दूध का कारोबारी नहीं था अकबर खान .. फिर उसके साथ 2 गायें क्यों थी और उसे ले जाने के लिए रात ही क्यों चुनी उसने ?

राजस्थान की एक घटना जिसमे गाय के साथ जा रहा अकबर भीड़ के हाथ चढ़ गया और आख़िरकार वो मारा गया . इस घटना ने पूरे भारत में एक बार फिर से हल्ला और शोर शुरू कर दिया है . कल संसद में राजनाथ सिंह के बयान के बाद जिस प्रकार से विपक्ष उन पर हमलावर था उसे इस घटना से संजीवनी मिल गयी है और वो इस मुद्दे पर अंधाधुंध हल्ला बोल पर उतारू हो गया है .. एक बार फिर से निशाने पर आ चुके हैं गौ रक्षक और इसी बहाने निशाना साधा जा रहा है सरकार पर .. लेकिन अगर इसको गहनता से देखा जाय तो इसमें अंतिम निशाने पर है हिंदुत्व जिसको ले लिया गया है निशाने पर .. एक बार फिर से ..

ज्ञात हो कि पहलू खान और दादरी के अखलाक मामले में सच से ज्यादा फैलाए गये झूठ का खुलासा बाद में हुआ था लेकिन तब तक धर्म को अधर्म से और सत्य को असत्य से काफी परेशान किया जा चुका था . ये वही मानसिकता थी जो साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को 7 साल तक भगवा आतंकी कहती रही और जब वो न्यायालय से बरी हुई तो उनके पहले इन्टरव्यू के लिए लाइन लगा दी गयी . लेकिन उस इंटरव्यू में एक बार भी अपने द्वारा उनके खिलाफ किये गये दुष्प्रचार के लिए माफ़ी नहीं मांगी गई और न ही 7 साल तक उनके द्वारा झेली गयी पीड़ा को महसूस करने की जहमत उठाई गयी .. 

एक बार फिर से चर्चा में है अलवर . बताया जा रहा है कि राजस्थान के अलवर जिले के रामगढ़ गांव में एक बार फिर मॉब लिंचिंग का मामला सामने आया है . यहां गांववालों ने एक शख्स को गो तस्करी के शक पर पीट-पीट कर मार डाला.  इस मामले को बताने वाला चश्मदीद है असलम नाम का एक व्यक्ति जो उस समय अकबर के साथ खुद को होना बता रहा है . उसके अनुसार  ये तब हुआ जब अकबर और वो पैदल पैदल गो गायों को लेकर जा रहे है तभी अचानक कुछ लोगों ने उन दोनों को घेर लिया और पीटना शुरू कर दिया। असलम के अनुसार वो किसी तरह से भीड़ से निकल कर भाग आया लेकिन अकबर को भीड़ ने मार डाला।

इस मामले में कुछ सवाल जरूर उठते हैं जिसके जवाब तलाशने ही होंगे . अब तक असलम ने ये नहीं बताया है कि वो और उसका साथी अकबर गायों को किस उद्देश्य से ले जा रहा था और अगर कोई उद्देश्य बताया भी था वो क्या तथ्यों की कसौटी पर साबित हुआ ? सबसे बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि असलम और अकबर दोनों के घरेलू कार्यो में इस से पहले दोनों में किसी भी प्रकार से दूध का कोई कारोबार नहीं था .. तो सवाल उठता है कि दोनों गाय को दूध के उद्देश्य से ले जा रहे थे या किसी अन्य उद्देश्य से ? यद्दपि किसी भी प्रकार की हिंसा को समर्थन करना सही नहीं माना जा सकता लेकिन कानून दोनों पक्षों में से किसी के भी द्वारा तोडना उचित नहीं ..

ज्ञात हो कि राजस्थान में गौ हत्या कानूनी रूप से निषेध है . अगर गौ पालक होते तो इन दोनों का गौ शाला या दुग्ध शाळा का कोई प्रमाण अब तक मीडिया के सामने जरूर आ गया होता . इसके साथ अगर ये गौ वंश को अपने व्यक्तिगत पालने आदि के लिए ले जा रहे थे तो उन्हें रात के अँधेरे में इसे ले जाने की जरूरत क्यों पड़ी , वो इसको दिन में भी ले जा सकते थे .. इसके अलावा जिस स्थान पर ये घटना घटी है उस स्थान से इन दोनों के व्यक्तिगत घर काफी दूर बताये जा रहे हैं, तो उसके बाद भी गौ वंश को पैदल ले जाने का अर्थ ये है कि सम्भव है कि ये गौ वंश घर के बजाय कहीं और ले जा रहे थे .

यकीनन इंसान की हत्या किसी भी रूप में जायज नहीं ठहराई जा सकती है लेकिन आस्था पर प्रहार भी उचित नहीं है . किस को नहीं याद है डेनमार्क की वो घटना जिस में एक कार्टून के चलते एक देश में तो अमेरिका का राजदूत तक मार डाला गया था और भारत के भी कई जगहों पर हिंसक प्रदर्शन हुए थे जिसमे भारी हानि हुई थी . वहां उनकी आस्था का मामला था जिसे आज तक किसी ने कटघरे में खड़ा नहीं किया .. उन घटनाओं को आज तक तथाकथित बुद्धिजीवी और स्वघोषित सेकुलर समाज ने माब लिंचिंग नहीं कहा.. एक वर्ग को इतना जानना जरूरी है कि गाय हिन्दू समाज के लिए माँ का स्थान रखती है न कि पशु या भोज्य पदार्थ का . आस्था के मामले में यद्दपि हिन्दू समाज से ज्यादा सहिष्णु कोई नहीं हो सकता है जो अपने आराध्य को अपनी आँखों के आगे 30 साल से ज्यादा समय से फटे तम्बू में देख कर भी सिर्फ अदालत के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा है . इस पूरे मामले में दोषियों के साथ हो रही कार्यवाही के साथ इतना जरूर जानना जरूरी है कि असलम और अकबर गाय क्यों और किस उद्देश्य से ले जा रहे थे .. *

* उपरोक्त विचार लेखक के स्वतंत्र विचार हैं …. 

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