सब इंस्पेक्टर शैलेंद्र सिंह व सिपाही प्रशांत की कराह व आत्महत्या करने वाले कई पुलिसकर्मियों की आह के बाद ट्विटर पर टॉप ट्रेंड हुआ #पीड़ितखाकी

ये खबर जब तक लिखी ही जा रही थी तब तक जानकारी मिली कि बस्ती में छात्रनेता कबीर तिवारी हत्याकांड में 2 थानेदारों को लाइन हाजिर कर दिया गया है.. लखनऊ से तमाम बड़े बड़े अधिकारी बड़ी – 2 गाड़ियों में आये और उन्होंने सघन जांच करते हुए अपना पूरा अनुभव उड़ेलते हुए फिलहाल ये पाया कि सारा दोष 2 थानेदारों का ही है, इसलिए उन्हें लाईन हाजिर कर दिया गया.. एकदम नई और ताजा घटना से आप खुद समझ गए होंगे कि उत्तर प्रदेश की वर्दी खुद को पीड़ित क्यों बता रही है.. ट्विटर पर टॉप ट्रेंड कर रहा है पीड़ित ख़ाकी आज के दिन जिसमें कई दर्द बयान किये गए हैं और कईयों ने अलग लग अपनी अपनी राय रखी है..इस पीड़ा में उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , उत्तराखंड के पुकिसकर्मी विशेष तौर पर दिखाई दे रहे हैं..

अगर कुछ दिन पहले के घटनाक्रम पर गौर किया जाय तो भारत सरकार ने संसद में एक कानून पारित किया था जिसमें सामान्य वर्ग वालों के खिलाफ SC / ST कानून को कड़ा किये जाने का आरोप व्यापक स्तर पर लगाया गया था..राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार फिर से न आ पाने का कारण कई लोग उसी संसोधन को बताते हैं क्योंकि कई स्थानों पर NOTA की संख्या जीत हार के अंतर से ज्यादा थी..उस कानून के बारे में सामान्य वर्ग के कई लोगों का ऐसा मानना था कि उसमें बिना कारण उन्हें प्रताड़ना मिलने की संभावना थी.. लेकिन उन्हें नहीं पता था कि एक ऐसा वर्ग भी है जो इस से कड़े नियम और क़ानून के दायरे में 24 घण्टे और 7 दिन कार्य करता है और वो वर्ग है वर्दी वालों का..

कोई झूठा आरोप लगा दे तो लाईन हाजिर, कई बार तो आरोप लगाने वाले के कद पर निर्भर करती है होने वाली कार्यवाही जिसमें निलंबन, ट्रांसफर , जांच लगाना और उस से भी आगे कई कदम बढ़ा दिए जाते हैं..  बताया तो ये भी जाता है कि कई बार तो अधीनस्थ को पता भी नही चल पाता कि उसको किस बात की अचानक सज़ा मिली है और उसको 3 जिला या 300 किलोमीटर दूर भेजे जाने का आदेश आ जाता है.. अन्य स्वरूप में ये कार्यवाही उस हार्ट अटैक के समान होती हैं जिसमें एक अच्छा भला स्वस्थ इंसान थोड़े ही समय बाद जमीन पर छटपटाता नजर आता है..ऊपर से चला दबाव जितना ज्यादा नीचे डाला जा सके , डाल दिया जाता है और सबसे नीचे वाला उस दबाव में या तो दब कर छटपटाता है या कहीं कोई रास्ता न मिलने पर वही कदम उठा लेता है जो अब तक कई पुलिसकर्मी उठा चुके हैं..यानि कि आत्महत्या..

इस बारे में अगर गहराई से देखा जाय तो ये पाया जाएगा कि निचले स्तर के पास खुद को बचाने का कोई विकल्प नही होता इसलिए वो आत्महत्या जैसे कदम को मजबूर होता है.. कुछ गिने चुने ऐसे बड़े लोग भी हैं जिन्हें अपने ट्रांसफर के बदले अगर 100 लोगों पर भी गाज गिरानी हो तो वो कदापि न चूकें, शासन भी एक ही अधिकारी के हर निर्णय को आंख बंद कर के मान लेता है और उसके बाद पीड़ित के पास सिर्फ एक रास्ता बचता है और वो है अदालत का.. निचले स्तर पर वेतन ही इतना नही होता कि वो अपनी सफाई उच्च न्यायालय में दे सके , साथ ही सस्पेंड जैसी सज़ा पाने के बाद उसका रहा सहा वेतन भत्ता भी रुक जाता है और उसके पास अपने भूखे बीबी बच्चों को पालना या अदालत की कार्यवाही करना 2 विकल्प रह जाता है..

जब वो अपनी आंखों के आगे अपने भूखे बच्चे और लाचार बीबी को बिलखते देखता है तब वही खुद को मौत के हवाले कर देता है.. इसके अतिरिक्त समाज के लिए होने वाली मुठभेड़ में भी घायल हो तो भी इलाज खुद के पैसे से करवाये, किसी बड़े दुर्दांत अपराधी को भी मारने के बाद उसकी तरफ से दायर मुकदमा अपने पैसे से लड़े.. कहीं आये या जाए तो अपने खुद के खर्चे से.. उसके बाद भी दिन भर अधिकारी का अपमान सहे व समाज मे न जाने किन किन नामो से पुकारा जाय.. खुद अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसी स्थिति में एक निचले स्तर के पुलिसकर्मी के पास जीवित रहने के कितने विकल्प रह जाते हैं..उसके बाद भी कई आत्महत्याओं पर प्रदेश का मुखिया इसको एक सामान्य प्रक्रिया जैसा बताए तो उसके पास 2 विकल्प फिर बचते हैं..या तो वो नौकरी छोड़े या जीवन..

आत्महत्या सदैव अंतिम मार्ग होता है..तो क्या दिवंगत वर्दी वाले मान चुके थे कि उनके पास उनके अधिकारी से ले कर शासन, मुख्यमंत्री , गृहमंत्री, प्रधानमंत्री , न्यायालय आदि सभी रास्ते बंद थे..अगर इसमें से एक भी मार्ग खुला होता तो वो मौत को गले क्यों लगाते ? भर्ती के समय उनका कड़ा फिजिकल इस बात की गवाही है कि वो शारीरिक रूप से स्वस्थ थे..फिर उन्हें मानसिक बीमार किसने बनाया ? अब तक कई पुलिसकर्मियों की सर्विस बुक में कई इंट्री नकारात्मक लिखी गई लेकिन प्राण लेने तक की हद तक प्रताड़ित करने वाले कुछ बड़े साहबो की सर्विस बुक में ये नही लिखा गया कि उन्होंने कितनो को मरने पर मजबूर किया.. ऐसे हालातो में आखिर खाकी खुद को पीड़ित न कहे तो क्या कहे ?

सुदर्शन न्यूज ने इस से पहले भी पुलिसकर्मियों की पीड़ा जीवंत रूप से सामने रखी थी जिस पर खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, पूर्व गृहराज्यमंत्री हंसराज अहीर ने इन समस्याओं पर ध्यान देने की बात कही थी, लेकिन इसको कहना गलत नही होगा कि उनका क्रियान्वयन ठीक से नहीं किया गया. अगर ठीक से हुआ होता तो आज खाकी को खुद को पीड़ित बताते हुए ट्विटर पर न आना पड़ता.. इसमें मीडिया के भी एक बड़े वर्ग की भी जवाबदेही बनती है जिसने अंधाधुंध बिना किसी कारण के कई ऐसे मामलों में पुलिस वालों को अपनी तरफ से जज बन कर दोषी बना डाला जिसमें बाद में जांच के उपरांत पुलिसकर्मी निर्दोष साबित हुए थे.. इस दुष्प्रचार में खास कर उन छोटे और आधारहीन सोशल मीडिया प्रोफाइलों व अमान्य पॉर्टलो की भूमिका बहुत ज्यादा रही जिन्होंने अपनी खुद की क्षणिक प्रसिद्धि के लिये समाज की सुरक्षा की सबसे बड़ी रीढ़ पर बार बार बार किया..और उस से भी पीड़ादायक बात ये रही कि उनकी बेहद गलत छोटी बातों को बड़े बड़े अधिकारी सही मानते रहे..

कई मामलो में तो हालात इतने बदतर रहे कि शोर मचा रहे कुछ गिने चुने लोगों को खुश करने के लिए सब कुछ सच जान कर भी पुलिसकर्मियों की बलि चढ़ा दी गई..सब इंस्पेक्टर शैलेंद्र सिंह के हालात से कौन नही परिचित है..वीडियो में साफ साफ दिखाई दे रहा कि सब इंस्पेक्टर शैलेंद्र को किस प्रकार से घेर कर मारा जा रहा है लेकिन कुछ लोग जमा हुए और एक स्वर में मांग करने लगे कार्यवाही की और न्याय वही हुआ जिसको भीड़तंत्र कहा जाता है.. उन लोगों को खुश करने के लिए शैलेन्द्र सिंह को बलि का बकरा बना डाला गया और उसकी दुधमुंही बच्चियों के साथ उनकी पत्नी तक को दर दर भटकने पर मजबूर कर दिया गया…खुद बड़े पुलिस के साहबों ने ही मान लिया कि गलती छोटे पुलिस वाले कि थी और सत्य वो नही है जो वीडियो में दिख रहा बल्कि सत्य वो है जो भीड़ कह रही..इसमें शासन भी पीछा नही छुड़ा सकता जिसने न्याय से जरूरी वोट समझा और सब इंस्पेक्टर को जेल व उसके परिवार को सड़क पर मरने के लिए छोड़ दिया..

इसी प्रकार के हालात लखनऊ में विवेक तिवारी मामले में भी देखने को मिला.. आधी रात को 3 बैंकों के ATM एक संदिग्ध वाहन को रोकना और उसके द्वारा न रुकना तो दूर कुचलने की भी कोशिश की गई.. उसके बाद पुलिस के बड़े लोग ही ये मानने को तैयार नही हुए कि जो कुछ भी हुआ वो या तो आत्मरक्षा थी और या तो गैर इरादा..वो सब कुछ किया गया जो कुछ लोगों को संतुष्टि दे.. यहां तक कि उस दूसरे सिपाही को भी लपेट दिया गया जो उस इलाके में पहली बार ड्यूटी दे रहा था और उसका काम केवल दर्शक भर का था.. लखनऊ के बड़े बड़े अधिकारियों ने इसका CBI से भी गहनता सर जांच किया और इस निष्कर्ष पर निकले कि 1 गोली को चलाने के किये 2 सिपाही लगे थे..मतलब मात्र 1 गोली चली जिसको 2 सिपाहियों ने मिल कर चलाई…ऐसी जांच तो अमेरिका और ब्रिटेन की भी एजेंसियां शायद न कर पाएं और आखिरकार दोनों सिपाहियों को एक जैसी सज़ा दी कर जेल भेजा गया और बर्खास्त भी कर दिया गया..यहां मीडिया के एक वर्ग का भी ऐसा कार्य रहा जो संसार मे कहीं नही हुआ होगा..

सिपाही की पत्नी अपने पति की पैरवी क्यो कर रही ये सवाल हेडलाईन बना कर चलाया गया..ऐसी कौन सी पत्नी होगी जो अपने पति की मदद नही करती होगी..आगरा की जेल में बंद कश्मीरी आतंकियो का ध्यान रखा जा रहा और उ के समर्थन में ख़बर चलाई जा रही कि उन्हें गर्मी ज्यादा लग रही UP में, लेकिन सिपाही की पत्नी आप के पति की मदद क्यो कर रही ये खबर उस से पहले चली..मतलब एक सिपाही के अंदर या पुलिसकर्मी के अंदर ये भाव आ जाये कि उसके हालात आतंकियो से भी ज्यादा गए गुजरे हैं तो खाकी खुद को पीड़ित क्यों न माने..? उसकी जब कहीं नही सुनी गई और उसके दर्द के बजाय आतंकियो की सुविधा को प्रमुखता मिल रही हो तो उसने ट्विटर को अपना सहारा बनाया और वही पूरे भारत मे ट्रेंड हुआ अब जा कर..लखनऊ के छोटे सिपाहियों के खिलाफ बड़े लोगों ने जो किया वो कितना सही था इसको शासन जानता था लेकिन भारत की उस कुछ लोगों द्वारा गढ़ी गई परंपरा का पालन भी करना था जिसमें न्याय तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक खाकी पर दाग न लग जाएं..

मौतों के आंकड़ों के आधार पर तो अस्पतालों की भी रेटिंग तय की जाती है पर थानों  व पुलिस लाईनों में हुई मौतों पर किसी की कोई रेटिंग तो दूर, किसी को एक छोटी सी नोटिस भी आज तक दी गई हो यो शायद खाकी को संतोष मिलता..जहां से आत्महत्या हुई वहीं जा जा कर शाबासी दी जा रही तो खाकी खुद को पीड़ित न कहे तो क्या कहे ? किसी अन्य विभाग में अस्थाई संविदा पर नियुक्त किसी कर्मी को सस्पेंड या बर्खास्त करना  मात्र 1 दिन का वेतन काटने पर वो दिल्ली तक हंगामा कर देता है लेकिन पक्की व स्थाई नौकरी समझ कर वर्दी पहनने वाले मौखिक आदेशो में सड़क पर अपने परिवार के साथ जब आते हैं तो उनकी आत्मा से खुद ही आवाज आती है कि खाकी पीड़ित है…

जब हालात संविदाकर्मियों से भी बदतर बना दिये जायेंगे, जब उन्हें कभी खुद की व कभी भीड़ की संतुष्टि के लिए बलि का बकरा बनाया जाएगा, जब उनकी मौतों को सामान्य घटना की तरह देखा जाएगा तो खुद खाकी नहीं बल्कि उसके दर्द को समझने वाले सभी लोग बोलेंगे कि पीड़ित है खाकी.. समाज के लिए लड़ी गई मुठभेड़ में घायल पुलिसकर्मी जब खुद का इलाज अपना खेत बेच कर करवाएगा, अपराधी को मारने के बाद भी उसका मुकदमा जब वो पुलिस वाला अपनी पत्नी के गहने गिरवी रख कर लड़ेगा तो अपने आप उसके मन से पीड़ित खाकी जैसे शब्द निकलेंगे..सरकार के उच्चतम से आशा है कि वो निचले स्तर के पुलिसकर्मियों की पीड़ा की गलत रिपोर्ट भेज रहे कुछ लोगो को चिन्हित कर के कार्यवाही करे और समाधान निकाले उस समस्या का जो पुलिस वालों को प्राण देने पर मजबूर कर रही है.. प्रभु श्रीराम ने भी भरत मिलाप के समय उन्हें प्रथम वेतन अपनी सैन्य शक्ति को देने की सलाह दी थी और कहा था कि सैन्य शक्ति ही राष्ट्रशक्ति होती है और अगर वो सुदृढ है तो बाकी सभी वर्ग स्वतः सही रहते हैं..लेकिन रामायण के इस सिद्धांत का पालन रामराज्य की संकल्पना ले कर चल रही सरकार में हो रहा इसमे शक है क्योंकि आत्महत्या करते वर्दी वालों के खामोश व ठंडे शवों से आता संदेश ऊपर तक जा नही पा रहा..

 

रिपोर्ट-

राहुल पाण्डेय

सहायक सम्पादक- सुदर्शन न्यूज़

मुख्यालय – नोएडा

सम्पर्क – 9598805228

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