मुंबई ब्लास्ट विशेष- कोई “डॉन” बन गया, कोई “हीरो” घोषित हो गया और कोई “भाई”.. चीखते रह गये मरने वालों के घर वाले


अक्सर सडकों पर आपने ताखित्यां ले कर कुछ लोगों को कभी गुजरात दंगो का पीड़ित बताते हुए तो कुछ को कभी मुज़फ्फरनगर हिंसा का शिकार बताते हुए न्याय आदि की मांग करते देखा होगा ..उनके साथ स्वघोषित बुद्धिजीवियों की एक लम्बी फ़ौज भी खड़ी देखी रही होगी और मानवाधिकार वालों की लाइन भी . वो सभी बार बार एक ही आवाज देते दिखते रहे होंगे कि “अल्पसंख्यको पर अत्याचर” .. लेकिन कहीं भी नहीं सुना होगा तो एक आवाज और वो आवाज है मुंबई ..

दशको पुराने इस घटना की चीखें अभी भी लोगों के कानों के गूंजती है .. अगर उसको बिना सेकुलरिज्म का नियम लगा कर सुना जाय . उन घरों की विधवाओं के साथ , उन बूढी माओं के साथ कोई भी नहीं आया जिनको बुढापे में पानी पिलाने वाला कोई नही बचा है . उस हृदय विराद्क घटना पर शायद ही कभी किसी प्राइम टाइम या प्राइम व्यक्ति के मुह से चर्चा हुई हो . यहाँ तक कि इस कुकृत्य में शामिल रहे कई लोगों को खास तमगे इस धर्मनिप्रेक्ष समाज में मिल गये…

आपको ज्ञात करा दे 1993 में हुए मुंबई बम धमाकों के आरोप में संजय दत्त को 5 साल की सजा सुनाई गई थी। 5 साल की सजा काटने से 8 महीने पहले रिहा होकर लौटे थे.. खबर तो ये भी आई थी कि अंडरवर्ड से अपने रिश्तों के लिए बॉलीवुड ही नहीं बल्कि पूरे भारत में बदनाम रहे बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त नशे के खिलाफ शुरू होने वाली मुहिम का ब्रांड एंबेसडर बनने को तैयार थे .  ऊपर फिल्म बनी थी जिसका नाम संजू था और उस फिल्म में संजय दत्त का मार्मिक चित्रण किया गया था बजाय कि मुंबई ब्लास्ट में अपनी जान देने वालों के . ये सब कुछ चलता रहा और भारत देखता रहा ..  संजय दत्त को भी और उनकी फिल्म को भी . यहाँ तक कि ट्विटर पर भी उनके लगभग २ मिलियन फालोवर हो गये …

अबू सलेम तक पर फिल्म बन गई जो इस नरसंहार का मुख्य दोषी था . उसके ऊपर फ़ौरन ही गैंग्स्टर फिल्म बना डाली गयी . उसकी और उसकी प्रेमिका मोनिका बेदी की प्रेम कहानियों को भी चर्चा में ला दिया गया जिस से लोगों के आगे उसकी क्रूर और दरिंदगी की भावनाओ के बजाय एक प्रेमी और इश्कमिजाज़ इंसान की छवि जाए . उसकी अम्मी आदि के इंतकाल की खबरें तक चला कर भावनाओं का ज्वार उछाला गया और उसको चुनाव आदि तक में आने की खबरें चर्चा में लाइ जाती रही ..इस हत्यारे को मुंबई में नाम दिया गया था “भाई” का जो अपराधियों को एक कवर जैसा देता प्रतीत होता है .

इसके मुख्य गुनाहगार के लिए आधी रात में कोर्ट खुली और उसके जनाज़े में तमाम लोग उमड़े . उन्मादी नारे लगाए गये थे और किसी ने भी ये नहीं सोचा कि उनके कंधे पर रखी लाश एक आतंकी की है.. लाश को दफना कर आने वालों ने फ़ौरन ही खुद को देशभक्त घोषित कर डाला और बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग ने उस पर फ़ौरन ही मुहर लगा दी . इसी के मुख्य गुनाहगार दाऊद इब्राहीम को नया नाम डॉन दे दिया गया जिसके पीछे उसके द्वारा बहाया गया लहू छिपाने की कोशिश की गयी .

 


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