धर्म और विज्ञान एक दुसरे के विरोधी हैं या फिर सहयोगी? जानिए क्या है धर्म और विज्ञान का संबंध?

धर्म और विज्ञान को लेकर अक्सर विरोधाभाषी बातें सामने आती रहती हैं तथा कहा जाता है कि धर्म और विज्ञानं एक दुसरे के विरोधी हैं. आज के समय में समाज के एक वर्ग के’ लोग धर्म को आडंबर समझने लगे हैं तथा कहते हैं कि धर्म कुछ है ही नहीं और अगर है तो विज्ञानं का विरोधी है. विज्ञान और धर्म को लेकर अक्सर कई सदियों से विवाद चलता आ रहा है. वैज्ञानिक और धर्म गुरू एक दूसरे के विपरीत खड़े हुए दिखाई देते हैं. सबको लगता है कि दोनों अपने अपने क्षेत्र में महारथी है, लेकिन हकीकत तो यह है कि यदि विज्ञान के साथ धर्म नहीं होगा तो इससे विकास नहीं बल्कि सिर्फ विनाश होगा. जी हां, विज्ञान का काम है गति देना, जबकि धर्म दिशा देता है. अगर आपके पास गति है लेकिन दिशा नहीं है तो आप निश्चित ही मंजिल तक पहुँच नहीं सकेंगे. विज्ञान के बगैर जीवन संभव है, लेकिन धर्म के बिना आदमी भटक जाएगा. विज्ञान के द्वारा विकास होने के लिए धर्म का मार्गदर्शन जरूरी है.

धर्म तथा विज्ञानं के बीच ये प्रतिद्वन्द्ता आज से ही नहीं हैं, बल्कि प्राचीन काल से ही दोनों पक्षों में खींचतान चलती आ रही हैं. लेकिन इतना जान लेना चाहिए कि भौतिकवाद के साथ अगर अध्यात्म नहीं होगा तो वह केवल प्रलय का कारण बनकर रह जाएगा. विज्ञान का दुरूपयोग पाप माना जाता है, ऐसे में बिना धर्म के केवल विज्ञान के सहारे जीवन की नैया भव सागर से पार नहीं की जा सकती है. इसलिए इंसान को समझना होगा कि धर्म और विज्ञान एक दूसरे के प्रतिद्वंदी नहीं, बल्कि एक दूसरे के हमसफ़र है, एक दूसरे के पूरक है. धर्म के बगैर विज्ञान और विज्ञान के बगैर धर्म अधूरा है. धर्म और विज्ञान एक-दूसरे से जुड़ने के बाद ही पूर्णता प्राप्त कर सकते हैं. धर्म मनुष्य को भीतर से सुंदर बनाता है और विज्ञान बाहर से। इस तरह दोनों का विवेकपूर्ण तालमेल मनुष्य को हर प्रकार से सुंदर बना सकता है और मानवता का कल्याण कर सकता है. धर्म और विज्ञान का समन्वय आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है.

जरा सोचिये, आजकल लोग अल्ट्रासाउंड सोनोग्राफी तकनीक से गर्भ में पल रहे भ्रूण के बारे में पता कर लेते हैं. अगर यहां पर धर्म का साया नहीं होगा तो यह पाप आम होने लग जाएगा. धर्म एक रहनुमा की तरह हमेशा विज्ञान को सही रास्ता दिखाता है. कई बार इंसान ने धर्म को भुलाकर केवल विज्ञान के दम पर जीवन जीने की कोशिश की है, लेकिन हर बार उसका खामियाजा पूरी सृष्टि को भुगतना पड़ता है. हकीकत की अगर बात की जाए तो विज्ञान और धर्म एक-दूसरे के पूरक हैं. दोनों के बीच कोई होड़ हो ही नहीं सकती है. अगर कोई यह होड़ करवाता है तो वह अपने विनाश को निमंत्रण दे रहा है. विज्ञान में जो भी रिसर्च किए जाते हैं, धर्म उन्हें पहले से ही जानता है. विज्ञान के क्षेत्र में कोई भी सत्य अंतिम सत्य नहीं माना जाता है, जबकि धर्म के मामले में हर सत्य का अपना एक अस्तित्व होता है. तो हमें इन दोनों का एक साथ पकड़कर चलना होगा, नहीं तो विनाश को दावत देने की गलती इंसान प्राचीन काल से करता आ रहा है.

हमारे ऋषि-मुनियों ने वर्षों पहले विज्ञान को न केवल धर्म के साथ जोड़ा, बल्कि लोगों को इसके व्यावहारिक ज्ञान के बारे में भी बतलाया. उनका मानना था कि यदि विज्ञान को सुव्यवस्थित ढंग से संवारकर मनुष्य के कल्याण में लगाया जाए तो यह धर्म बन जाता है. यही वजह है कि हमारे वेद, उपनिषद, दर्शन आदि जितने धर्मग्रंथ हैं, उनमें विज्ञान पिरोया हुआ है. जरा सोचिये कि विज्ञान और धर्म दोनों का ही उद्देश्य मानव जाति का कल्याण करना है, तब दोनों एक-दूसरे के विरोधी कैसे हो सकते हैं. विज्ञान को जानने वाला यह भी जान लेता है कि धर्म के बगैर विज्ञान अधूरा है. वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि धर्म के बगैर विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान के बगैर धर्म अंधा है. धर्म और विज्ञानं के संबंध को लेकर स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि जहाँ विज्ञानं समाप्त होता है, वहां से धर्म शुरू होता है. अगर धर्म नहीं होगा तो ये विज्ञानं के जितने भी अविष्कार हैं, ये सब इन्सान के विनाश का सबसे बड़ा कारण बनेंगे. इन्सान का जीवन सुगम बने, सरल बने इसके लिए धर्म और विज्ञानं का साथ परम आवश्यक है.

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