सर्जिकल स्ट्राइक, चुनाव और दीपावली भी नहीं मिटा पा रही हिन्दू संगठनों के मन से कमलेश तिवारी का दुःख और आक्रोश


जिस प्रकार से कमलेश तिवारी को बेरहमी से मारा गया उसके बाद जनमानस में उपजे आक्रोश को न तो सरकार के कार्य और न ही दैवीय संयोग ही खत्म कर पा रहे हैं और आक्रोश अभी तक साफ़ साफ दिखाई दे रहा है . जिस प्रकार से उनके घर में घुस कर उनकी नृशंस हत्या कर दी गई उसके बाद हिन्दू समाज कई जगहों पर सडको पर उतरा और कई स्थानों पर हिंसक वारदात हुई जिसको सख्ती से कुचला गया लेकिन उसके बाद अभी भी वो क्षोभ साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा है.

ध्यान देने योग्य है की कमलेश तिवारी की नृशंस हत्या के बाद उसकी बाकायदा जिम्मेदारी ली गई और हत्यारों ने साफ़ साफ कहा की कमलेश तिवारी की हत्या का उन्हें कोई अफ़सोस नहीं है और कमलेश तिवारी इस्लामिक कानून के हिसाब से वाजिबुल कत्ल थे अर्थात हत्या करने योग्य थे.. यही शब्द कुछ समय पहले उनके खिलाफ प्रदर्शन करने वाले बिजनौर के एक मौलाना ने बोले थे लेकिन धर्मनिरपेक्ष सरकारों ने उन बयानों को मात्र एक सामान्य आक्रोश समझ कर छिपा लिया.

कमलेश तिवारी की हत्या के बाद भारत की फ़ौज ने पाकिस्तान पर जबर्दस्त हमला बोला था और उसके कई सैनिक , आतंकियों को मार कर उसके कई बंकर तबाह कर दिए थे.. भारत ही नहीं पाकिस्तान की मीडिया और दुनिया भर के समाचार पत्रों में इस खबर को प्रमुखता से दिखाया गया पर भारत की सोशल मीडिया पर सिर्फ और सिर्फ कमलेश तिवारी छाये रहे.. उसके बाद चुनाव आये जिसमे मिली जुली प्रतिक्रिया रही पर मुख्य मुद्दा सिर्फ और सिर्फ कमलेश तिवारी ही रहे .

आज के डिजिटल युग में टी वी मीडिया के साथ सोशल मीडिया भी अपनी एक धमक रखने लगा है और सर्जिकल स्ट्राइक व् चुनाव के बाद अब दीपावली का त्यौहार भी सोशल मीडिया में कमलेश तिवारी की निर्मम हत्या की खबरों के साथ शेयर किया जा रहा है . एक लम्बा समय हो जाने और बीच में सर्जिकल स्ट्राइक , चुनाव और अब दीपावली का त्यौहार पड़ने के बाद भी हिन्दू जनमानस में कमलेश तिवारी की स्मृति ज्यों की त्यों होने का अर्थ ये लगाया जा रहा है की हिन्दू समाज इस दुस्साहस को आसानी से भूलने वाला नहीं है ..

 


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