पढिये हिन्दू ग्रन्थों में नारी के सम्मान के वो आदेश जो यकीनन कहीं और नहीं मिल सकते ..इन ग्रन्थों से दूर जाने से विकृत हो रहा समाज .. गर्व कीजिये हिन्दू होने पर और बोलिये -“नारी तू नारायणी”

नारी के मान, सम्मान के लिए हिन्दू ग्रंथो में वर्णित श्लोकों कक अगर कोई मन मे उतार लें तो स्त्री के रूप में उसको देवी दिखनी शुरू हो जाएगी .. भले ही आधुनिक बनने के नाम पर कोई हिन्दू ग्रन्थ से कितना भी दूर चला जाय लेकिन उसके दुष्परिणाम समाज मे बलात्कार के रूप में दिखने शुरू हो जाते हैं ..

किसी अन्य मत मज़हब में क्या है इसका विश्लेषण वो स्वयं करें लेकिन पढिये हिन्दू ग्रन्थों में नारी के सम्मान के वो आदेश जिसे पढ़ कर कोई भी एक बार स्वयं ही बोल देगा – ” नारी तू नारायणी ” ।।

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*दशपुत्रसमाकन्या दशपुत्रान्प्रवर्धयन्।*

*यत्फलं लभते मर्त्यस्तल्लभ्यं कन्ययैकया॥*
अकेली कन्या ही दश पुत्रों के समान है। दश पुत्रों के लालन पालन से जो फल प्राप्त होता है, वह अकेले कन्या के पोषण से ही प्राप्त हो जाता है।
*(स्कंदपुराण, कौमारिका खंड, अध्याय 23, श्लोक 47)*
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*कन्यायाः नूपुरध्वनिः यस्य गेहे न श्रूयते।*
*न तद्गेहं श्मशानं वै इति ख्याता जनश्रुति:॥*
कन्या की नूपुर ध्वनि जिस घर में नहीं सुनी जाती, वह घर श्मशान के समान अमांगलिक है, ऐसी जनश्रुति प्रसिद्ध है।
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*पुत्रो तिष्ठति गोत्रमेकभुवने कन्या सदा द्विकुले,*
*सर्वेषां कुलवर्धिनी खलु सदा एकैव कन्या शुभा।*
*धर्मज्ञानकरी सदासुखकरी धात्रीस्वरूपास्थिता,*
*तर्हि सन्तति चेद्भवेन्निजकुले कन्या सदा सा भवेत्॥*
पुत्र तो एक ही गोत्र में रहता है, परन्तु कन्या दोनों कुलों में निवास करती है। सबों के कुल को बढ़ाने वाली एक सुलक्षणा कन्या ही है। धर्म का ज्ञान कराने वाली, सदा सुख प्रदान करने वाली, पोषण करने वाली के समान स्थित रहती है। इसीलिए घर में यदि संतति हो तो सर्वदा एक कन्या अवश्य ही हो। 
*(श्रीराघवेंद्रचरितम्, पूर्वकाण्ड, सुद्युम्न प्रकरण)*
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यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः
जिस कुल में नारियों की पूजा अर्थात् सत्कार होता है उस कुल में दिव्य गुण – दिव्य भोग और उत्तम सन्तान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियों की पूजा नहीं होती है वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल हैं । (सं० वि० गृहाश्रम)
”जिस घर में स्त्रियों का सत्कार होता है उसमें विद्यायुक्त पुरूष होके, देवसंज्ञा धरा के आनन्द से क्रीडा करते हैं और जिस घर में स्त्रियों का सत्कार नहीं होता वहां सब क्रिया निष्फल हैं ।”
(स० प्र० चतुर्थ समु०)
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अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥
इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥4॥
(श्री रामजी ने कहा-) हे मूर्ख बाली! सुन, छोटे भाई की स्त्री, बहिन, पुत्र की स्त्री और कन्या- ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता॥4॥
# श्रीरामचरितमानस 
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