जो कैमरे होने चाहिए नक्सलियों और आतंकियों पर वो लगा रखे हैं पुलिस वालों पर.. फिर कहते हैं कि समाज सुरक्षित क्यों नही ?


एक समाज के कई अंग होते हैं . उस अंग में व्यापारी , छात्र , नौकरीपेशा आदि कई प्रकार से भाग होते हैं . सबके अपने अपने अलग अलग कार्यक्षेत्र होते हैं लेकिन एक स्वस्थ और सुरक्षित समाज तब ही बन पाता है जब उस समाज के सभी अंग एक दूसरे के पूरक बने हों और एक दूसरे का सहयोग करने की भावना रखते हों .. समाज में विकृति तब आती है जब एक वर्ग दूसरे वर्ग के खिलाफ कोई हीन भावना पाल लेता है और अपनी खुद की भावनाओं को सामाजिक भावना बना कर पेश करना चाहता है ..

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इस से समाज में आपसी दूरी बनती है और अंत में समाज विखंडित हो जाता है . और जब समाज विखंडित होता है तो उसका असर समाज पर आर्थिक , सामाजिक और सुरक्षा आदि की दृष्टि से चौतरफा पड़ता है . अगर बात पुलिस बल की हो तो जिस प्रकार से भारत की सेना के सैनिक सीमा पर देश के प्रहरी हैं, ठीक उसी प्रकार से पुलिस बल देश की आन्तरिक शांति और सुरक्षा के लिए स्थापित बल है जिसके कार्य की कोई सीमा भी नहीं है . मतलब २४ घंटे और सातों दिन ..

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अगर आप गूगल पर सर्च करें कुछ दूसरे विकसित देशो, जैसे अमेरिका, रूस, फ्रांस आदि की पुलिस और वहां के पत्रकारों के आपसी रिश्तो के बारे में तो आप कोई शायद ही किसी खबर में अपनी ही रक्षा करने वाले बल के खिलाफ खोजने से एक भी शब्द मिलेगा.. इसीलिए वहां की पुलिस का मनोबल भी ऊंचा रहता है और उनकी कार्यक्षमता भी उसी प्रकार से रहती है . लेकिन कुछ देशो में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने ही रक्षा के लिए तैनात कंधो को घायल करने में अजीब प्रकार के सुख की अनुभूति करते हैं

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फिलहाल बरेली की एक खबर ने इस समय थोड़ी बहुत सुर्खियाँ बटोरी हैं . बरेली में एक खबर बनाई गयी कि एक महिला सिपाही फोन पर बात कर रही थी.. फोन पर किसी का बात करना ऐसी खबर बनी कि उसको कुछ ने सबसे ऊपर प्रमुखता दे डाली .. खबर में ये भी लिखा है कि महिला सिपाही मीठी मीठी बातें कर रही थीं . खबर में ये भी है कि काफी देर तक बात की गयी. उस खबर में उत्तर प्रदेश के DGP के एक आदेश का हवाला भी दिया गया है जिसमे ड्यूटी टाइम पर फोन नहीं किया जा सकता है .  .. यहाँ तक कि उस सिपाही का नाम तक लिख डाला गया और बाकायदा वायरल भी किया जाने लगा .

पत्रकारिता का स्तर बना और बचा रहे इसलिए अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इस खबर का मंथन करना जरूरी था और सुदर्शन न्यूज ने इसको परखना उचित समझा . अब उसी खबर से कुछ सवाल हैं..

आक्षेप 1महिला सिपाही फोन पर बात कर रही थी … ( क्या ये पता किया गया कि वो फोन विभागीय था या व्यक्तिगत.. क्या पता वो फोन विभाग के ही किसी का रहा हो जिसको उठाना जरूरी रहा हो .. )

आक्षेप २महिला सिपाही लगातार बात कर रही थी .. ( पुलिस वाला अपना फोन खुद ही प्रयोग करता है सरकारी कार्यों में भी .. विभागीय फोन सिर्फ थानेदार स्तर या उस से ऊपर दिए गये है .. जनता से भी बात करने के लिए उसको अपने ही रिचार्ज आदि का प्रयोग करना होता है .. इसका धन्यवाद किये बिना फोन पर बात करना ही क्यों निशाना बनाया गया )

आक्षेप 3 – DGP साहब का आदेश है कि ड्यूटी समय पर कोई बात नहीं करेगा फोन पर – (   खुद DGP साहब, मुख्यमंत्री, IPS अधिकारियो के तमाम फोटो और वीडियो ऐसे हैं मीडिया के पास जब वो अपने आफिस में या दौरे पर किसी से बात कर रहे हैं .. उनसे अब तक सवाल क्यों नहीं किया गया कि वो  किस से बात का रहे थे .. क्या सारा जोर सिर्फ एक महिला सिपाही पर ही लगाना ही सच्ची और अच्छी पत्रकारिता   कही जा सकती है ?

आक्षेप 4 – महिला सिपाही ने काफी देर बात की –  ( एक पुलिस वाले का काम होता है कि हर स्थिति को समझना और उसके हिसाब से वहां पर बल भेजना या अगर सम्भव हो तो उस समस्या का किसी भी स्तर पर समाधान करना जो किसी की जान , माल आदि की रक्षा से जुडी हो.. इसमें अक्सर बात लम्बी हो ही जाती है .. अगर एक फोन पर बात करती महिला सिपाही की खबर को मुख पत्र पर 10 लाइनों में लिखा जा सकता है तो सम्भवतः किसी जरूरी बात के समय ज्यादा क्यों नहीं हो सकते .. अगर उसी सिपाही के ड्यूटी घंटो को जोड़ा  जाय तो शायद कुम्भ ,चुनाव आदि के समय ये ड्यूटी घंटे मात्र एक  सप्ताह में उतने हो जाते हैं जो किसी  अन्य नौकरी तो  दूर अन्य कई राज्यों की पुलिस के ही महीने भर के समय के बराबर होता है ..

आक्षेप 5 – महिला सिपाही काफी मीठी मीठी बातें कर रही थीं – (  यहाँ पर महोदय DGP के आदेशो को लिखना भूल गये..  खुद DGP और मुख्यमंत्री के आदेश हैं कि हर पुलिस वाला सामने वाले से नम्र और सरलता से बात करेगा.. अगर यही मीठी मीठी बातों के अलावा वही सिपाही कडवी बात कर रही होती तो ये खबर न जाने कितने समाचार माध्यमो की सुर्खियाँ होती . अब मीठी बात भी करे तब भी दिक्कत ..  आखिर फिर वो करे क्या ?

यहाँ ये ध्यान देने योग्य है कि न सिर्फ बरेली जिला बल्कि सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश की पुलिस तमाम मुकदमो के निस्तारण आदि के लिए रात भर गश्त कर के दिन भर कागजो को भी पूरा करती है . एक थानेदार या चौकी इंचार्ज को लम्बित विवेचनाओं को पूरा करने के लिए कम से कम 50 पन्ने रोज़ लिखने भी होते हैं और उसमे ज़रा सी भी गलती होने पर एक अपराधी मुक्त हो जाता है या एक पीड़ित न्याय से वंचित हो जाता है . इतना ही नहीं फिर उस पुलिस वाले को अपनी विवेचना पर खुद के खिलाफ विवेचना झेलनी पड़ती है .

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ऐसे माहौल में भी अगर कोई फोन पर बात करना और ड्यूटी के समय बैठ जाना अदि की CBI या NIA स्तर की जांच करवाना चाहता है तो वो लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है या नहीं इस पर सवाल उठाना स्वभाविक है . इस समय देश नक्सलवाद , आतंकवाद जैसी गम्भीर समस्याओं से जूझ रहा है, ऐसे में कैमरे नक्सलियों और आतंकियों की तरफ न मोड़ कर उनसे ही लड़ते पुलिस वालों पर ही मोड़ देना और उनके उठने बैठने , बात करने , हंसने , मुस्कराने आदि  को प्रमुखता देना कहीं न कहीं से हास्यास्पद लगता है .

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एक बार और जो छूट रही है यहाँ पर… हंसते, मीठी मीठी बातें करते और खिलखिलाते पुलिसकर्मी की खबरों से जब मन भर जाय तो एक बार 4 साल से जेल में बंद प्रयागराज कचेहरी गोलीकांड के दोषी बनाये गये सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह का रोना भी अगर दिखा दिया जाय जिसका परिवार तबाह होने की कगार पर है , तो शायद वो भी एक मानवता और राष्ट्र हित का कार्य होगा . संसार में सुरक्षा के किसी भी बल के मनोबल पर बेवजह घाव सही नहीं कहा जा सकता है लेकिन कुछ जगहों पर एक फैशन जैसा बन गया है .. एक दिन में पुलिस बल सैकड़ो कार्य ऐसे करती है जो किसी प्रसंशा की सीमा से भी बाहर होता है लेकिन उसके बजाय ऐसे आधारहीन मुद्दे उछालना उस मक्खी के जैसी मानसिकता होती है जो पूरा साफ़ शरीर छोड़ कर बैठेने के लिए सिर्फ और सिर्फ घाव खोजती है ..

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  • राहुल पाण्डेय 

सहायक सम्पादक 

सदर्शन न्यूज मुख्यालय – नॉएडा 

मो – 09598805228


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