बलिदान दिवस विशेष- भगत सिंह की फांसी रोकने के लिए बहुत कोशिश की थी सुभाषचंद्र बोस ने.. पर कोई था, जिसने नहीं दिया उनका साथ

बहुत कम लोग ही जानते होंगे ये पूरा इतिहास, शायद ही कोई जान पाया हो कि भगत सिंह के बलिदान की इच्छा के बाद भी बहुत ऐसे भी लोग थे जिन्होंने उनकी फांसी को रोकने के लिए हर संभव कोशिश की थी ..उनका नाम भी स्वर्णिम अक्षरों के योग्य था भारत के इतिहास में , पर उसी समय तमाम ऐसे भी थे जो नहीं चाहते थे कि वीर शिरोमणि भगत सिंह मुक्त हों.. वो वचनबद्ध थे अंग्रेजो के प्रति . जानिए वो सच्चा इतिहास जो महान सुभाषचंद्र बोस जी के प्रति आप के मन मे और अधिक श्रद्धा को बढ़ाएगा और नतमस्तक करेगा उस वीर के लिए जो चिंतित था एक अन्य वीर के लिए ..
सुभाष चंद्र बोस की पहली मुलाकात गांधी से 20 जुलाई 1921 को हुई थी। गांधी जी की सलाह पर वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए काम करने लगे। वे जब कलकत्ता महापालिका के प्रमुख अधिकारी बने तो उन्होंने कलकत्ता के रास्तों का अंग्रेजी नाम हटाकर भारतीय नाम पर कर दिया। भारत की आजादी के साथ-साथ उनका जुड़ाव सामाजिक कार्यों में भी बना रहा। बंगाल की भयंकर बाढ़ में घिरे लोगों को उन्होंने भोजन, वस्त्र और सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का साहसपूर्ण काम किया था।
भगत सिंह को फांसी की सजा से रिहा कराने के लिए वे जेल से प्रयास कर रहे थे। उनकी रिहाई के लिए उन्होंने गांधी से बात की और कहा कि रिहाई के मुद्दे पर किया गया समझौता वे अंग्रेजों से तोड़ दें। इस समझौते के तहत जेल से भारतीय कैदियों के लिए रिहाई मांगी गई थी। गांधी ब्रिटिश सरकार को दिया गया वचन तोड़ने के लिए राजी नहीं हुए, जिसके बाद भगत सिंह को फांसी दे दी गई। इस घटना के बाद वे गांधी और कांग्रेस के काम करने के तरीके से बहुत नाराज हो गए थे।
“चीन के खिलाफ सिर्फ खबर ही न चलायें बल्कि बल्कि चीनी कम्पनियों के विज्ञापन भी मेरी तरह बंद करे भारतीय मीडिया”- सुरेश चव्हाणके“चीन के खिलाफ सिर्फ खबर ही न चलायें बल्कि बल्कि चीनी कम्पनियों के विज्ञापन भी मेरी तरह बंद करे भारतीय मीडिया”- सुरेश चव्हाणके“चीन के खिलाफ सिर्फ खबर ही न चलायें बल्कि बल्कि चीनी कम्पनियों के विज्ञापन भी मेरी तरह बंद करे भारतीय मीडिया”- सुरेश चव्हाणके
अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाष को कुल 11 बार कारावास की सजा दी गई थी। सबसे पहले उन्हें 16 जुलाई 1921 को छह महीने का कारावास दिया गया था। 1941 में एक मुकदमे के सिलसिले में उन्हें कलकत्ता की अदालत में पेश होना था, तभी वे अपना घर छोड़कर चले गए और जर्मनी पहुंच गए। जर्मनी में उन्होंने हिटलर से मुलाकात की। अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध के लिए उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया और युवाओं को ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का नारा भी दिया।
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