क्या सच में पवित्र अमरनाथ गुफ़ा की खोज किसी मुसलमान गड़रिये ने की थी, या इसके पीछे भी रची गयी थी कोई साज़िश ?

कई बार आपने तमाम प्रकार के किस्से कहानियां सुनी होगी जिसमें हिंदुओं के वजूद स्थलों को भी इस्लामिक लोगों की मेहरबानी से जोड़ दिया जाता रहा है .. उदाहरण के लिए अयोध्या, मथुरा , काशी में बनी मस्जिदें और उन सबसे आगे निकल गयी ये कहानी कि अमरनाथ गुफा की खोज ही एक मुस्लिम चरवाहे ने की थी .. अर्थात उस मुस्लिम चरवाहे ने खोजा और जा कर हिंदुओं को बताया कि वहां तुम्हारे मन्दिर जैसा कुछ है .. चलो और पूजा करो, जिसके बाद हिंदुओं ने उस स्थल को अपना देवस्थान मान लिया और पूजा करने लगे …

कैसी लगी कहानी ? उन इतिहासकारों की जिन्होंने अकबर को महान बताया लेकिन महाराणा प्रताप का नाम भी नही लिया, जिन्होंने औरंगज़ेब के लिए तराने लिखे लेकिन क्षत्रपति शिवाजी महाराज को भूल गए .. जिनके अनुसार आज़ादी में बम, गोली , फांसी का कोई योगदान नही था, वो तो मात्र चरखे के चलते रहने से आई ..उन्ही की बताई ये कहानी है जिसे पूरे भारत मे डंका बजा बजा कर प्रचारित किया गया और शिव की खोज के पीछे भी एक मुस्लिम चरवाहे को श्रेय दे दिया गया ..

भले ही झूठ की दीवार कितनी ही बड़ी क्यों न हो पर सच सामने आ ही जाता है .. जैसे आज अनगिनत लोग जानते हैं कि कौन थे गांधी और कौन थे गोडसे, किस ने देश को आज़ादी दिलाई और किस ने अंग्रेजो सके दलाली खाई..फिलहाल आप जानिए अमरनाथ का पूरा इतिहास ताकि अपनी आने वाली पीढ़ी को बता सकें और दूर कर सकें वो कलंक जो चला आ रहा है बहुत पहले से ही हिंदुत्व के ऊपर एक एहसान बन कर ..जबकि हिंदुत्व का इतिहास एहसान करने का रहा है न कि किसी का एहसान लेने का , भले ही उसको शम्भाजी महराज की तरह एक एक अंग कटवा लेने पड़े हों, या महाराणा प्रताप की तरह घास की रोटी खानी पड़ी हो ..
विदित हो कि हिंदुओं की पवित्रतम बाबा बर्फानी के दर्शन के अमरनाथ यात्रा चल रही है। अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही फिर से नकली सेक्युलरिज्म के झंडबदारों ने एक रटे रटाये गलत इतिहास की व्याख्या शुरू कर दी है कि इस गुफा को 1850 में एक मुसलिम बूटा मलिक ने खोजा था! पिछले साल तो पत्रकारिता का एक बड़ा अवार्ड घोषित करने वाले एक प्रमुख अखबार ने एक लेख लिखकर इस झूठ को जोर-शोर से प्रचारित किया था। जबकि इतिहास में दर्ज है कि जब हर तरफ सत्य सनातन था तब से से बाबा अमरनाथ की गुफा में सनातन संस्कृति के अनुयायी बाबा बर्फानी की विधिवत भक्तिभाव से पूजा-अर्चना कर रहे हैं।
कश्मीर के इतिहास पर कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ और नीलमत पुराण से सबसे अधिक प्रकाश पड़ता है। श्रीनगर से 141 किलोमीटर दूर 3888 मीटर की उंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा को तो भारतीय पुरातत्व विभाग ही 5 हजार वर्ष प्राचीन मानता है। यानी महाभारत काल से इस गुफा की मौजूदगी खुद भारतीय एजेंसियों मानती हैं। लेकिन यह भारत का सेक्यूलरिज्म है, जो तथ्यों और इतिहास से नहीं, बल्कि नकली कलमकारों और बिके बुद्धिजीवियों के स्वघोषित ‘परसेप्शन’ से चलता है! वही ‘परसेप्शन’ इस बार भी बनाने का प्रयास आरंभ हो चुका है।
अमरनाथ की गुफा प्राकृतिक है न कि मानव नर्मित। इसलिए पांच हजार वर्ष की पुरातत्व विभाग की यह गणना भी कम ही पड़ती है, क्योंकि हिमालय के पहाड़ लाखों वर्ष पुराने माने जाते हैं। यानी यह प्राकृतिक गुफा लाखों वर्ष से है। कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ में इसका उल्लेख है कि कश्मीर के राजा सामदीमत शैव थे और वह पहलगाम के वनों में स्थित बर्फ के शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने जाते थे। ज्ञात हो कि बर्फ का शिवलिंग अमरनाथ को छोड़कर और कहीं नहीं है। यानी वामपंथी, जिस 1850 में अमरनाथ गुफा को खोजे जाने का कुतर्क गढ़ते हैं, इससे कई शताब्दी पूर्व कश्मीर के राजा खुद बाबा बर्फानी की पूजा कर रहे थे।
नीलमत पुराण, बृंगेश संहिता में भी अमरनाथ तीर्थ का बारंबार उल्लेख मिलता है। बृंगेश संहिता में लिखा है कि अमरनाथ की गुफा की ओर जाते समय अनंतनया (अनंतनाग), माच भवन (मट्टन), गणेशबल (गणेशपुर), मामलेश्वर (मामल), चंदनवाड़ी, सुशरामनगर (शेषनाग), पंचतरंगिरी (पंचतरणी) और अमरावती में यात्री धार्मिक अनुष्ठान करते थे ..वहीं छठी में लिखे गये नीलमत पुराण में अमरनाथ यात्रा का स्पष्ट उल्लेख है। नीलमत पुराण में कश्मीर के इतिहास, भूगोल, लोककथाओं, धार्मिक अनुष्ठानों की विस्तृत रूप में जानकारी उपलब्ध है। नीलमत पुराण में अमरेश्वरा के बारे में दिए गये वर्णन से पता चलता है कि छठी शताब्दी में लोग अमरनाथ यात्रा किया करते थे।
असल मे यहां जबरन साबित करने की कोशिश हो रही है कि हिंदुओं से पहले कश्मीर में मुसलमान रहते थे और बाद में हिन्दुओ को वहां बसाया गया ..यहाँ तक कि अमरनाथ जैसी जगहों पर मुस्लिम लोग अपने जानवरो को चराने आदि ले जाते थे , और कश्मीर उनके द्वारा ही पहले से बसाया गया है ..अमित  कुमार सिंह द्वारा लिखित ‘अमरनाथ यात्रा’ नामक पुस्तक के अनुसार, पुराण में अमरगंगा का भी उल्लेख है, जो सिंधु नदी की एक सहायक नदी थी। अमरनाथ गुफा जाने के लिए इस नदी के पास से गुजरना पड़ता था। ऐसी मान्यता था कि बाबा बर्फानी के दर्शन से पहले इस नदी की मिट्टी शरीर पर लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं। शिव भक्त इस मिट्टी को अपने शरीर पर लगाते थे।
पुराण में वर्णित है कि अमरनाथ गुफा की उंचाई 250 फीट और चौड़ाई 50 फीट थी। इसी गुफा में बर्फ से बना एक विशाल शिवलिंग था, जिसे बाहर से ही देखा जा सकता था। बर्नियर ट्रेवल्स में भी बर्नियर ने इस शिवलिंग का वर्णन किया है। विंसेट-ए-स्मिथ ने बर्नियर की पुस्तक के दूसरे संस्करण का संपादन करते हुए लिखा है कि अमरनाथ की गुफा आश्चर्यजनक है, जहां छत से पानी बूंद-बूंद टपकता रहता है और जमकर बर्फ के खंड का रूप ले लेता है। हिंदू इसी को शिव प्रतिमा के रूप में पूजते हैं। ‘राजतरंगिरी’ तृतीय खंड की पृष्ठ संख्या-409 पर डॉ. स्टेन ने लिखा है कि अमरनाथ गुफा में 7 से 8 फीट की चौड़ा और दो फीट लंबा शिवलिंग है। कल्हण की राजतरंगिणी द्वितीय, में कश्मीर के शासक सामदीमत 34 ई.पू से 17 वीं ईस्वी और उनके बाबा बर्फानी के भक्त होने का उल्लेख है।
यही नहीं, जिस बूटा मलिक को 1850 में अमरनाथ गुफा का खोजकर्ता साबित किया जाता है, उससे करीब 400 साल पूर्व कश्मीर में बादशाह जैनुलबुद्दीन का शासन 1420-70 था। उसने भी अमरनाथ की यात्रा की थी। इतिहासकार जोनराज ने इसका उल्लेख किया है। 16 वीं शताब्दी में मुगल बादशाह अकबर के समय के इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी पुस्तक ‘आईने-अकबरी’ में में अमरनाथ का जिक्र एक पवित्र हिंदू तीर्थस्थल के रूप में किया है। ‘आईने-अकबरी’ में लिखा है- गुफा में बर्फ का एक बुलबुला बनता है। यह थोड़ा-थोड़ा करके 15 दिन तक रोजाना बढ़ता है और यह दो गज से अधिक उंचा हो जाता है। चंद्रमा के घटने के साथ-साथ वह भी घटना शुरू हो जाता है और जब चांद लुप्त हो जाता है तो शिवलिंग भी विलुप्त हो जाता है।
वास्तव में कश्मीर घाटी पर विदेशी इस्लामिक आतंकवाद के हमले के बाद हिंदुओं को कश्मीर छोड़कर भागना पड़ा। इसके बारण 14 वीं शताब्दी के मध्य से करीब 300 साल तक यह यात्रा बाधित रही। यह यात्रा फिर से 1872 में आरंभ हुई। इसी अवसर का लाभ उठाकर कुछ इतिहासकारों ने बूटा मलिक को 1850 में अमरनाथ गुफा का खोजक साबित कर दिया और इसे लगभग मान्यता के रूप में स्थापित कर दिया। जनश्रुति भी लिख दी गई जिसमें बूटा मलिक को लेकर एक कहानी बुन दी गई कि उसे एक साधु मिला। साधु ने बूट को कोयले से भरा एक थैला दिया। घर पहुंच कर बूटा ने जब थैला खोला तो उसमें उसने चमकता हुआ हीरा माया। वह वह हीरा लौटाने या फिर खुश होकर धन्यवाद देने जब उस साधु के पास पहुंचा तो वहां साधु नहीं था, बल्कि सामने अमरनाथ का गुफा था।आज भी अमरनाथ में जो चढ़ावा चढ़ाया जाता है उसका एक भाग बूटा मलिक के परिवार को दिया जाता है। एक रॉयल्टी के समान और उपकार के समान की उसकी ही देन है हिंदुओं की ये पवित्र यात्रा ..
पत्थर कोयला हीरा बन गया जैसी कहानी को शत प्रतिशत सही मानने वाले नीलमत पुराण और ऐसे पावन ग्रंथो व सच्चे इतिहास को विस्मृत करते रहते हैं ..बेहतर होगा कि हम उन सभी तथ्यों की पड़ताल अब स्वयं करें जिसमे हिन्दू समाज को बार बार नीचा दिखाने के सभी प्रयास किये गए हैं.. उसमे से एक है ये पावन अमरनाथ यात्रा ..

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