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चुनाव तो निष्पक्ष हो रहा है, क्या वही निष्पक्षता पुलिसकर्मियों के साथ भी है ? पढ़िए रिपोर्ट और पूछिए सवाल

भारत में इस समय माहौल चुनाव का है.. इस माहौल में जनता का एक बड़ा वर्ग अपनी अपनी पसंद की पार्टियों की जीत के लिए अपने स्तर से प्रयास कर रहा है और बढ़ चढ़ कर मतदान में हिस्सा भी ले रहा है . मतदान करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के मन में ये आशा है कि देश को एक मजबूत और स्थिर सरकार मिले जो देश का विकास करने के साथ साथ देश के नागरिको की जान माल आदि की सुरक्षा को भी सुनिश्चित करे.. यद्दपि जनता की ये अपेक्षा सही भी है क्योकि भारत ने आतंकवाद , मजहबी उन्माद, दंगो, अलगाववाद और नक्सलवाद के घाव लगातार झेले हैं जिस से जनता अब स्थाई मुक्ति चाहती है, शांति से रहने के लिए .

लेकिन क्या सरकार और चुनाव जीत कर आने वाले नेता खुद ही आतंकियों, अलगाववादियों , दंगाईयो , उन्मादियों , अपराधियों के आगे जा कर खड़े हो जायेंगे लड़ने के लिए ? जवाब है कि किसी भी हाल में नहीं . फिर वो किस को आगे करेंगे ? जब भी बात देश की आंतरिक सुरक्षा से जुडी होगी तो सबसे पहले आगे आयेंगे पुलिसकर्मी .. अब सवाल ये उठता है कि सरकार मजबूत हो गयी तो क्या पुलिस भी मजबूत हो गई ? जी नहीं , वो विभाग जहाँ था , आज भी लगभग वही है ..

देश में भले ही विकास की बयार चल रही हो लेकिन इस बयार से अगर किसी को जरा सा भी हवा नहीं लगी तो वो है पुलिस विभाग.. कभी इनके सिपाहियों तक का वेतन अध्यापको के बराबर हुआ करता था लेकिन आज वेतनवृद्धि की दौड़ में ये उनसे इतने पीछे रह गये कि सब इंस्पेक्टर को भी उतना वेतन नहीं मिल पाता है .. यद्दपि सभी विभागों का अपना अपना महत्व है लेकिन विकास की दौड़ में पुलिस विभाग का इतना पीछे रह जाना कही न कहीं उनके लिए दर्दनाक है जिन्होंने वर्दी पहन रखी है .

फिलहाल ये बात सरकार की और उस इतिहास की है जो वर्तमान भी है लेकिन अगर बात इन चुनावों और चुनाव आयोग की करें तो एक नया विषय निकल कर सामने आता है जो आप यकीनन नहीं जानते होंगे . इन चुनावों में आपको दो जिम्मेदारियां निभती दिखेंगी .. पहली जिम्मेदारी है मतदान केंद्र के अंदर बैठ कर जनता के हाथों में स्याही लगवाते और बाकी अन्य कार्य करते पीठासीन अधिकारियो और अन्य कर्मियों की.. ये सभी कार्य मतदान कक्ष के अन्दर होता है जहाँ कोई वोट डालने पहुचता है .

लेकिन दूसरी जिम्मेदारी दिखेगी मतदान कक्ष के बाहर.. यहाँ पर चिलचिलाती धूप , कहीं बरसात , कहीं आंधी का मौसम , और उसी मौसम में खड़ा कोई पुलिसवाला जिसके हाथो में एक भारी बंदूक होगी और माथे पर पसीना .. आँखे चारो तरह दौड़ रही होंगी किसी असमाजिक तत्व की तलाश में और सीना खुला रहेगा किसी आतंकी , नक्सली , अपराधी से मुठभेड़ करने के लिए .. कुछ के कैमरे भी उसी की तरफ रहेंगे तमाम जिस से अगर वो पसीना पोंछता भी दिख जाए तो उसको ड्यूटी में लापरवाही बता कर कार्यवाही का पात्र बना दिया जाय ..

फिर भी उसके माथे पर शिकन नहीं दिखेगी . वो भीड़ को नियंत्रित करता दिखेगा, बद्जुबनो की आवाज सहता और सुनता मिलेगा .. नेतागीरी के शौकिनो की धमकिया भी उसको सुनाई देंगी.. लेकिन वो ख़ामोशी से सिर्फ और सिर्फ इस चिंता में कार्य करता दिखेगा कि उसके बूथ पर किसी भी प्रकार की कोई घटना न हो .. इसी के साथ ये भी जानना जरूरी है कि वो कई जिलों को पार करता हुआ कभी बस से, कभी ट्रेन से, कभी बाइक से अपने ड्यूटी स्थल पर आया रहेगा जिसको आराम करने के लिए भी 1 घंटे नहीं मिले होंगे ..

यद्दपि इसके बाद भी उसको ट्रेनों में फ्री सफर करने वाला , बोगी कब्जा करने वाला , किराया न देने वाला आदि न जाने कितने आरोप रास्ते में सहने पड़ते हैं .. जबकि अपनी ड्यूटी से 1 मिनट भी देर होने का मतलब उसको अपनी नौकरी से हाथ धोना होगा क्योकि चुनाव आयोग लगातार एहसास दिलाता है कि वो निष्पक्षता से कार्य कर रहा है.. लेकिन यहाँ पर अब सवाल ये उठता है कि क्या सच में वही निष्पक्षता पुलिस वालों के साथ भी लागू की जाती है ?

उसी चुनाव में मतदान केंद्र के अंदर रहने वाले और स्याही आदि लगवा कर EVM मशीन से वोट डलवाने वाले पीठासीन अधिकारी को लगभग 1 हजार रूपये खाने आदि के खर्च के तौर पर चुनाव में दिए जाते हैं लेकिन वही एक पुलिस वाले को यही खर्च मात्र 200 रूपये दिया जाता है .. मतलब 200 रूपये में उसको अपने लिए खाना पीना और रहना सोना आदि सब कुछ देखना होता है.. जबकि उसी पुलिस वाले पर वहां की शांति से ले कर हर प्रकार के लॉ एंड आर्डर की जिम्मेदारी होती है . 

पीठासीन अधिकारी को 1 हजार दिया जाना और पुलिस के स्टाफ को 200 रूपये दिया जाना क्या निष्पक्षता है ? इसका जवाब आप सब को खुद से खोजना होगा और खुद से ही सोच कर किसी निष्कर्ष पर पहुचना होगा .. अगर ठीक से देखा जाय तो लगभग 50 रूपये तो दिन भर पसीने से सनी वर्दी को अच्छे सर्फ और साबुन से धोने में ही खर्च हो जाया करते हैं . यद्दपि चुनाव आयोग से किसी पुलिस वाले को कितना पैसा आता है इसकी जानकारी आधिकारिक रूप से अभी हमें उपलब्ध नहीं है लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस के बल को 200 रूपये से ज्यादा नहीं मिलते इसको किसी से भी पूछा जा सकता है..

लोकतंत्र के इस महापर्व पर निश्चित रूप से जनता से आशा की जाती है कि वो एक मजबूत सरकार का चुनाव करे लेकिन उसी के साथ सरकार से आशा की जाती है कि वो समाज की रक्षा करने वाले हाथो को भी मजबूत करे.. वेतन वृद्धि में सबसे पीछे रहे पुलिस वालों को चुनावी भत्ते में भी इतना पीछे रखना क्या सही है जबकि अन्य को उसी स्थान पर 1 हजार रूपये के आस पास मिल रहे हों .. आशा है कि शासन और सम्बन्धित अधिकारी इस बार में विचार करेंगे और लोकतंत्र के इस महापर्व की रक्षा करने वालो के साथ न्याय होगा ..

साथ ही अगर चुनाव आयोग अतिरिक्त धन जारी करता है और पुलिसकर्मियों को नीचे कम दिया जाता है तो ये और भी गम्भीर विषय है लेकिन अगर उतना ही है जितना मिल रहा है तो यकीनन ये कहीं न कहीं वर्दी वालों के साथ न्याय नहीं कहा जा सकता ..  हैरानी इस बात की भी है कि पुलिस के जूते पोलिश नहीं हैं तक की खबर को ब्रेकिंग में दिखाने वाला और उनके कपड़े प्रेस नहीं हैं तक को कई दिन तक छापने वाला मीडिया का एक विशेष वर्ग इस विषय को क्यों नहीं प्रमुखता देता ? क्या सिर्फ और सिर्फ पुलिसकर्मियों के खिलाफ लिखना ही पत्रकारिता का असल मापदंड है  ? सवाल सिर्फ सरकार से नहीं बल्कि सब से है ..

 

 

रिपोर्ट –

राहुल 

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज , नॉएडा 

मो0 – 9598805228

 

 

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