार है..तमाम गीतों में, तमाम किताबों में इस बात के जोर जोर से प्रकाशन हैं कि भारत को आज़ादी चरखे से, बिना खड्ग, बिना ढाल मात्र अहिंसा से मिली थी.. दावा यही किया जाता है कि अंग्रेजो को अहिंसा व इसी चरखे की शक्ति के आगे झुकना पड़ा था और आखिरकार भारत आज़ाद हुआ था.. उन किताबों में भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद का बहुत ही संक्षिप्त जिक्र आता है ..मंगल पांडेय आदि का नाम सिर्फ नाममात्र के लिए ही है ..ये आज़ादी का समय सन 1947 को था जब 15 अगस्त को देश स्वतन्त्र हुआ था..

उसके बाद इस आज़ादी के नाम पर एक परिवार सामने आता है जो लगातार कई वर्षों तक इस स्वतंत्रता को अपने परिवार द्वारा दिलाई जाने का दावा करता है .. इतना ही नही, वो इसके बदले में बहुत ही भारी कीमत मांगता है, और वो कीमत होती है देश की बागडोर, देश की सत्ता अपने हाथों में ..वो खुल कर कहते हैं कि हमें ये देश चलाने के लिए केवल इसलिए दो क्योंकि हमारे पूर्वज ने इस देश को अहिंसा , प्रेम आदि के दम पर स्वतन्त्र करवाया है. इतना ही नहीं, वो इसके दावे को सत्य भी साबित कर लेते हैं और कई कई बार देश को चलाते भी हैं ..

लेकिन सवाल उठता है कि ऐसे ही मांग कभी मंगल पांडेय, राम प्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आज़ाद आदि के घर वाले क्यों नही करने आये..उन्हें देश की बागडोर देना तो दूर, इतिहास में सम्मान तक नही पाने दिया गया..बताया जाता है कि कुछ इतिहासकारों व स्वघोषित कलमकारों ने इन्हें आतंकी तक लिख डाला था जिसको पूरे हक के साथ पढ़ाया गया कक्षाओं में ..क्या इन वीरों का दोष सिर्फ इतना था कि वो चरखा आदि के अभियान में न जुड़ कर उन अंग्रेजो के संहार के लिए हथियार उठा चुके थे जो अंग्रेज भारत को लूट कर अपने देश में यहां का वैभव भेज रहे थे ? अगर आज उन वीरो के घर से मनरेगा के मजदूर, चाय की दुकान वाले वंशज निकल रहे हैं तो ये दोष किस का है .. ?

आज मेजर सोमनाथ शर्मा की जयंती है..500 पाकिस्तानियों को अकेले धकेल देने वाले भारत के परमवीर ने आज ही जन्म लिया था .. ये अभूतपूर्व जंग सन 1948 में लड़ी गयी थी उस पाकिस्तान से जिसको सत्ता के लालच में बंटवाने का आरोप भी आज़ादी के एक बड़े तथाकथित ठेकेदार के ऊपर लगता है.. मेजर सोमनाथ व उनके साथी जवानों ने गोलियों का जवाब गोलों से दिया था और कई प्राण लेने के बाद अपने प्राण त्यागे थे.. ये युद्ध स्वतंत्रता के मात्र 1 वर्ष बाद हुआ था.. अर्थात सन 1948 में.. यद्द्पि आज भी देश की अवधारणा में एक बड़ा हिस्सा ये मानने के लिए कतई नही तैयार है कि भारत की स्वतंत्रता बिना खड्ग बिना ढाल नही बल्कि भारत माता के कई लालों के बलिदान के बाद आई है .. यहां उन तमाम लोगों में अधिकतर गिनती राजनेताओं की ही पाई जाएगी ..

अब सवाल ये बनता है कि जिस चरखे और अहिंसा के सिद्धांत और उसके जोर से मात्र 1 वर्ष पहले अंग्रेजो को कथित रूप से भगाया गया था, वही सब 1948 में पाकिस्तान के खिलाफ क्यों नही काम आया ?  ऐसा क्या था कि पाकिस्तान से लड़ने के लिए हमारे अस्त्र शस्त्र से लैस जवानों को भेजा गया जबकि कुछ लोग तो पाकिस्तान को अपना मित्र देश मान कर सहायता तक देने के पक्ष में थे ..इतना सवाल जरूर बनता है कि यदि सब कुछ अहिंसा से संभव था तो देश को मेजर सोमनाथ शर्मा जैसा वीर क्यों खोना पड़ा ? लड़ने के लिए ढाल और खड्ग ले कर जब सैनिक जा रहे थे तब मिली हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल वाला गाना क्यों बजाया जाता रहा ? ऐसा क्या था कि मात्र 1 साल के अंदर पाकिस्तान के खिलाफ वो अहिंसा रूपी मारक अस्त्र नाकामयाब रहा जो कथित रूप से अंग्रेजो को भगा देने में सफल रहा था ..


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