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अपराधियो से बाद में निबटेंगे.. अभी तो अपने ही लोगों को मरने पर मजबूर कर रहे कुछ पुलिस वाले, कानपुर के सिपाही महेंद्र की तरह


यदि कैमरे और माइक ID को नीचे रख कर किसी पुलिस वाले से बात की जाय तो उसको सबसे ज्यादा समस्या इस बात की होती है कि उसके काम के हिसाब से उसको न तो वेतन मिल रहा है और न ही सुविधाएं..वो सबसे ज्यादा दर्द शासन से अपने विभाग की उपेक्षा पर दिखाता है जिसमें उसके वेतन को अध्यापकों से तुलना आदि करना सबसे ज्यादा चर्चा में होता है ..वो सरकार के साथ साथ शिकायत मीडिया से भी दबी जुबान से करता है कि उसके अच्छे कामों को दिखाने वाले कम और बुरे कामों को दिखाने वाले ज्यादा हैं .. फिर उसको दर्द है उच्चाधिकारियों की तरफ से अक्सर आने वाले उन तमाम फरमानों की जो उसके हिसाब से उसके साथ न्याय नही है..लेकिन इन तमाम चर्चाओं में वो एक बार भी इस पर चर्चा नही करता कि उसके इस हाल का कहीं न कहीं कुछ न कुछ जिम्मेदार वो स्वयं भी होता है ..

कानपुर में एक सिपाही महेंद्र के माथे पर गोली लगती है और उनका तत्काल प्राणांत हो जाता है .. ये घटना कानपुर देहात जिले के बाघपुर पुलिस चौकी की होती है ..दिवंगत सिपाही महेंद्र के परिजन ये आरोप लगाते हैं कि उनकी इस मौत के कहीं न कहीं जिम्मेदार वहां के चौकी इंचार्ज हैं जो उनको आये दिन मानसिक प्रताड़ना देने के साथ साथ गाली गलौज भी देते रहते हैं .. इस घटना की तह तक जाया जाए और अगर सिपाही के घर वालों को सही माना जाय तो ये कहना गलत नही होगा कि “खतरा नहीं गैर से उनको, खतरा है घर वालों से …. जिनकी आंखे नहीं खुली हैं, हर दिन नए बवालों से.”.. एक दरोगा द्वारा एक सिपाही को प्रताड़ित करना ठीक वही हालात का बोध करवाता है जो जिस डाल पर बैठे उसको ही काटे.. यहां ये ध्यान रखने योग्य भी है कि जिस पुलिस चौकी की ये घटना है उस पुलिस चौकी के इंचार्ज का अपराधियों में लेशमात्र भी खौफ नहीं था, और होता भी कैसे.. वो तो अपना खौफ सिपाहियों पर बनाने में व्यस्त थे..

ये जानते हुए भी कि वो मीडिया , नेता, अधिकारी, मानवाधिकार आदि सबके लिए अकेले जिम्मेदार होते हैं फिर भी अपना ही घर जला कर तमाशा देखने की ये आदत भले ही उन्हें आत्मसंतुष्टि देती हो पर सभ्य समाज के हर वर्ग में न सिर्फ उनकी इज्जत को गिराती है बल्कि अपराधियो में उनके बचे खुचे खौफ को भी कम करती है ..दरोगा जी को भी शायद तमाम बार अपने उच्चाधिकारियों से डांट आदि पड़ी रही होगी पर उन्होंने इसका गुस्सा अपने नीचे उतारा और खुद में वही अधिकारी देखा होगा जो उन्हें डांटता होगा ..कुछ लोगों को डांट खाना या गाली देना आत्मसम्मान पर चोट जैसा लगता है पर शायद कुछ लोग उसको अपने जीवन मे उतार लेते हैं और वही शिक्षा अपने नीचे लागू करने की कोशिश करने लगते हैं..

यहां ये भी सत्य साबित हो रहा है कि “वर्दी कभी नही डरी थी, दुश्मन की तलवारों से..जब भी उसकी हार हुई तो, अपनो के अत्याचारों से..” कानपुर में सिपाही की आत्महत्या से इतना तो जरूर साबित हुआ है कि आतंक, अपराध , अन्याय , अत्याचार, मज़हबी उन्माद से लड़ता पुलिस बल एक और लड़ाई लड़ रहा है और वो लड़ाई है खुद अपनो की अपनो से ही… क्या यहां ऐसे हालात बन रहे हैं कि हर बड़ी मछली छोटी मछली को निगलने की फिराक में है ? कंधे पर स्टार चमकाने के चक्कर मे दामन पर दाग लगाने में संकोच क्यों नही हो रहा ? ऊपर से चला अथाह पदबाव कोई जरा सा भी अपने कंधों पर क्यों नही लेता और सारा का सारा प्रेशर नीचे उन कंधों पर क्यों फेंक दिया जाता है जो पहले से ही घायल चल रहे हैं .. निचले स्तर का पुलिस वाला जो गश्त के समय अपराधियो के निशाने पर रहता है और आराम के समय अधिकारियो के , वो कहां जाए और क्या करे ?

संभव है कि चौकी इंचार्ज ने अपने मन की भड़ास नकली सिंघम बनने के चक्कर मे सिपाही की जान ले कर निकाली हो पर उन्होंने सदा के लिए अपने उन अधीनस्थों की नजर में अपना सम्मान खत्म कर डाला है जो हर दिन सुबह उन्हें जय हिंद सर बोलता रहा होगा .. साथ ही आध्यात्मिक रूप में एक विधवा स्त्री व मासूम बच्चों की हाय जीवन भर उनका पीछा करेगी.. ये नियम सिर्फ सिपाही महेंद्र के ही साथ नही ASP राजेश साहनी तक भी लागू होगा क्योंकि रिटायरमेंट के बाद एक वर्दी वाले को अपने एक एक पल याद आते हैं ऐसा कहना है कुछ रिटायर्ड पुलिसकर्मियों का ..खुद से खुद का घर जला कर आतंक और अपराध से लड़ने की बात मात्र मज़ाक से ज्यादा कुछ नही हो सकती है ..बेहतर होगा कि इसको कानपुर के बाघपुर चौकी प्रभारी जैसी मानसिकता वाले समझ पाएं.

 

लेखक- राहुल पांडेय
सहायक संपादक – सुदर्शन न्यूज
नोएडा
मो- 9598805228

 


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