रोहिंग्या व बंगलादेशियों को घुसपैठ की खुली छूट देने वाली सेकुलर राजनीति के बीच छत्तीसगढ़ में CBI की डायरेक्ट एंट्री पर बैन की मांग.. कश्मीर में सेना व पश्चिम बंगाल में BSF का हो चुका है विरोध

ये भारत की धर्मनिरपेक्ष राजनीति का एकदम नया स्वरूप है .. यहां पर दुनिया के लिए आतंक बने रोहिग्या व बंगलदेशियो को न सिर्फ बुलाने बल्कि पूरी सुविधाओ के साथ उन्हें बसाने की खुली वकालत की जाती है पर इसी देश मे समाज की रक्षा कर रहे सेना के जवानों, BSF योद्धाओं व पुलिस के वीरो को हाशिये पर डाला जाता है ..आखिरकार CBI से किसी की क्या शत्रुता यदि वो कहीं न कहीं गलत नही है तो ..लेकिन रोहिंग्या, बंगलदेशियो को घुसपैठ की खुली वकालत करने वालों ने अपने राज्य में CBI की एंट्री को प्रतिबंधित करने की मांग की है ..ये मांग करने वाला राज्य है कांग्रेस शासित छत्तीसगढ़..

ज्ञात हो कि अब छत्त्तीसगढ़ काग्रेस सरकार भी चलेगी पश्चिम बंगाल और हैदराबाद की राह पर। सीबीआई के प्रवेश को रोकने के लिए कांग्रेस की छत्तीसगढ़ सरकार ने केन्द्र को पत्र लिखा।   जिस प्रकार ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल तथा चन्द्रबाबू नायडु की हैदराबाद की सरकारों ने सीबीआई के प्रवेश पर रोक लगा दी है उसी प्रकार की रोक अब राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार भी लगा सकती है। केन्द्रीय जांच एजेंसी सीबीआई किसी मामले में जांच के लिए किसी प्रदेश में जाती है तो उसे संबंधित प्रदेश सरकार से अनुमति लेनी होती है, लेकिन अनुमति लेने से जांच प्रभावित हो सकती है तथा अपराधी को लाभ मिल सकता है, इसलिए राज्य सरकारें पहले ही सहमति दे देती हैं।

पूर्व में दी गई इस सहमति को ही पश्चिम बंगाल और हैदराबाद ने वापस लिया है। अब कांग्रेस शासित छत्तीसगढ़ ने भी केन्द्र को पत्र लिख दिया है। जानकारों की माने तो राजस्थान और मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकारें भी सहमति वापसी का पत्र लिखेंगी। अब यदि किसी मामले में सीबीआई को राजस्थान में जांच करनी होगी तो पहले कांग्रेस सरकार से अनुमति लेगी। भले ही ऐसे निर्णय राजनीतिक नजरिए से हो रहे हों, लेकिन देश के लिए यह कदम बेहद खतरनाक हैं। जब देश में आतंकवाद लगातार बढ़ रहा है तब ऐसे निर्णय अपराधियों को लाभ ही पहुंचाएंगे। पश्चिम बंगाल और हैदराबाद की स्थिति किसी से छुपी नहीं है, लेकिन छतीसगढ प्रदेश को तो बख्शा जाना चाहिए।इस से पहले पश्चिम बंगाल में BSF व कश्मीर में सेना का कई बार खुला विरोध हो चुका है जिसमें मुख्यमंत्री तक शामिल रहीं, पर इन विरोधों को भारत की स्वघोषित सेकुलरिज़्म की राजनीति के सिद्धांतों पर खरा पाया गया और बुद्धिजीवी वर्ग खामोश रहा..

केंद्र सरकार और कांग्रेस में विवाद जरूरत से ज्यादा. हालांकि राजनीतिक दलों में विवाद होना सामान्य बात है, लेकिन नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार और राहुल गांधी के नेतृत्व वाले कांग्रेस संगठन में विवाद कुछ ज्यादा ही हो गया। मोदी और राहुल के बीच शब्दों की तल्खी भी ज्यादा है। 10 जनवरी को ही सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के मुद्दे पर कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की राय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और सुप्रीम कोर्ट के जज सीकरी से अलग रही। जब राहुल गांधी सीबीआई के प्रकरण में पहले ही गंभीर आरोप लगा चुके हैं तब प्रतिपक्ष के नेता की हैसियत से खड़गे को तो विरोध करना ही था। राजनीति चाहे कितनी भी हो, लेकिन देश की सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। देश रहेगा तो राजनीति होगी और यदि देश खतरे में होगा तो फिर राजनीति भी नहीं होगी। चाहे ममता बनर्जी हों या अशोक गहलोत सभी मुख्यमंत्रियों को देश की सुरक्षा का ख्याल रखना चाहिए। सत्ता हासिल करने के लिए राजनीति नहीं करनी चाहिए। माना कि कांग्रेस ने भाजपा को हटा कर तीन हिन्दी भाषी राज्यों में सत्ता प्राप्त की है, लेकिन यह सत्ता व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के लिए नहीं होनी चाहिए।

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