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कश्मीर ही नहीं असम की समस्या के जड़ में हैं नेहरु. जानिए वो संधि , जिसके बाद असम बन गया बंगलादेशी आक्रान्ताओं का ठिकाना

यकीनन आप इस संधि के बारे में नहीं जानते होंगे . जानेगे भी कैसे जब इसको बताया ही नहीं गया. नकली कलमकारों और तथाकथित इतिहासकारों के अनुसार १९४७ के कुछ अहिंसक आंदोलन के बाद फिर इतिहास में लिखने लायक गुजरात के दंगे हैं . बीच में ऐसा कुछ भी नहीं उन्हें लगा जिसे बताया जाय न ही उस से पहले .. जिसका उदहारण ये है कि १८५७ की रक्तरंजित क्रांति का उल्लेख नहीं किया गया और बाद में किस ने कश्मीर की समस्या उत्पन्न की और किस ने असम को इस हाल में किया ये भी नहीं बताया गया .. और धीरे धीरे कई राज्य चढ़ गये तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की बलि .. जैसे कश्मीर और असम .

ज्ञात हो कि कश्मीर की समस्या में भारत के पूर्व व् प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल लाल नेहरु की नीतियों से लगभग कई लोग वाकिफ हैं . सेना को एन मौके पर रोक देना . मामले को खुद से ही उठा कर संयुक्त राष्ट्र में दे देना . धारा ३७० लगा देना , इतने के बाद भी पाकिस्तान से शांति के कबूतर उड़ाना और कश्मीरी चरमपंथियो को शुरू से ही कड़ाई के बदले दुलारना पुचकारना और सेना पर ही जोर दिखाना आदि ऐसे कार्य रहे हैं जो आज तक कश्मीर के दर्द का कारण बने हुए हैं .. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कश्मीर ही नही असम में इतनी भयानक बंगलादेशी घुसपैठ के पीछे भी कहीं न कहीं नेहरु की नीतियां हैं .

1947 में बंटवारे के समय कुछ लोग असम से पूर्वी पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनकी ज़मीन-जायदाद असम में थी और लोगों का दोनों और से आना-जाना बंटवारे के बाद भी जारी रहा. इसमें 1950 में हुए नेहरू-लियाक़त पैक्ट की भी भूमिका थी. इसमें नेहरु ने उस समय भारत की पूर्वी पाकिस्तान अर्थात वर्तमान बंगलादेश की सीमा को सरकारी आदेश देते हुए खोल दिया था जिसके चलते ही .. तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और बाद के बांग्लादेश से असम में लोगों के अवैध तरीके से आने का सिलसिला शुरू हो गया और उससे राज्य की आबादी का चेहरा बदलने लगा. इसके बाद असम में विदेशियों का मुद्दा तूल पकड़ने लगा.  इन्हीं हालात में साल 1979 से 1985 के दरम्यान छह सालों तक असम में एक आंदोलन चला. सवाल ये पैदा हुआ कि कौन विदेशी है और कौन नहीं, ये कैसे तय किया जाए? विदेशियों के ख़िलाफ़ मुहिम में ये विवाद की एक बड़ी वजह थी. आज लाखों घुसपैठियों की मात्र एक प्रदेश में होने की आहट के पीछे उसी नेहरु और लियाकत पैक्ट का ही हाथ है . यदि उस समय से ही सीमाओं को सील किया गया होता तो आज ये हालत नहीं होती लेकिन उस समय नेहरु की इस नीति का विरोध करने वालों को कांग्रेस द्वारा ही साम्प्रदायिक और शांति का दुश्मन कहा गया था . 

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