क्यों दुष्प्रचार का शिकार बनाये जा रहे हैं नोएडा SSP वैभव कृष्ण ? जबकि आंकड़ों का ग्राफ व जनता का रुख कुछ और ही कहता है


यद्दपि किसी सक्रिय पुलिस अधिकारी को उसका पूरा कार्यकाल निष्कलंक पूरा करना वैसे ही होता है जैसे काजल की कोठरी से सफेद कपड़े पहन कर बेदाग़ निकल आना.. यहाँ बात हो रही है वर्तमान समय में नॉएडा में अद्वतीय कार्य कर रहे SSP वैभव कृष्ण की.. पुलिस विभाग में वायरस की तरह फैले भ्रष्टाचार या आपराधिक साठगाँठ जैसे मामले में उनका अब तक का कैरियर निष्कलंक रहा है.. उन्होंने हमेशा से प्रयास किया कि वो जहां भी रहें वहां सबसे ऊपर कानून का राज हो. उसके नीचे सभी हों, चाहे नेता, अभिनेता, ब्यूरोक्रेट या कोई भी अन्य..

इसी मामले में एक कड़ी और आती है और वो है पत्रकारों की.. पत्रकारों में स्थापित व संघर्षशील दो प्रकार होते हैं .. इसके बाद मान्यता प्राप्त व गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों की बात आती है.. स्थापित पत्रकार वो होते हैं जो अपने सत्कर्मो से एक ऐसे मुकाम पर चले गये हैं जो समाज को एक सही दिशा देने में सक्षम हो गये हैं .. संघर्षशील पत्रकार देखने हों तो कड़ी धूप में लू में, मूसलाधार बरसात में पानी में व कंपकपाती ठंड में कोहरे में माइक ले कर उस खबर पर दीखते हैं जो समाज के हित की हो..

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यकीनन उन्हें संघर्षशील माना जा सकता है और उनका सम्मान हर कोई करता भी है.. लेकिन उन को क्या माना जाय जो स्थापित भी न हो कर आय के अज्ञात स्रोतों से महंगे वाहनों से मात्र कुछ गिने चुने लोगों को निशाना बनाते हों.. फिलहाल बात नॉएडा की करते हैं . वैभव कृष्ण की कप्तानी का अंदाज़ इस से पहले गाजियाबाद में भी अलग रहा और उस से पहले इटावा , बाराबंकी व अन्य स्थानों पर भी. सरकार कोई भी हो लेकिन न्याय और नीति एक जैसी बरकरार रखी और सही को सही व गलत को गलत ही माना..

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भला कानून को तोड़ने को अपनी शौक समझने वालों को ये बात रास कैसे आ सकती थी.. शुरू में सोचा कि नया है, इसको मैनेज कर लेंगे .. लेकिन जब सभी प्रयास नाकाम रहे तो आखिरकार शुरू कर दिया पलटवार और ले लिया निशाने पर उस अधिकारी को जिसका व्यक्तिगत जीवन बेदाग रहा है . जी हां, ये बात चल रही है सीमान्त गौतम बुद्ध नगर के वर्तमान वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक वैभव कृष्ण की जिनके खिलाफ जाने अनजाने में पत्रकारों के एक वर्ग ने हल्ला बोल रखा है ..

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यद्दपि सही मायनों में तो हल्ला बोल अपराधियो पर समाज के हर वर्ग का होना चाहिए जबकि हल्ला बोल पुलिस पर करने की परंपरा न जाने किस ने चलाई ये विचार का विषय है साथ ही बदलाव का भी .. IPS वैभव कृष्ण को पिछले कुछ समय से मीडिया के एक वर्ग द्वारा सोची समझी रणनीति के तहत निशाना बनाया जा रहा था.. यद्दपि निशाने पर वो अकेले नहीं थे , उनके साथ SP बारांबकी आकाश तोमर के खिलाफ , लखनऊ के SSP कलानिधि नैथानी के खिलाफ व अन्य कई ऐसे इंस्पेक्टरों , सब इंस्पेक्टरों , DSP आदि के खिलाफ भी हल्ला बोल था जो अपनी अपनी सीमाओ में रह कर अपराध और आतंक से लड़ रहे थे .

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विरोध करने वालों की एक खास बात ये भी थी कि उनकी तमाम खबरों पर अगर नजर गड़ाई जाय तो उन्होंने शायद ही कभी पेशवर अपराधियों , वांटेड क्रिमिनलों , भगोड़े आतंकियों की फोटो आदि छाप कर आम जनता से अपील की हो उनके बारे में सूचना देने की.. 99 % खबरों में केवल फला पुलिस वाला आलसी , फला अधिकारी कामचोर , फला अधिकारी जातिवादी , फला अधिकारी घूसखोर.. वो भी अपने खुद के दिमाग से निकली सोच के आधार पर , बजाय कि किसी पक्के प्रमाणों से ..

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वो दर्द उनके हैं जिनके काले कारनामें बन्द हो गए, वो दर्द उनका है जिनका अवैध कारोबार ठप्प हो गया. वो पीड़ा उनकी है जो खुद को कानून से ऊपर नही समझ पा रहे हैं . आखिरकार उन्होंने offense is best defence का नियम अपनाया और अपने कुछ वफादारों को साथ ले कर हमलावर हो गए इन सभी अधिकारियो पर . एक तरफ समाजवादी पार्टी रामपुर पुलिस की न्यायोचित कार्यवाही के बहाने उत्तर प्रदेश की पुलिस को बदनाम करने की कोशिश में लगी थी .. ठीक उसी समय बाकी इन अन्य अधिकारियो के खिलाफ इन सब ने हल्ला बोल रखा था .

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यहाँ ये ध्यान देने योग्य है कि उत्तर प्रदेश पुलिस प्रदेश के गृहमंत्रालय के अधीनस्थ है और ये गृहमंत्रालय सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पास है.. इसलिए उत्तर प्रदेश पुलिस के इन काबिल अफसरों के ऊपर लगातार आरोप किसी राजनैतिक साजिश के चलते नहीं लगाए जा रहे थे, ऐसा कहना मुश्किल है.. इन पोर्टलों पर लगे इन्ही आरोपों को विपक्षी पार्टियाँ हथियार बना रही थीं और शासन को लगातार उस पर सफाई भी देनी पड़ रही थी जिसमे से कई आरोप अंत में निराधर साबित हुए थे ….

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अगर सिर्फ बढ़ते अपराध, कानून व्यवस्था के आंकड़ो पर ही नॉएडा के SSP को घेरा जा रहा होता तो यकीनन ये बात कहीं न कहीं सैद्धांतिक व तार्किक लग रही होती, लेकिन जब विरोध के स्वरों में “योगी के खास” या “शासन के कृपापात्र” “जातिवादी” जैसे शब्द जोड़े जाने लगे तो खुद से ही समझने के लिए काफी है कि वो सभी शब्द राजनीति से प्रेरित हैं जो ब्यूरोक्रेसी के दबाव को बर्दाश्त नही कर पा रहे हैं ..असल मे संभावना ये है कि वैभव कृष्ण की निष्कलंक छवि को शासन के उच्चाधिकारी पसन्द करते होंगे और शासन के मनमाफिक कार्य करके उनकी पसन्द बनना किस अधिकारी की इच्छा नहीं होती या इसमें बुरा क्या है ?

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एक शासन भी यही चाहता है कि उसके शासित क्षेत्र में कानून व्यवस्था कायम रहे और अमन चैन का माहौल बना रहे , इसको लागू कर के रखने वाला अधिकारी शासन का ही नही बल्कि जनता का भी स्वतः ही प्रिय हो जाएगा , तो इसमें बुरा क्या है और इस अच्छी उपलब्धि को बुरे शब्दो मे बयान करने की मंशा क्या हो सकती है इसका अनुमान शासन को लगाना है.. रही बात जातिवादी होने के आरोपों की तो ये वो जहर है जिसका सामना सिर्फ प्रदेश ही नहीं बल्कि केंद्र सरकार भी पूरे प्रयासों के साथ का रही है क्योकि ये जातिवादी जहर भीम आर्मी प्रमुख चन्द्रशेखर रावण व JNU के कन्हैया व उमर खालिद जैसे लोगों द्वारा बोया गया था जिसे कुछ पोर्टलों द्वारा सींचा जा रहा था.. 

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अब बात कर ली जाय आंकड़ों की जो अपराध से संबंधित हैं .. नॉएडा में एसएसपी वैभव कृष्ण के नेतृत्व में छिटपुट घटनाओं को छोड़ कर कोई भी ऐसी बड़ी वारदात नहीं रही जो राष्ट्रीय या प्रादेशिक स्तर पर प्रदेश सरकार की बदनामी का कारण बने..  छिटपुट घटनाओं का भी समुचित खुलासा व सही समय पर दोषियों की गिरफ्तारी के साथ साथ उचित कार्यवाही की गई ..इन सभी घटनाओं में पीड़ित पक्ष पुलिसिया कार्यवाही से संतुष्ट हुआ लेकिन न जाने के अन्धविरोधियो में असंतुष्टि छाई रही और वो अपना विरोध जारी रखे रहे ..

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इसके अलावा अगर देखा जा तो नॉएडा के व्यापारी व आम जनता राहत की सांस लेती रही और कोई बड़ा अपराध नही होने दिया गया .. हाँ, कई बड़े अपराधी इस बीच दबोचे गये जिसका जिक्र उन खबरों में नही किया गया , शायद जानबूझकर … कभी साम्प्रदायिक तनाव को ले कर दादरी चर्चा में रहा था . ग्रामीण इलाको में साम्प्रदायिक तनाव दुबारा कभी नहीं पनप पाया जो यकीनन एक बड़ी उपलब्धि है वैभव कृष्ण के कार्यकाल की ..  आशा है कि इन आंकड़ों को शासन भी देख रहा होगा ..

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नॉएडा के उद्द्योगपति और व्यापारी आज निश्चिंत हो कर आज अपना कारोबार कर रहा व सिर्फ सरकारी टैक्स के अलावा कोई गुण्डाटैक्स आदि की प्रथा समाप्त हो चुकी है ..इसके लिए शासन व प्रशासन प्रशंशा योग्य है …प्रदेश के कई जिलों में पुलिसकर्मियों पर हमले हुए व पुलिस की साख गिरी लेकिन नॉएडा में ऐसा चुस्त प्रशासन नही होने दिया ..अक्सर कई पुलिस अधिकारियों को एक बड़े तथाकथित नेता के दबाव में टूटते व झुकते देखा गया है लेकिन नॉएडा SSP वैभव कृष्ण द्वारा इन सभी मामलो में बनाया गया सामंजस्य व उनकी कुशल कार्यशैली प्रशंसा की पात्र है .

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आशा है उन्हें मीडिया के एक खास वर्ग के ट्रायल का शिकार शासन द्वारा नही बनाने दिया जाएगा व उनके कार्यों व अपराध के आंकड़ो को देख कर शासन व जनता किसी निष्कर्ष तक पहुचेगी … इन तमाम चर्चाओं का पीछे मकसद चाहे जो भी हो लेकिन आतंक व अपराध से एक साथ जूझती पुलिस के मनोबल पर इस प्रकार से शाब्दिक व राजनैतिक प्रहार किसी भी देश या प्रदेश की सुरक्षा व शांति के लिहाज़ से उचित नही कहे जा सकते हैं ..

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