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PPS अधिकारियो का दर्द फिर उभरा जब SP ट्रैफिक आगरा सुनीता जी ने नौकरी को कह दिया अलविदा. कभी हिमांचल प्रदेश में भी HPS अधिकारी मनोज जोशी पिस गया था IG जहूर जैदी की चक्की में

यकीनन वर्तमान समय में भी चल रही ये ऐसी व्यवस्था होगी जिसको कोई हिला भी नहीं सकता है .. शायद किसी मुख्यमंत्री स्तर पर भी इस पर चर्चा करना सम्भव नहीं हा वरना कोई न कोई तो अब तक पहल कर ही चुका होगा इस मुद्दे पर . ऐसा बताया जाता है कि इसकी जड़ में 1861 का वो पुलिस एक्ट है जो आज तक कही न कहीं प्रभावी है और जिसमे एक अधिकारी के पास इतनी शक्तियां हैं की उस को चाह कर भी कोई चुनौती नहीं दे सकता है . यद्द्पि आधुनिकता के नाम पर संसार नए आ गए , ट्रेन भी बुलेट होने जा रही है लेकिन इस एक्ट पर आज तक किसी ने कभी भी एक शब्द नहीं बोला ..

वो तथाकथित राष्ट्रवादी भी जो अंग्रेजो का विरोध करने के नाम पर देश में कई वर्षों तक सत्ता में रहे और वो भी जो खुद को इतने बड़े राष्ट्रवादी कहते हैं कि उनके पास मुगलकालीन सड़को और जिलों के नाम बदलने का तो समय है लेकिन 1861 के चल रहे कानून के इस मुद्दे पर सोचने भर का भी वक्त नहीं .. सवाल यहाँ ये उठता है कि सत्ता के हिसाब से अभी वर्दी वाले विभागों में वो कौन सा मंगल पांडेय है जिसकी फांसी का इंतज़ार हो रहा है . सवाल ये भी है कि वर्दी पहने एक अफसर किस किस से जूझे ? आतंक से , अपराध से , अन्याय से या खुद से ही .. फिर भी इसी विभाग के कंधो पर सबसे ज्यादा बोझ .. असल में कंधो से ज्यादा मस्तिष्क में … 

ज्ञात हो कि अभी हाल में ही PPS अधिकारी और प्रदेश के सबसे तेजतर्रार पुलिस अफसरों में से एक राजेश साहनी की आत्महत्या के बाद ऐसा लग रहा था कि शायद सरकारी स्तर पर न सही पर व्यक्तिगत स्तर पर पुलिस विभाग में इस विडंबना का समाधान निकलेगा लेकिन उसके बाद एक बार फिर से एक ऐसी घटना हुई जिसने पुलिस विभाग के अंदर इतना तो साबित कर दिया कि सब कुछ सही नहीं चल रहा है .. आगरा में महिला एसपी ट्रैफिक के इस्तीफे ने पुलिस महकमे में हडकंप मचा दिया है। एसपी सुनीता सिंह ने आईजी आगरा आॅफिस में अपना इस्तीफा बुधवार को भेजा था। जिसे आईजी आगरा ने भी अग्रिम कार्यवाही के लिए भेज दिया, जिसके बाद पुलिस महकमे में एसपी के इस्तीफा के वजह हर कोई जाने को आतुर है।

बताया जा रहा है कि पिछले कुछ समय से 1991 बैच की PPS अधिकारी व् गोरखपुर की मूल निवासनी संगीता सिंह जी की एक अधिकारी से चल रही अनबन व प्रमोशन ना होना उनके इस्तीफे की वजह बना था .. एसपी ट्रैफिक ने आईजी कार्यालय भेजे अपने इस्तीफे में खुद पर दबाब महसूस करने पर स्वेच्छा से त्याग पत्र देने की बात कही है। उनकी ओर से किसी भी अधिकारी या विभाग पर आरोप नहीं लगाए गये हैं। एसपी त्यागपत्र देने के बाद मेडिकल लीव पर चली गई हैं। जिनसे पक्ष जानने का प्रयास किया लेकिन फोन नहीं उठा.. ऐसा बताया जा रहा है कि त्याग पत्र देने के पीछे एक अधिकारी से काफी समय से चल रही अनबन व प्रमोशन ना होना बताया जा रहा है। यद्द्पि ये इस्तीफ़ा उस समय दिया गया है जब केंद्र और राज्य दोनों सरकारें बेटी बचाओ और महिला शशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर कार्य कर रही हैं .

इस खाई के शिकारों में सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं , हिमाचल प्रदेश जैसे प्रदेश भी शामिल हैं . शिमला के कोटखाई में हुआ मासूम गुड़िया का वो वीभत्स बलात्कार जो शायद दिल्ली की निर्भया जैसा ही क्रूर और अक्षम्य था . उस अपराध के अपराधी के लिए मृत्युदंड भी शायद बहुत छोटी सजा हो . जिस प्रकार से जांच आदि की गयी है वो बेहद शर्मिंदा करने वाली और जनता का विश्वास रक्षको से हटाने वाली हैं और यकीनन इन्ही कमियों के चलते जनता कई बार सकड़ों पर भी उतरी है और प्रशासन के सामने आ कर डट गयी . आतंकियों तक के मानवाधिकारों की बात करने वाले नेताओ ने अपने बयानों में पुलिस को दोषी ठहराया . फिर CBI की जांच हुई उसमे भी पुलिस वालों को दोषी बना डाला गया और 7 पुलिस के निचले तबके के अधिकारी और १ पुलिस का IG तत्काल गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया .

यद्द्पि इस मामले में अभी कई सवाल है जो खुद CBI नहीं दे पाई है जिसके पीछे शायद आईपीएस अधिकारी जहूर जैदी का रुतबा और उनकी डिग्री भी आड़े आ रही हो .. जैसे जब इस मामले में सीधे पुलिस विभाग के उच्चतम स्तर का IG जहूर एच जैदी संलिप्त था तो यकीनन वही आदेश जारी कर रहा था .. क्या उसके एक इशारे पर निलंबित हो जाने की हैसियत वाले छोटे अधिकारी उसके आदेश को टाल सकते थे ? IG पुलिस विभाग का शीर्षतम अधिकारियों में से एक होता है . अक्सर वो सीधे शासन से दिशा निर्देश पाता रहता है .. IG जहूर ने ये कुकृत्य यकीनन अपने मन से नहीं बल्कि किसी शासकीय निर्देश पर किया रहा होगा .. आखिर कौन था वो निर्देश जारी करने वाला ? या सीधे HPS अधिकारी मनोज जोशी व् उनके नीचे वालों को ही बलि का बकरा बना कर ऊपर के तमाम लोगों के अपराधों पर पर्दा डाल दिया गया ?

इतना ही नहीं सवाल आगे भी बनते हैं जब पुलिस विभाग में उच्चाधिकारी का आदेश सर्वोपरि माना जाता है तो IG जैदी को पकड़ने के बाद उसी प्रकार की धाराओं में डीएसपी मनोज कुमार, राजेंद्र सिंह, एएसआई दीपचंद, मोहन लाल, रंजीत सिंह, रफीक अली और सूरत सिंह को क्यों पकड़ा गया ? जबकि असल में नियमतः उन पर केवल इतना आरोप बनता है कि वो अपने IG के आदेश का पालन कर रहे थे .. क्या ये संभव नहीं था कि यदि वो छोटे स्तर के कर्मचारी IG का आदेश मानने से इंकार कर देते तो उन पर वो अपने ही स्तर से कोई कार्यवाही कर के इस से बड़े किसी मामले में फंसा देता .. क्या ये संभव नहीं कि ऐसी धमकी दी भी गयी हो उन निचले स्तर के अधिकारी को ? शासन का इसी मामले में फंसे HPS अधिकारी मनोज जोशी की हैसियत को अपेक्षाकृत कम आंकना भी इन सवालों के निरुत्तर होने कोई एक बड़ी वजह है .. 

यद्द्पि अगर वर्दी में किनारे लगे बैज से आप न देखें तो एक PPS / HPS  या एक IPS अधिकारी में आप फर्क नहीं कर पाएंगे लेकिन जब आप अंदर झाँक कर उस विभाग में देखेंगे तो आप को बहुत कुछ अलग और नया दिखेगा .. यद्द्पि यहाँ मुद्दा आईपीएस और पीपीएस अधिकारी में भेद करने का नहीं है क्योकि दोनों ही पुलिस विभाग के पूरक हैं और समाज के रक्षक लेकिन राजेश साहनी जी की आत्महत्या के बाद इतना तो खुद भी जानना और जनता को बताना जरूरी हो जाता है कि क्यों हिमालय से भी अटल इरादों जैसे दिखने वाला एक अधिकारी खुद को खुद से ही खत्म करने या अथक प्रयास से पाई नौकरी को त्याग देने पर मजबूर हो जाता है ?? 

इसका दोष केवल कुछ अधिकारियो को देना ही ठीक नहीं होगा .. असल में ये हर बार ही होता रहा है जब पीपीएस वर्ग को ये परोक्ष रूप से एहसास करा दिया जाता है कि उनकी किसी को कोई चिंता नहीं है .. यहाँ ये जानना जरूरी है कि जितने वर्ष की नौकरी में किसी अन्य विभाग के लोग अपने विभाग के सर्वोच्च पदों तक पहुंच जाते हैं तो वहीँ पुलिस सेवा के ये अफसर एक अदद प्रमोशन को तरस जाते हैं। राजेश साहनी को खुद को खुद से न मारना पड़ता , संगीता सिंह को इस्तीफा न देना पड़ता या हिमाचल प्रदेश के मनोज जोशी को जहूर जैदी के बराबर जेल की चक्की न पीसनी पड़ती अगर उन्हें को एक दरवाजा भी खुला दिखता जहाँ उनकी आवाज सुनने वाला कोई एक भी होता तो .. उत्तर प्रदेश का पीपीएस संघ कई बार उच्चाधिकरियों ही नहीं मंत्रियों की बैठक में भी साफ- २ कहता है कि पीपीएस संवर्ग सर्वाधिक उपेक्षा का शिकार है। यहाँ तक कि उसके ही लगभग समकक्ष  संवर्ग में प्रमोशन और उच्च वेतनमान का ग्राफ तेजी से बढ़ता है, लेकिन पीपीएस के लिए प्रोन्नति का ग्राफ साल दर साल छोटा औऱ धीमा होता जा रहा है।

इसी सिलसिले में एक बैठक हुई थी पुलिस के रेडियो मुख्यालय पर जिसमे पीपीएस अफसरों ने अपनी समस्या और उनकी मांगों के साथ मात्र सात पेज का ब्‍योरा रखा गया.. इतने बड़े प्रदेश में इतने बड़ा पुलिस बल होने के बाद भी मात्र 7 पेज का ब्यौरा देना ये भी साबित करता है कि इन्होने उन्ही न्यूनतम मांगों को रखा रहा होगा जो उनकी नौकरी करने में न्यूनतम जरूरते रही होंगी .. लेकिन जिस प्रकार से उन्हें उपेक्षित किया गया उसी प्रकार से उनके दिए गए प्रार्थना पत्र को भी उपेक्षित किया गया और वही सब दुष्परिणाम राजेश साहनी के रूप में सामने आ रहे हैं . उत्तर प्रदेश में वर्तमान में शासन एक योगी का है , उनको भगवान श्री राम और भरत के वन में हुए संवाद में ये शब्द जरूर याद करने होंगे जब प्रभु श्रीराम ने अपने भाई भरत से कहा था – ” हे भरत, भले ही तुम मंत्रियों को वेतन बाद में देना , लेकिन अपने राज्य की सैन्य शक्ति को वेतन सबसे पहले देना और उनकी सुख सुविधाओं का विशेष ध्यान रखना , क्योकि जिस प्रकार तुम्हे राज्य में सुख लाना है उसी प्रकार सैन्य बल को तुम्हारे राज्य में शांति स्थापित करनी होती है ” .. इतना तय है कि भगवान् श्री राम के रामराज्य के सपने देखने वाले आज उत्तर प्रदेश में ये नहीं हो रहा है वरना इलाहबाद का सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह ३ साल से जेल में बैठा अपने परिवार को तबाह होते अपनी आँखों से न देख रहा होता, संगीता सिंह इस्तीफा न दे रही होती और एडिशनल एस पी राजेश साहनी आत्महत्या न कर रहे होते ..  

क्या आप जानते हैं कि पीपीएस कैडर को किसी को पुरष्कृत करने या दंड देने का अधिकार नहीं है . पिछले कई सालों से पुलिस वीक के दौरान होने वाले पीपीएस सम्मेलन में शामिल होने के लिए के लिए यूपी पुलिस चीफ के साथ शासन से गृह विभाग के अफसर बुलाये जाते रहे हैं, कभी किसी प्रदेश के मुखिया को इतना जरूरी नहीं लगा कि वो चल कर स्वय इनसे मुलाक़ात कर ले या इनके दुःख को समझ सके .. उपेक्षा शत प्रतिशत कार्य क्षमता पर असर डालती ही है और ये हो रहा है राजेश साहनी जैसे अफसरों के साथ . यहाँ प्रशंसा के पात्र हैं वो अफसर जो इतने तनाव , दबाव और उपेक्षा के बाद भी कर्म ही पूजा है के सिद्धांत पर अपने कर्तव्यों का निर्वाहन कर रहे हैं लेकिन एक प्रदेश जिस में एक मुख्यमंत्री व् दो उपमुख्यमंत्री हों वहां किसी को इतना समय न मिल रहा हो कि वो अपने शासन की सैन्य शक्ति का दर्द जान सके , ये अप्रत्याशित और अनअपेक्षित है .. ****

**** उपरोक्त विचार लेखक के स्वतंत्र विचार हैं .

लेखक – राहुल पांडेय

सहायक सम्पादक- सुदर्शन न्यूज ..नॉएडा

सम्पर्क – 09598805228


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