यदि योगी सरकार ने सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह के लिए हिम्मत दिखाई होती तो लखनऊ, मथुरा और अब झांसी में पुलिस की दुर्दशा न हो रही होती

अगर पुलिस के कार्यों को प्रदेश स्तर पर देखा जाय तो हर स्थान के हालात एक जैसे नहीं दिखेंगे.. देश और प्रदेश बदलने के साथ ही पुलिस के कार्य और कठिनाई बदलती रहती है .. विदेशो की पुलिस का अध्ययन अगर बहुत संक्षिप्त रूप से किया जाय तो विकसित देशो जैसे फ़्रांस , ब्रिटेन , जर्मनी , आस्ट्रेलिया , नीदरलैंड , इटली आदि स्थानों पर पूरा गूगल खोज लेने के बाद भी कहीं एकाध खबरें उन देशो की पुलिस के खिलाफ मिलती हैं जो वहां की मीडिया ने छापी हो..

ये तो बात हुई विकसित देशो की . अब अगर बहुत ही पिछड़े देशो की बात की जाय तो भी ये मिलेगा कि वहां की मीडिया उनके खिलाफ मोर्चा नहीं खोले रहती.. उदाहरण के लिए अति पिछड़े अफगानिस्तान, म्यांमार , श्रीलंका, ईराक , सीरिया जैसे देशो के न्यूज पोर्टल , वेबसाईट या अख़बार अपने देश की पुलिस की अनावश्यक निंदा से बचते दिखाई देते है . सोशल मीडिया पर भी चेक कर के देखा जा सकता है कि वहां की जनता अपने पुलिस बल के खिलाफ बेवजह हल्ला बोल नहीं करती..

लेकिन भारत में क्या हालात हैं इसको बताने की जरूरत ही नहीं है .. तमाम अखबारों के पहले पन्ने से ले कर अंतिम लाइन तक पुलिस के खिलाफ क्या क्या होता है इसको खुद पढ़ा जा सकता है . उन्ही अख़बारों के बीच के पन्नो में कहीं एकाध अच्छी खबर भी होती है लेकिन वो खबर कुछ इस प्रकार से होती है कि – “अफजल गुरु के बेटे ने हाईस्कूल में पाए 80 प्रतिशत अंक” .. या इशरत जहाँ की माँ ने अपनी बेटी की याद में जलाया दिया .. इन खबरों के बाद फिर वो मुद्दे पर आ जाते हैं, अर्थात पुलिस के …

सवाल ये है कि क्या गृह युद्ध से जूझते ईराक और अफगानिस्तान जैसे देशो से भी बुरी भारत की पुलिस है ? अभी तत्काल में ईराक में चल रहे प्रदर्शन में 100 प्रदर्शनकारी वहां की पुलिस की गोलियों से मरे हैं लेकिन वहां की जनता दोष सरकार को दे रही है और वहां की व्यवस्था को .. लेकिन यहाँ के हालात और कुछ मीडिया वर्ग की माना जाय तो हर गलती सिर्फ और सिर्फ पुलिस की है .. ऐसा महौल शब्दों से बनाया जाता है कि जैसे ऋषि मुनियों के देश में वर्दी वाले दानव अशांति फैला रहे हों ..

अब अगर भारत की ही पुलिस की प्रदेश स्तरीय समीक्षा की जाय तो अलग अलग प्रदेशो में अलग अलग हालत हैं .. उदाहरण के लिए कश्मीर की पुलिस .. उसकी नीति खुद में और शासन से भी स्पष्ट है कि उसको आतंकी और आम नागरिक में अंतर कर के अपन एक्शन लेना है.. पंजाब में भी यही हालात है जहाँ खालिस्तानियो को चिन्हित कर के उनका दमन करना निर्देशित है.. असम में उल्फा बोडो और बंगलादेशी वहां की पुलिस के स्पष्ट एक्शन रेंज में आते हैं .

लेकिन जब बात उत्तर पदेश की हो तो कौन शरीफ है और कौन अपराधी ये तय करना इतना मुश्किल है कि जब तक पुलिस वाला निर्धारित करेगा तब तक सामने से अपराधियों की गोलियां उसको बींध चुकी होंगी .. जातिवाद और तुष्टिकरण के कुछ ऐसे ठेकेदार हैं यहाँ जो न सिर्फ आम जनता में बल्कि खुद वर्दी वालों में अपनी कुत्सित सोच का जहर भरने की हर सम्भव कोशिश करते हैं और इसमें कई बार वो सफल भी हो जाया करते हैं .. इसकी गवाही लखनऊ के बाद अब झांसी में मिल रही है..

आज उत्तर प्रदेश में किसी विभाग के चलते अगर योगी सरकार की सबसे ज्यादा किरकिरी हो रही है तो वो है पुलिस विभाग.. इतिहास गवाही है कि अपने ही रक्षको का मनोबल गिरा कर आज तक कोई स्थान सुरक्षित नही रहा है लेकिन कुछ लोगों के लिए सुरक्षा शायद बाद में जरूरी है , पहले अपनी राजनीति.. इन सबको दमन करने के लिए जो दृढ़ता योगी सरकार को दिखानी थी उसमे कहीं न कहीं कमी दिखी और इसी के चलते आज ऐसे हालात बन रहे हैं जो भयावह है ..

पुलिस वालों की लगातार आत्महत्या पर कोई चर्चा नहीं है. अगर यही सरकार समस्या का समाधान अंदर झाँक कर करने का प्रयास करती तो शायद हालत और बेहतर होते.. कभी प्रदेश पुलिस के मुखिया तक ने ये जानने की कोशिश की क्या कि आख़िरकार जिस सेना के सेनापति वो हैं उसके सैनिक खुद से ही खुद के लिए मौत क्यों चुन रहे हैं ? अगर एक मिनट के लिए मान भी लिया जाय कि झाँसी के पुलिस अधिकारी ने बेवजह गोली मारी तो जो मानसिक रूप से पीड़ित पुलिसकर्मी खुद को गोली मार रहे हैं वो जनता पर हमलावर नही होंगे इसकी क्या गारंटी .. ?

इस खबर को लिखते लिखते जानकारी ये आ रही है कि लखनऊ में ATS विंग के एक सिपाही दुर्गेश यादव ने खुद से खुद को गोली मार ली है .. फिलहाल इसके बाद भी चर्चा ये है कि पुलिस ने कागज़ न पूरे होने के चलते चालान क्यों किया.. अगर इतिहास में झांका जाय तो लखनऊ की घटना में सुनसान ATM के पास एक वाहन संदिग्ध हालत में खड़ा रहता है. 2 सिपाही गश्त कर रहे होते है उस क्षेत्र में जिसमे एक सिपाही तो पहली बार वहां ड्यूटी पर आया रहता है ..

सिपाही वाहन के पास जाते हैं तो वाहन वाला उनके ऊपर गाडी चढाने की कोशिश करता है . प्रतिउत्तर में हडबडी में गोली चलती है और विवेक तिवारी की मौत हो जाती है .. इस मामले ने सोशल मीडिया में जातिवादी स्वरूप में ऐसा तूल पकड़ा कि खुद योगी सरकार ने भी इसमें अपना पल्ला झाड़ा और सिपाहियों पर हत्या की धारा लगा दी गई .. किसी को अनुदान देना और आर्थिक सहयोग देना किसी भी हालत में गलत नहीं लेकिन जो उन पुलिसकर्मियों के साथ हुआ क्या वो सही था ?

धाराएँ ऐसी लगाईं गई अपने ही विभाग द्वारा अपने ही विभाग वालों पर जैसे कि दोनों सिपाहियों की बहुत पहले से कोई दुश्मनी रही हो . ऐसी धाराएँ तो बड़े बड़े गैंग्स्टरो पर नही लगती.. जो सिपाही कुछ सेकेण्ड पहले विवेक तिवारी को पहचानते भी नहीं थे वो उनकी साजिशन व निर्मम हत्या के दोषी हो गये .. इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बयान विवेक तिवारी के साथ बैठी लडकी का मान लिया गया .. उसके अलावा बाकी सब कुछ झूठ .. आज एक सिपाही जेल में है और दूसरा बर्खास्त..

सरकार के बाद इसी लखनऊ मामले में मीडिया के कुछ गिने चुने लोगों का नम्बर आया . उन्होंने अपने पति के लिए न्याय की भीख मांग रही सिपाही पत्नी तक को नहीं छोड़ा और उसको अपराधी का साथ देने वाला बता दिया .. संसार की वो कौन सी पत्नी है जो विपत्ति काल में अपने पति का साथ न दे .. लेकिन पुलिस में शायद ये नियम भी लागू नहीं है.. दोनों सिपाहियों की एप्लीकेशन तक नहीं ली गई इस मामले को बताने की कि उन्हें कुचलने की कोशिश हुई थी .. इसका अर्थ यही हुआ कि सिपाहियों ने कोई पुरानी रंजिश निकली .. लेकिन वो कौन सी रंजिश है ये न पुलिस को पता , न मृतक के परिवार को और न ही शायद अब तक न्यायपालिका को ..

मथुरा में भी जो कुछ हुआ वो दोहराने की जरूरत है . कुछ लोगों के शोर में ये भी नहीं देखा गया कि सच क्या है और झूठ क्या .. थाने के बाहर एक दम्पति आग लगाते हैं और उन पुलिस वालो पर मुकदमे दर्ज हो जाते हैं जो वहां उस समय मौजूद ही नही होते . उसके बाद इसी प्रकार की घटना और भी घटी .. मतलब साफ संदेश है कि आप शोर मचाओ , हम वही करेंगे जो आप चाहते हैं . फिर कानून और न्याय व्यवस्था शोर तंत्र या भीड़तंत्र क्यों न बन जाये ?

आज सबसे जायदा न्याय की बात करने वाले अखिलेश यादव के शासन काल में सब  इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह का मामला अभी तक पुलिस के मन में ज्यों का त्यों है.. माना कि झांसी वाले मामले में मृतक के ऊपर इस से पहले कोई मामला नहीं था लेकिन प्रयागराज की भरी कचेहरी में सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह पर हमला करने वाले नबी अहमद के ऊपर आधे दर्जन से ज्यादा मुकदमे थे… झांसी मामले का कोई भी वीडियो सबूत नहीं है लेकिन सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह के ऊपर हो रहे हमले का तो वीडियो सबूत भी मौजूद है .. क्या अखिलेश यादव जी बता सकते हैं कि उन्होंने जो शैलेन्द्र सिंह के साथ किया वो न्याय है .. ?

लेकिन वही अन्याय आज भी उस सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह के साथ चला आ रहा है.. योगी सरकार के आने के बाद उस परिवार ने सोचा कि उनकी पुकार सुनी जायेगी लेकिन वर्दी और पुकार शायद अलग अलग वस्तुएं हैं .. लगभग 5 साल से आधे दर्जन मुकदमो में वांछित एक व्यक्ति जो वीडियो में साफ़ साफ हमला करता अपने साथियों के साथ एक दरोगा पर हमला करता दिखाई दे रहा हो उस मामले में योगी सरकार ने इतना साहस नही दिखाया कि उसके घर को न्याय मिले और उसकी खाल से भी ज्यादा प्रिय वर्दी उसे वापस मिले ..

अगर IPS अजयपाल शर्मा जैसे लोग सामने न आये होते तो आज उस सब इंस्पेक्टर की बेटी की पढ़ाई फीस न जमा होने के चलते बंद हो चुकी होती.. अखिलेश सरकार में उठाया गया कदम योगी सरकार में भी वैसे का ही वैसे रहा.. सब इंस्पेक्टर का जीवन बर्बाद करने वाले वो तमाम लोग अब झाँसी वाले मामले में भी निष्पक्ष जांच होने देने के बजाय सीधे सीधे इस मामले को राजनैतिक अखाडा बनाते दिखाई दे रहे हैं जो न पुलिस के लिए बेहतर है और न ही पीड़ित परिवार के लिए ..

लेकिन अंत में इतना तो तय है कि आज अगर पुलिस विभाग के कुछ लोग कभी खुद मर कर तो कभी किसी को मार कर योगी सरकार के लिए प्रश्नचिंह बने हैं तो उसके पीछे योगी सरकार की भी इस विभाग के लिए उदासीनता जिम्मेदार है .. सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह और सिपाही विवेक के हालात कागजो में भले ही कानूनी रूप से गढ़ दिए गये हों लेकिन मानवता व सच्चाई के असली नजरिये से ये जरूर कहा जाएगा कि सरकार इनके लिए कुछ बेहतर कर सकती थी ..

बार्डर स्कीम , मानवाधिकार , पुलिस मैनुअल , विपक्षी आरोप जैसे कई नियम कानूनों में बंधा पुलिस वाला निश्चित तौर पर इस से बेहतर कुछ और कर पायेगा इसमें शक है.. एक सुरक्षित समाज के निर्माण के लिए ये बेहद जरूरी है कि सुरक्षा करने वालों का मनोबल न गिरे लेकिन हालात ऐसे बने हैं कि अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मार के पूछा जा रहा है कि खून क्यों बह रहा है ? सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र और सिपाही प्रशांत मामले में जो भूल हुई है उसका मंथन किया जाएगा और जहाँ गलती हुई है उसको सुधारा जायेगा ऐसी आशा विभाग ही नहीं जनता भी कर रही है ..

अन्यथा जिस प्रकार से इस मामले को जतिवादी रूप और रंग दिया जा रहा है आने वाले समय में ये हालात बन सकते हैं कि जिस जाति वाले अभियुक्त को पकड़ना है उसी जाति वाले पुलिसकर्मी को भेजा जायेगा.. आतंकवाद का भले ही आज तक भारत में धर्म निर्धारित नहीं हुआ हो लेकिन पुलिसकर्मियों के साथ अभियुक्तों की जाति निर्धारण की साजिश भारत में चल रही है .. योगी सरकार को समाज के इन रक्षको के घायल कन्धो पर मरहम लगाने की शुरुआत वहां से करनी होगी जहाँ से सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह व उस से पहले कई लोग राजनैतिक अन्याय के शिकार हुए हैं .. सरकार को उस धारणा से निकलना ही होगा जिसमे ये माना जाता है कि पुलिस है तो गलत ही होगी .. 

 

रिपोर्ट – 

राहुल पाण्डेय 

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज 

मुख्यालय – नोएडा

सम्पर्क – 9598805228

नीचे सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह का वीडियो जिसको देख कर निर्धारित कीजिये कि क्या इसमें भी झांसी वाले मामले की तरह सबूतों की जरूरत है –

राष्ट्रवादी पत्रकारिता को समर्थन देने हेतु हमे आर्थिक सहयोग करे. DONATE NOW पर क्लिक करे
DONATE NOW