सभ्य समाज का सबसे बड़ा कुसंस्कार है “गाली”. समय आ गया है इसके विरोध में खड़े होने का- “ओमा दी अक” काशी का चिंतनीय लेख

गाली..एक कुसंस्कार…
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” भारत एक संस्कार है… एक ऐसा संस्कार जिसके समक्ष महान यूनान, ताकतवर मिश्र, सांस्कृतिक फारस, चालाक अरब, भौतिकवादी यूरोप, और शक्तिशाली चीन की चरम-सभ्यताओं ने सर झुकाया… और भारत का प्रस्सतिगान किया।
पाइथागोरस,मूसा,ईसा,मुहम्मद, अरस्तू, सिकन्दर, रूमी, अल बरुनी, इब्नबतूता,  बर्नियर, फाह्यान, ह्वेनसांग, बहाउल्लाह, नीत्से, शॉपनआवर, मैक्समूलर, एनी बेसेंट, वेल्स, जिब्रान,बुल्के, आइंस्टीन और मंडेला जैसे युग-पुरुषों द्वारा इसके संस्कार को अपनाने और सराहने का कार्य समय समय पर हुआ..और आज भी हो रहा है।
यद्द्पि भारत ने न कोई बड़ी तकनीकी क्रांति की न आर्थिक न राजनैतिक न सामाजिक और न ही मनोरंजन की क्रांति में ही भारत का बड़ा योगदान है वैश्विक पटल पर.. परन्तु जब भी कभी ‘मनुष्यता को मनुष्यता की’ समझ बढ़ानी पड़ी है तब उसने भारत की ओर देखा और अनुशरण करने लगी…और तब यह महान भारत कभी वेद के रूप में, कभी उपनिषद, कभी पुराण, कभी शास्त्र, कभी वेदांत, कभी रामायण, कभी गीता, कभी हिन्द-स्वराज और कभी गीतांजलि के रूप में संसार को चकित करते हुए अपना प्रशंशक बनाता रहा..इन प्रमाणों से सिद्ध है कि भारत के संस्कार वास्तव में भाषा के संस्कार हैं… इसी कारण हमने भाषा को ‘असुर-विनाशिनी सरस्वती वाग्देवी’ के रूप में वैदिक काल से पूजा और स्वयम में स्थापित कर के ब्राह्मणत्व की उद्घोषणा की।
भारत की गंवई बोली में प्रायः यह दोहराया जाता है कि “जिह्वा पर सरस्वती का वास होता है!”… अतःएव भारतीय द्विज परम्परा में भाषा की शुद्धता पर कठोर नियम होते थे… और समाज मे भी प्रायः भाषा की मर्यादा और परिष्कार से ही व्यक्ति को “नागरिक” माना जाता था… इसके प्रमाण में कालीदास समेत कई संस्कृत- कवियों की रचनाओं को पढ़ा जा सकता है जहाँ “असभ्यता की झलक भाषा के संस्कृत से प्राकृत होने पर” पायी जाती है। कुल मिला कर कहने का तातपर्य यह है कि परिष्कृत-भाषा के भीतर ही भारत के संस्कार-बीज पनपते हैं… और वहीं से भारत का वटवृक्ष पोषण पता है… अतः यदि हम भारत की रक्षा की बात करते हैं तो सबसे पहले हमें भाषा की रक्षा करनी होगी।
यूँ तो भाषा के विरुद्ध कई “रक्तबीज” असुर खड़े हो चुके हैं… जिनको चिन्हित कर नष्ट करने की आवश्यकता है किंतु सबसे बड़ा राक्षस है “ग़ाली”! … दुर्भाग्य से भारत मे यहूदी-ईसाई- इस्लामिक (यहूदत्रयी) विचारधारा प्रवेश के साथ ही “स्त्री के सम्बंध में भारतीय सोच अधिक कठोर और पाखण्डी हुई”… यद्द्पि “स्त्रियों को ले कर कोई २००० वर्षों से भारत संकीर्ण होता जा रहा था लेकिन यहूदत्रयी-संस्कृति के विस्तार के साथ तो पूरे विश्व समेत भारत मे भी स्त्री-दुर्दशा का एक नया कलियुग प्रारम्भ हो गया।
प्राचीन काल के भारत में कुछ एक शब्दों (कुल्टा/पतिता) को छोड़ कर स्त्री-सम्बंधित अपशब्द प्रायः नही के बराबर मिलते हैं… लोग  अनार्य,अभद्र,उदण्ड, लम्पट,वितन्डवादी,क्लीव, कापुरुष, व्यभिचारी,धूर्त,कुत्सित,नीच,अमित्र, राक्षस इत्यादि “दुर्गुण-सूचक” शब्दों से अपशब्द के प्रहार करते थे… कभी कभी कुछ निम्म-स्तरीय जीवन जीने वालों में “यौन-सम्बंधित-अपशब्दों” का भी चलन रहा होगा किन्तु प्रामाणिक तौर पर ऐसे “अपशब्द या गलियों” का भारत मे प्रयोग ना के बराबर था जो “लैंगिक” थे।
पिछली कुछ शताब्दियों में हिंदवी और उर्दू के उत्थान के साथ एक ओर जहां भारत के बड़े क्षेत्र में भाषा का नया स्वरूप सामने आया जो अधिक सुंदर और मृदु था.. जिसमे “शिष्टाचार” प्रदर्शन के अधिक अवसर मिलते थे… वहीं इसके दुष्प्रयोग से कई तरह की “गालियों” का निर्माण भी होने लगा जिनमे अधिकांशतः “नारी-अपमान” “यौनांग-आधारित” होने लगीं… और पतनोन्मुख भारतीय-समाज मे इसने  बड़ी तेज़ी से किसी महामारी के समान अपना विस्तार कर लिया… और आज तो यह इतनी सामान्य हो चली है कि इसके विरोध में बोलना चाँद पे पत्थर फेंकने जैसा असम्भव कार्य हो गया..!
आज के ‘हिंग्लिश-युग’ में जब ‘संस्कृति-संक्रमण’ से विश्व एक अलग तरह के विकार को झेल रहा है जिसे “अमानवीयता” कहते हैं… ऐसे में “उर्दू-इंग्लिश-हिंदी-हिंग्लिश” अथवा अन्य भाषाओं में “नारी-अपमानसूचक-अपशब्दों” की एक बाढ़ सी आ रही है… और शर्मनाक ढंग से इसे “महिमामण्डित” भी किया जा रहा है… बड़ी चतुराई से ये “स्त्री-विरोधी-गालियां” मनोरंजक-माध्यमों (फ़िल्म/लाफ्टर शो/वेब सीरीज/साहित्य/नाटक इत्यादि) द्वारा तमाम पुरुषों समेत स्त्रियों के मुख में भी बोई जा रही हैं और अब इसे बहुत सामान्य रूप से तथाकथित-सभ्य (एलीट) समाज मे भी स्त्रियों द्वारा सुना जा सकता है (निम्न वर्ग में तो ये सदियों से शामिल था)… और मज़ेदार बात है कि यहाँ सिनेमा में “सिगरट-शराब-पशुहत्या” पर तो सेंसरशिप है लेकिन गालियों पर कत्तई नहीं (और लगाए कौन सब लिप्त हैं)…।
आप अपने घर से शुरू कीजिए… और शायद “आप” से ही ग़ाली
रोज़मर्रा की बात हो… भगवान् से अधिक बार “स्त्री-विरोधी” गालियां और अपशब्द आपकी रोज़ की बात-चीत में शामिल होते हैं… विश्वास न हो तो एक दिन की अपनी सब बात रिकॉर्ड कर के देख लीजिए ( याद रखिये “साला” शब्द भी वास्तव में “बहन की ग़ाली” का रूपांतरण मात्र है)… और आप इसे सगर्व-सबल-सुसंस्कृत भाव से देते हैं।
पिछली एक सदी में जबसे वामपंथी-लेखन का भारत मे एक बड़ा बाज़ार तैयार हुआ तबसे “ग़ालीयों” को साहित्य में प्रवेश का “बैकडोर” प्राप्त हो गया “फणीश्वरनाथ रेणु” ने “मैला आँचल” तथा अन्यकृतियों में गाली को स्थान दिया तो “मण्टों” जैसे लेखकों ने “यौन कुंठा” को अपनी “उर्दू-चासनी” दे कर साहित्य की मुख्यधारा में “अपशब्द” को शामिल करने का प्रयास करते रहे तो “खुशवंत सिंह” ने “अंग्रेजी माध्यम” से “अश्लीलता और अपशब्द” को “एलीट” (सभ्रांत) करने में “पश्चिम की मदद” की… ततपश्चात यह एक “ट्रेन्ड” (परम्परा) सा बनने लगा कि यथार्थवादी-लेखन ग़ाली और नग्नता के बिना “नाटकीय” लगेगा… और इस तरह अनेक लेखकों, चित्रकारों, गीतकारों, शायरों, पत्रकारों और राजनेताओं तक के भाषणों मे “अपशब्द” प्रविष्ट होने लगे जो कहीं कहीं पूरी ग़ाली ही होते थे… मैं इस परंपरा में “राही मासूम रज़ा” के “आधा गाँव” को खुली गालियों की पहली किताब मानता हूँ फिर  “अब्दुल बिस्मिल्लाह” और “डॉ•काशीनाथ” का नाम अवश्य लेना चाहुंगा जिन्होंने काशी की पृष्ठभूमि में “गाली” को सावन की झड़ी की तरह अपने साहित्य में प्रयोग किया और बहुत “वाह वाही” पाई… दोनों इसे यथार्थ मानते थे और कदाचित ऐसा ही है भी… किन्तु क्या यह यथार्थ “तुलसीदास” या “प्रेमचंद” पर नही खुला था..? या उन्हें यह बोध था कि एक सफल साहित्य केवल अतीत या वर्तमान की व्याख्या भर नही करता ब्लकि भविष्य जी रचना में भी बड़ी भूमिका निभाता है…इस लिए साहित्यकार को हर भविष्य में उपस्थित होना और उत्तरदायी होना पड़ता है..!
आज लगभग हर तीसरी-चौथी फ़िल्म में ग़ाली-गलौज या स्त्रियों के प्रति फूहड़-शब्दावली का प्रयोग बढ़ता जा रहा है… कभी शेखर कपूर (जो बाद में हॉलीवुड फेम हो गए) ने “बैंडिट क्वीन” जैसी फ़िल्म बना कर 90 के दशक में हिंदी सिनेमा को “माँ-बहन” को स्पष्ट गलियों की सौगात दी और लोगों से ग़ाली और ताली दोनों पाई… लेकिन जल्द ही समय बदलने लगा पहले समानांतर फ़िल्मो में ग़ाली आई… फिर “सत्या” जैसी “मुख्यधारा की फ़िल्म” में भी स्त्री-यौन-सूचक अपशब्द आए और सराहे गए… फिर इस दिशा में सबसे बड़ा योगदान “अनुराग कश्यप” का माना जाएगा… जिन्होंने यथार्थ के नाम पर भरपूर हिंसा,यौनिकता और अपशब्द परोस कर हिन्दी सिनेमा का चेहरा इतना बदल दिया कि अब यही “ट्रेंड” है… और “सेंसर बोर्ड” केवल “धूम्रपान और जानवर” देखने मे व्यस्त रहता है (कभी कभी धर्म और देशभक्ति भी)… “गैंग्स ऑफ़ वासेपुर” से शुरू हुआ ये सफर आज “मिर्जापुर” और “गन्दी बात” जैसी घोर हिंसक और “माँ-बहन-बेटी की ग़ालीयों” से भरी अश्लीलता का पर्याय बन गईं हैं… पूर्वांचल के “कुत्सित-चेहरों” को “पूर्वांचल का चरित्र” बना कर पश्चिम में बेचने वाले लोग भी दुर्भाग्य से उसी उत्तरप्रदेश के पूर्वी भाग से ही हैं…और वहाँ की भोजपुरिया मिठास के विरुद्ध भी हैं।
भोजपुरी का नाम आते ही “अश्लीलता और अपशब्द” आज सबसे पहले मन पर उतरता है… कभी भिखारी ठाकुर के गहरे-संवेदनशील गीतों, शैलेंद्र, अनजान जैसे गीतकारों की जादूगरी भोजपुरी फिल्मों के सङ्गीत को मुख्यधारा के हिंदी-सिनेमाई-सङ्गीत के समकक्ष खड़ा रखते थे… तो वहीं भरत शर्मा और शारदा सिन्हा के गले और शब्दों के रस पीढ़ियों को दुलराते थे… वही भोजपुरी आज “हमके हउ चाहीं” या “निरहुआ सटल रहे” से होता हुआ स्त्री-अपमान की सारी सीमाएं लांघ चुका है… और अपशब्दों में “पंजाबी-रैप” और “हरियाणवी-पॉप” से टक्कर ले रहा है… हनी सिंह, बादशाह जैसे नाम आज करोणों का व्यापार करने वाले वो “ब्रांड्स” हैं जिन्हें सफलता ही “नारी अपमान” की कीमत पर मिली है (और आज भी हिंग्लिश संस्कृति से मिल रही)… कुल मिला कर आज हिंदी-गीत-सङ्गीत (और अन्य भारतीय भाषाओं में भी) की मुख्यधारा मे “नारी-अपमान-सूचक-शब्दों की भरमार मिलती है… और तो और हास्य के नाम पर “स्टैंडप कॉमेडी” में गन्दी गालियों और माँ-बहन करते नवयुवकों की भीड़ जिस पर विडम्बना यह है कि इसे नवयुवतियों द्वारा भी सराहा जाता है।
आज सामाजिक परिस्थितियों में कई बदलाव आए हैं… सब तरफ एक कोलाहल का वातावरण है… संदेह और घात दोनों प्रतिदिन के मुख्य समाचार हैं… हत्या,ब्लातकार,शोषण,दुर्घटना यहीं से आज हम सब की सुबह होती है और हम इसे ले कर उतने ही सहज हो गए हैं जितने एक सदी पहले तक “हैजे की महामारी” या अकाल को ले कर थे… हमे तब लगता था यह तो नियति है… और ऐसा ही होता रहेगा… या उसके एक सदी पहले तक हम राजाओं और उनके अत्याचार को ले कर इतनी ही स्वीकृति रखते थे… परन्तु वर्तमान में खड़े हो कर हम देख सकते हैं कि कुछ जागे हुए लोगों की अस्वीकृती ने कैसे विश्व को बदल कर रख दिया… कल की महामारी आज एक बीमारी भर हैं(वो भी छोटी सी) अकाल अब भी एक समस्या है किंतु वैसी नही जैसी भारत के स्वतंत्रत होने तक थी… राजा और उनके हुक्मनाने आज रद्दियों में बिकते हैं… हम एक के दियो की जगह एल ई डी प्रयोग कर रहे हैं… भारत मे बैठे अमेरिका का हाल ले रहे हैं… चाँद और मंगल पर घर बसाने के स्वप्न देख रहे हैं… किन्तु धरती पर रोज़ हज़ारों स्त्रियों को नर्क भोगना पड़ रहा है… हर दूसरी-तीसरी सुबह किसी लालच का शिकार हुई नन्हीं टिंकल के टुकड़े मिलते हैं… किसी मासूम आरिफ़ा की नफ़रत में नोचि हुई लाश मिलती है… किसी दामिनी का दामन हवस के कफ़न में बदलता दिखता है तो किसी निर्भया की दारुण-चीत्कार माँ की सुरक्षित कोख में सोई बच्चियों तक को भयभीत कर देती है।
क्या हम इसे केवल कुछ अपराधियो का कुकृत्य कह कर और उनकी लाशों पर जश्न मना कर आने वाली बेटियों को सुरक्षित कर लेंगे … क्या उन बलात्कारों में हमारी भूमिका क्षम्य होगी… क्या हम सब अपने और अपने समाज के भीतर बलात्कार करने की भूमिका नही रच रहे…? मेरे समझ से हाँ! हम सब इन्ही अपशब्दों के व्यवहार और व्यापार से निर्भया के किशोर-हत्यारे को उकसाते हैं कि वो उसके यौनांगों को केवल भोगे नही ब्लकि नष्ट भी कर दे… हम दामिनी के बलात्कारीयो को सिखाते हैं कि “मैं भी बलात्कारी” कहना तो मर्दानगी है… अकेले में अंधेरे में मिली लड़की तो “आइटम” है… उपभोग की वस्तु… हिंग्लिस में “चीक्स” या “पिकअप”… हिंदी-उर्दू में जो शब्द हैं उन्हें मैं लिख भी नही सकता… हम आरिफ़ा को नोचते दरिंदो को बताते हैं कि “दुश्मन की बेटी” बस एक ही “काम” के लिए जन्मी है… और ऐसा करके हम “अदावत” के इतिहास को ठंडक देते हैं… जब ट्विंकल का गला कुछ वहशी मिल कर घोंट रहे थे तब उसमे कई हाथ इस समाज के “प्रोग्रेसिव-ठेकेदारों” के भी शामिल थे… जिन्होंने आत्मा के सिद्धांत को झुठला कर यह सिद्ध कर दिया की हम केवल “देह” हैं… और देह तो ख़त्म होने के लिए ही है… और फिर स्त्री-देह की क्या क़ीमत यह तो वैसे भी पुरुषों की अपेक्षा आधी ही जीवित है… इसका अस्तित्व पुरूष के भोग के लिए बना है।
बरसों से यह बात मैं लोगों को कहता आ रहा हूँ कि माँ-बहन-बेटी की गाली देना और बलात्कार करने में केवल “तीव्रता” का अंतर है… केवल “अवस्था” मे भिन्नता है… किन्तु स्वरूप एक ही है… दोनों में ही हम “स्त्री को गिरा कर कुचल रहे होते हैं”… भले ही हम इसे कितना भी यांत्रिक करें हमारे चित्त में “स्त्री-हिंसा” का स्थान बनता चला जाता है… और उपयुक्त-अवसर मिलने पर किस दैत्य सा हमारे नैतिक-आवरण को फाड़ कर बाहर आ जाता है और किसी मासूम दामिनी को जीते जी मौत के सबसे भयंकर रूप दिखा कर फिर हममें ही समा जाता है… और फिर निकलती है भीड़ जो “उस दैत्य” की आड़ में उसकी माँ-बहन-बेटी को सरेआम घसीट कर शब्द-शब्द नंगा करते हुए अपने “नैतिक-पुरुषत्व” की घटिया शेखी बघारती रहती है..!
शर्मनाक है कि भारत मे “पोर्न साइटस्” पर सबसे अधिक देखे जाने वाले “वीडियोज़” बलात्कार,ज़बरदस्ती, हिंसक,और अपशब्द वाले होते हैं… प्रेमिका को “बिच” या “होर” कहना अमेरिकी-संस्कृति से कब भारतीय शयनकक्ष में घुस गया इसकी पड़ताल भी “नैतिक-सिपाहियों” को करनी चाहिए जो प्रायः गुलाब और प्रेमपत्रों पर छापा मार कर गर्वित होते रहते हैं… याद रखिये “संस्कृति जो जन्मने में सदियां किन्तु भ्रष्ट होने में दशक भर लगते हैं”…और हम आज बुरी तरह भ्रष्ट हो चुके हैं… “कामसूत्र” रचने वाले देश मे “सेक्स” कभी “टैबू” नही था… न इतना मंहगा ही था… किन्तु इस देश मे “सेक्स” जंगली भी नही था वो बहुत “सॉफिस्टिकेटेड-परफॉर्मेंस” थी… बहुत “एस्थेटिक” था इसमें… तभी तो खजुराहो और कोणार्क का वैभव पूरे पश्चिम का आश्चर्य बना… लेकिन आज वही “उन्मुक्तता” असामाजिक हो गई है… और पश्चिमी यौन-आक्रांतता सहज-स्वीकार्य..! परिणामतः प्रतिदिन बढ़ते स्त्री-अपराध और दुर्घटनाएं… बलात्कार करके पीड़िता की हत्या (वो भी भय के कारण न हो कर मज़े के लिए)… याद कीजिये निर्भया ने कहा था कि उसे गाली दे दे कर लुटा गया था… विश्वास किजिये सौ में से नब्बे बार यही होता है… बलात्कारी केवल दैहिक हिंसा नही कर रहा होता अपितु स्वयम को उत्साहित करने के लिए (क्यों कि दुष्कर्म में हमारी चेतना सहयोग नही करती) गन्दी से गन्दी गालियों का (जो उसने इस समाज और परिवार से सीखी) उसका सहारा लेते हुए बलात्कार करता है… जो पीड़िता को दैहिक रूप से ही नही भावनात्मक रूप से इतना छिन्न-भिन्न कर देता है कि उसे स्वयम के अस्तित्व से घृणा हो जाती है…।
तनिक विचार किजिये… आप जब माँ-बहन-बेटी की गाली दे रहे होते हैं तब पास खड़ी उस स्त्री पर क्या गुजरती होगी जो दैहिक और भावनात्मक रुप से ठीक वही है जिसका आप वीभत्स ढंग से वर्णन कर रहे हैं…वह और युग था जब लोग कबीलों मे थे और असभ्यता ही सभ्यता थी….”बल ही विधान” था उस समय… तब एक कबीला दूसरे कबीले पर चढ़ाई करने के बाद वहाँ की स्त्रियों-बालिकाओं (बहन-बेटियों) को अपनी वासना और क्रोध का शिकार बनाते थे… और उसे प्रोत्साहित करने के लिए ऐसे भद्दे और उतेजक नारे लगाए जाते थे जो चित्त की पुकार को दबा सके (क्यों कि प्रत्येक दैत्य के चित्त में देवता का वास होता ही है) और सामान्य पुरुष को भी स्त्री-यौनांगों  के प्रति “उत्सुक” और बर्बर कर दे… आज वो “कबीलाई संस्कृति” ख़त्म हो गई पर “कबीलाई-मानसिकता” जस की तस है…और माँ-बहन की भद्दी गालियां उसी हिंसा को बढ़ावा दे रही हैं… वस्तुतः “गाली” मौखिक-बलात्कार (वोकल रेप) ही है… यह एक तरह की “रेप प्रैक्टिस”… भारतीय-दर्शन में “मन-वचन-कर्म” में “अन्योन्याश्रित-सम्बंध” माना गया है… अर्थात यदि हम कोई बात बार-बार दोहराएं तो वह न केवल हमारे अपितु आसपास के लोगों के मन को उसी के अनुसार कर्म करने को प्रेरित करती है… इसी कारण हमने “भाषाई-स्वच्छता” को  “द्विज” होने का आधार माना… ब्राह्मण को इसी आधार पर श्राप-वरदान का बल प्राप्त हुआ… और यही वह मुख्य-व्यायाम भी माना गया जो हमारे चरित्र को बना सकता है या बिगाड़… और यह बात पूर्णतः सत्य है… किन्तु केवल चरित्र ही नही “व्यवहार-व्यवस्था-समाज-राज्य” सब के सब “शब्द” की चाकरी करतें हैं… अतः केवल यह मान कर की “गाली” तो “मुहावरों” की शक्ल ले चुकी है या एक संस्कृति (कुसंस्कृति) है और इसका कोई बड़ा प्रभाव नही पड़ता, इसे “इग्नोर”(उपेक्षा) कर देना बहुत महंगा पड़ रहा है समाज को और बहुत महंगा पड़ेगा आने वाली मनुष्यता को..।
सनातन धर्म के संवाहक भारतीय पुराण प्रत्येक काल और युग मे प्रासंगिक होते हैं… उनकी कथाओं में छुपे हुए संकेत युगों से भारत समेत विश्व का पथप्रदर्शन करते रहे हैं… इस प्रसङ्ग पर मुझे “महाभारत” की एक घटना का स्मरण प्रायः होता है जब भगवान् श्री कृष्ण ने शिशुपाल नामक दम्भी राजा का शीश अपने चक्र से उस समय काट दिया जब उसके मुख से कृष्ण के लिए “सौवां-अपशब्द” उच्चरित हुआ!… कृपासिंधु भगवान् ने मौखिक हिंसा का प्रत्युत्तर “मृत्युदंड” दे कर इतिहास को सूचित किया कि अपशब्दों को सहने की एक सीमा निर्धारित होनी चाहिए समाज में… और गाली को भी हिंसा का एक विकृत रूप मान कर इसका निरोध या प्रतिरोध करना आवश्यक होता है..।
“भारत अगेंस्ट अब्यूज” नामक अभियान की शुरुआत के साथ आज वो समय आ चुका है जब हम सब को मिल कर इस कुरीति के विरुद्ध एक जुट हो जाना चाहिए… जैसे हम अस्पृश्यता, विधवा विवाह, बाल विवाह, सतीप्रथा या अन्य सामाजिक सुधारों को ले कर हुए… यह सरकार से अधिक समाज की ज़िम्मेदारी का अंग है… यौनिक अपशब्दों को पूरी तरह ख़ारिज कर के भी हम अपने रेचन जो ज़ारी रख  सकते हैं… अपनी निंदा, क्रोध,ईर्ष्या और अपमान करने की भावना को अभिव्यक्ति दे सकते हैं… क्यों कि इन भावनाओ से ऊपर उठने के लिए तो एक आध्यात्मिक क्रांति करनी पड़ती है… किन्तु इन गालियों को अपने बोलचाल में निषेध कर के निःसन्देह हम एक स्वस्थ समाज की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं… एक ऐसा समाज जो कम से कम “भाषाई-बलात्कार” से मुक्त होगा… और मुक्त होगा यौनिक-हिंसा से भी शनै शनै..!!
साभार – 
ओमा The अक् 
18 जून 2019 
(भारत अगेंस्ट एब्यूज़ के लिए)

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